गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इस प्रकार क्षेत्र ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन
किया, हे राजन् ! यह तुम्हारे प्रश्नका उत्तर सम्पूर्ण कहा, जो--
तुमने पूछा था ॥ ४१ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे
श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे पण्डित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां क्षेत्रज्ञातृज्ञेय
विवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
दैव्यासुरी राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम् ॥
तासां फलानि चिह्नानि संक्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥१॥
श्रीगणेशजी बोले-दैवी, आसुरी, राक्षसी तीन प्रकारकी
मनुष्योंकी प्रकृति होती है, अनेक फल और चिह्न संक्षेपसे
वर्णन करते हैं ॥ १ ॥
आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप ॥
चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु २॥
दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों
बंधनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूं
सो तुम सुनो ॥ २ ॥