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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 706

वैसे प्रतिपाद्य जो ईश्वर । होनेके लिये वह गोचर ।
करना श्रुतिका निरंतर । अभ्यास पार्थ ॥ ३ ॥
द्विजोंको देखना ब्रह्मसूत्र । अन्योंको स्तोत्र या नाममंत्र ।
आवर्तन करना पवित्र । देखने तत्व ॥ ४ ॥
कहलाता है यह स्वाध्याय । सुन तू यह धनंजय ।
तप शब्दका अभिप्राय । कहता हूं अब ॥ ५ ॥

८ दैवी-गुण, तप—
दानका अर्थ है सर्वस्व देना । व्ययको संपूर्ण व्यर्थ करना ।
फलकर जैसे स्वयं सूखना । वनस्पतिका धर्म ॥ ६ ॥
अन्यान्य धूपका जैसे अग्नि-प्रवेश । कनकमें जैसे मलका नाश ।
या बढ़ते पित्र-पक्षमें ह्रास । जैसे चंद्रमाका ॥ ७ ॥
वैसे स्वरूप प्राप्तिके कारण । गलाना तन मन प्राण ।
दक्ष रह करके प्रतिक्षण । कहलाता तप ॥ ८ ॥
अथवा तपका रूप भिन्न । अन्य कोई है तो तू जान ।
दूधमें डाली जैसे चोंच अर्जुन । हंसकी जो ॥ ९ ॥
वैसे देह जीवका मिलन । उसमें पानी करता भिन्न ।
वह विवेक अंतःकरण । जगाये रखना ॥ ११० ॥
देखते मानो आत्माकी ओर । बुद्धि संकोष होता सत्वर ।
निद्रा स्वप्न जैसे धनुर्धर । जागृतिमें डूबते ॥ ११ ॥
वैसे आत्म-आलोचन । होता सही प्रवर्तन ।
तपका सही अर्जुन । होता अर्थ ॥ १२ ॥

९ दैवी-गुण, आर्जव = ऋजुता—
बालकके लिये जैसे रम्य । होता भूतमात्रमें चैतन्य ।
वैसे जीवमात्रमें सौजन्य । कहलाता आर्जव ॥ १३ ॥

ज्ञानेश्वरी ६३४