ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमं. सरकारने उसके लिये एक “ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडल” बनाया । उस मंडलमें सभी महाराष्ट्रके
वयोवृद्ध प्रकांड पंडित ही हैं । उन्होंने इतिहासाचार्य राजवाडे प्रतिसे मिलती जुलती पांच प्रतियोंका
विचार करके, प्रयत्नपूर्वक और निष्ठापूर्वक उन सबका संशोधन करके सरकार मान्य एवं विद्वन्मान्य
ज्ञानेश्वरीका प्रकाशन किया ।
१० अनुवादकका अंतर्द्वन्द्व-
ज्ञानेश्वरी विषयक यह वाद और इतिहास देखनेके बाद प्रस्तुत अनुवादकके सम्मुख एक
प्रश्न था अनुवादके लिये कौनसी ज्ञानेश्वरी चुने ? अनुवादकने खूब सोचा, कुछ बुजुर्ग
गुरुजनोंसे भी बात की और "विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी" और "लोकमान्य ज्ञानेश्वरी" दोनोंका अध्ययन
किया । अंतमें " केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके लिये" अनुवादके लिये विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी
चुनी ! उसके ४-५ अध्यायोंका अनुवाद हुवा और इसी बीच ऐसे ही एक विद्वानसे मिलनेका मौका
आया । ज्ञानेश्वरीके अनुवादके विषयमें चर्चा चली तो मैंने कहा-सरकारी ज्ञानेश्वरी ली है।” मेरा
वह उत्तर सुनकर वे कुछ झल्लाये । मूल राजवाडेकी प्रति क्यों नहीं ली ? वही असली ज्ञानेश्वरी
है । यदि शिवाजी महाराजने अपने हस्ताक्षरमें "शि" दीर्घ लिखा हो तो किसी विद्वानको वह ह्रस्व
करनेका क्या अधिकार है !! अर्थात् शिवाजी महाराजका हस्ताक्षर जितना प्रामाणिक उतना ही
राजवाडे ज्ञानेश्वरी प्रति प्रामाणिक ! यह उक्त विद्वान सज्जनका तर्क था । साथ साथ उस
प्रकांड विद्वन्महाशयका यह भी एक तर्क था कि सरकार द्वारा संघटित उस मंडलमें
महाराष्ट्रके सभी विद्वान नहीं थे। उस कमेटीके बाहर कोई गेलेलियो भी हो सकता है ?
वस्तुतः गेलेलियो कभी किसी कमेटीका मेंबर तो नहीं बना अर्थात् जिस किसीको किसी कमेटी पर
जानेका भाग्य ही नहीं मिला हो तो उसे अपने आपको गेलेलियो मान लेनेका अधिकार मिलही गया
और अनुवादक भी कभी किसी कमेटीका सदस्य नहीं बना और आगे भी ऐसी कोई संभावना
नहीं है । तब वह अपने आपको क्यों गेलेलियो न मान लें ?
अस्तु; इन सब बातोंमें मुझे उक्त सज्जनसे और एक जानकारी मिली । फ्रान्ससे एक
विद्वान सज्जन डॉ. द लेरे सात वर्षसे पूनामें रह कर मराठी भाषा सीख करके ज्ञानेश्वरीका फ्रेंच भाषामें
अनुवाद कर रहे हैं । इसी उद्देश्यसे वे फ्रांससे पूना आये हैं। यह सब कहनेकें बाद मुझे उक्त
सज्जनने बडे त्वेषके साथ कहा " डॉ. द लेरे ने भी श्री. दांडेकरकी प्रति ली है ! जो आता है वह
दांडेकरकी प्रति लेता है या सरकारी प्रति लेता है ! जब राजवाडेकी सच्ची ज्ञानेश्वरी मिली है तब
किसीको दूसरी ज्ञानेश्वरी लेनेका क्या अधिकार है ?"
यह सब सुनकर मैं घर आया। पच्चीस रुपये देकर 'श्री. दांडेकर प्रति' खरीद ली । श्री. शं. वा.
दांडेकरजी स्वयं सरकार द्वारा नियुक्त ज्ञानेश्वर संशोधन मंडलके अध्यक्ष हैं किंतु उन्होंने अपनी
ओरसे श्री. एकनाथ महाराज द्वारा संपादित प्रति आवश्यक संपादन तथा गद्यानुवाद करके प्रका-
शित की है । उसकी प्रस्तावनामें लिखा है “ ज्ञानेश्वरी संशोधनकार पैठणके श्री. एकनाथ महाराजकी
समाधिके तीस वर्ष बाद ही उनके घरमें बैठकर उतारी गयी प्रति मिली थी । उसके आधारपर उसकी
नकल करके तैयार की गयी प्रति श्री वेंकट स्वामीने - श्री. दांडेकरजीके गुरु बंधु-प्रकाशित की थी
उसीको यहां जैसेके वैसे - अक्षर छापनेकी पुरानी पद्धति छोड़कर प्रकाशित किया गया है !"
इस ज्ञानेश्वरीकी कीमत २५ रुपये अब ३० रुपये और सरकारी ज्ञानेश्वरी कोई आवृत्ति पांच
या कोइ आवृत्ति आठ रूपयोंमें मिलती है फिर भी श्री दांडेकरकी ज्ञानेश्वरी १९५६ से १९६९ तक
ज्ञानेश्वरी १८