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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 31

“ किंतु हमारी गति क्या ?”
निवृत्तिनाथका प्रश्न स्पष्ट था । इसका कोई उत्तर नहीं दे सकते । किंतु उत्तर न देना भी
अल्पताका द्योतक है ? विद्वान इस अल्पताको कैसे स्वीकार करेंगे ? यदि किसी प्रश्नपर निरुत्तर रहे तो
विद्वत्ता किस बातकी ? निरुपाय होकर विद्वानोंने कहा “शास्त्र सम्मत ऐसा एक ही उपाय है, परमात्माकी
अनन्य भक्ति करना ! प्राणिमात्रसे नम्र होकर व्याकुल भावसे भजन करना । ब्राह्मण और चांडालमें
भेद न करते हुए सबको प्रणाम करना ! ”
सुनकर सबको संतोष हुआ । सबने प्रसन्न मनसे कहा ‘ हमको यह स्वीकार है !! ”
६ प्रवृत्ति चक्रप्रवर्तन-
किंतु बात यहीं नहीं रुकी । ब्राह्मणसभाके बाद, वहीं कुछ लोगोंने, निवृत्ति ज्ञानदेवादि के
नाम पर कुछ निंदा नालस्ती की । ज्ञानदेवकी सहज कही हुई बातको लेकर निवृत्ति ज्ञानदेवको चुनौति
दी गयी और वहां ज्ञानदेवकी योग-सिद्धियोंके अनेक चमत्कार दिखाये । इससे पैठणके विद्वान लोग
आश्चर्य चकित हो गये । इन छोटे छोटे बालकोंके नेत्र दीपक योगसामर्थ्यसे ब्राह्मणसभा हतबुद्ध हो
गयी । हम यहां किस लिए एकत्र हुए थे यह भी सब भूल गये । ब्राह्मण सभाके सम्मुख जो प्रश्न था
वैसे ही रहा और अनजानमें सभा विसर्जन भी हो गयी ।
इस घटनाके बाद, निवृत्ति ज्ञानदेवादि कुछ काल पैठणमें रहे । पैठणमें वे कुछ काल अध्यात्म-
ग्रंथोंका अवलोकन करते, दोपहरको प्रवचन होता और रातको भजन, कीर्तन ।
इसके बाद, उस कालका महान विद्वान, पंडित बोपदेवने शुद्धिपत्र लिखा । “ये स्वर्गीय देव-
त्रयका अवतार रूप हैं । इनको कौन और क्या शुद्धिपत्र दें ?” इससे निवृत्ति-ज्ञानदेवकी कीर्तिसुगंध
चारों ओर फैल गयी ।
इन बालकोंने पैठण छोडा । चारों ओरसे इन्हें बुलावा आने लगा । पहले संन्यासीकी संतान
कह कर अवमान होता था अब इसी बात पर सम्मान होने लगा । लोक-मानस सदैव झूलेकी भांति
रहा है । वे चारों भाई बहन पैठनसे चले । जैसे पैठनमें ब्राह्मण-सभाने जो कुल-धर्म कहा था “सबको
समान मान कर परमेश्वरकी अनन्य भक्ति ” यही एक व्यवसाय था । बिना इसके दूसरा कोई कार्य
नहीं था । परमात्म भक्तिका कार्य करते करते इनका संचार प्रारंभ हुआ । ऐसा प्रवास करते करते वे
प्रवरानदीके किनारे पर बसे नेवासा गांवमें आये । वहां ज्ञानदेवके गीताप्रवचनोंको लिख लेनेवाला
सच्चिदानंद बाबा मिला । वहां शिवालयमें ज्ञानदेव प्रवचन करते और सच्चिदानंद बाबा उनको
लिख लेते ! ऐसे शा. श. १२१२ में ज्ञानेश्वरी ग्रंथ तैयार हुआ । ज्ञानदेवकी वाणी सच्चिदानंद
बाबाने लिपि-बद्ध की; ग्रंथ तैयार हुआ । संभवतः सच्चिदानंद बाबाने कृतार्थताका अनुभव करके समय
देखकर—जब श्रीगुरु निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेवादि साथ बैठे थे तब-लिपि बद्ध वह ग्रंथ श्रीगुरुके सम्मुख
रख कर प्रणाम करते हुए कहा “यह भावार्थ-दीपिका तैयार हो गयी है ।” इस पर श्रीगुरु
निवृत्तिनाथने इस ग्रंथकी ओर आंख उठाकर देखनेके पहले ही कहा “मुकुंदराजका परमार्थसार
विशुद्ध ग्रंथ है । उसमें अपने अनुभवके अलावा और कोई आधार नहीं है !” सच्चिदानंद बाबाने
ग्रंथ उठालिया । ज्ञानदेवने इस बातको “केवल अपने अनुभवके आधार पर ग्रंथ लिखनेकी आज्ञा ”
समझा और “अनुभवामृत” लिखा ।
अनुभवामृत ज्ञानेश्वर महाराजका अपना मौलिक ग्रंथ है । उसको किसीका आधार नहीं
है । किंतु जन्म भर पढने पर भी उस छोटेसे ग्रंथका अभ्यास नहीं हो पाता । जितनी बार पढते हैं
उतनी बार एक न एक नया अर्थ झलकता है । यह ग्रंथ चिंतनशील साधकको नित्य नया आनंद
११ ज्ञानेश्वर