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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 25

ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी
१ कविका संक्षिप्त परिचय—
वैसे तो ज्ञानेश्वर महाराजका सारा जीवन १ चमत्कारोंसे भरा है किंतु सब चमत्कारोंका
चमत्कार उनके लिखे हुए दो वेदांत ग्रंथ ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृत हैं। ये ग्रंथ उन्होंने अपनी
आयुके पंद्रहवे वर्षमें लिखे हैं और जो बात शब्दोंसे नहीं व्यक्त हो सकती वह शब्द चित्रोंसे मूर्तिमान
करके दिखाई है।
ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतको पढते पढते अमूर्त विचारोंका स्पष्ट शब्दचित्र देखकर
सहसा हृदय कह उठता है " वाल्मीकीकी प्रतिभा, व्यासकी प्रज्ञा, कृष्णकी आत्मानुभूति, शंकरका
वैराग्य और बुद्धकी करुणाका समीकरण ज्ञानेश्वर महाराज हैं। सूर्यसे भी प्रखर ज्ञानके साथ
चांदनीसे भी शीतल करुणाका स्पर्श होता है यहां। इसी लिये आधुनिक युगमें भी सारा महाराष्ट्र
उन्हे माउली कहता है। महाराष्ट्रमें माउली शब्दका अर्थ ज्ञानेश्वर है और कोशमें माउली शब्दका
अर्थ मां। महाराष्ट्रकी इस माउलीने अपने साहित्यके रूपमें मराठी भाषाभाषी जनताको कल्पवृक्षकी
छायामें बिठाकर कामधेनुके दूधमें पकाया हुवा अमृतान्न खिलाया है अक्षय-पात्रमें ! इसीलिये
ज्ञानेश्वर महाराजके बाद जो कोई महापुरुष महाराष्ट्रमें पैदा हुवा उसने ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरीका
ऋण स्वीकार किया है। ज्ञानेश्वरीके बाद मराठी भाषामें लिखे गये प्रत्येक धर्म-ग्रंथ पर अथवा
पारमार्थिक ग्रंथ पर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका प्रभाव देखनेको मिलता है। ज्ञानेश्वरी और
अनुभवामृत कोई रामकथा अथवा कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-ग्रंथ है। वेदांत काव्य है। मराठी
भाषामें ऐसे कई वेदांत ग्रंथ हैं, उनमेंसे कुछ ज्ञानेश्वरीके पहल भी लिखे गये थे और कुछ ज्ञानेश्वरीके
बाद भी लिखे गये हैं, पर मराठी भाषाभाषी जन-मानसपर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका जो प्रभाव
है वह और किसीका नहीं दीखता। आधुनिक विज्ञान-विद्या विभूषित होकर भी नौ हजार छंदोंका
ग्रंथ कंठस्थ कर उसका नित्य-पाठ करनेवाले महाराष्ट्रीय हजारो हैं। वैसे तो लाखों लोग ज्ञानेश्वरीका
नित्य-पाठ करते हैं।
अपनी आयुके पंद्रहवे सालमें ऐसे ग्रंथ लिखानेवाले ज्ञानेश्वर महाराजका जन्म शा. शक
११९७ युवा नाम संवत्सर श्रावणवद्य अष्टमी रातको बारह बजे हुवा था। इसलिये सारे महाराष्ट्रकी
यह मान्यतासी हो गयी है कि भगवान कृष्णने ही अपनी गीता समझानेके लिये ज्ञानेश्वरके रूपमें
जन्म लिया था।
ज्ञानेश्वर महाराज जिस समय करीब दस सालके थे उसी समय समाजके विद्वान लोगोंकी
अशानुसार उनके माता पिताने देहान्त प्रायश्चित्त लिया था। उस समयका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर
महाराजकी छोटी बहन मुक्ताई कहती है
टिप्पणी
(१) इसी लेखककी ज्ञानेश्वर और उनका साहित्य इस पुस्तकमें ज्ञानेश्वर महाराजके
विषयमें संपूर्ण जानकारी दी है।
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