सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

विषयोंके बिना है नहीं । रम्य कछु मिलता नहीं ।
स्वभाव जैसा हुवा यही । इंद्रियोंका ॥ १२० ॥
ये विषय भी हैं कैसे । रोहिणीके जल जैसे ।
स्वप्नके गजराज से । आभास रूप ॥ २१ ॥
अनित्य इन्हे जानकर । इनका कर अनादर ।
कभी इनका नहीं कर । संग तू पार्थ ॥ २२ ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
विषय ये जिन्हे नहीं जकड़ते । उन्हे सुख दुःख दोनों नहीं होते ।
तथा गर्भवास संग नहीं होते । उनको कभी ॥ २३ ॥
वे हैं नित्य रूप पार्थ । जानो है तुम सर्वथा ।
जो कभी इंद्रियार्थ । हुये नहीं ॥ २४ ॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
सन्तोंको ही आत्मदर्शनकी शक्यता—
पार्थ अब कुछ एक । कहूंगा सुन तू नेक ।
जिससे तू परलोक । जानेगा सब ॥ २५ ॥
इस उपाधिमें गुप्त । चैतन्य है सर्वगत ।
वह तत्वज्ञ जो संत । स्वीकारते हैं ॥ २६ ॥
सलीलमें पय जैसे । एक हो रहे हैं वैसे ।
किंतु राज-हंस उसे । जाने भिन्न ॥ २७ ॥
इनकी न चले बात सम जो सुख दुःखमें ।
ऐसा ही धीर होता है मोक्ष लाभार्थ योग्य जो ॥ १५ ॥
असत्यको न अस्तित्व सत्यका नाश भी नहीं ।
जानते यह तत्वज्ञ दोनोंको इस भांतिसे ॥ १६ ॥
४५ सांख्ययोग