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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1108

" आप शांतिस्पर्श-शीतल होता है। वह दो प्रकारका होता है। एक नित्य दूसरा अनित्य । नित्य
आप परमाणुरूप होता है । अनित्य आप कार्य रूप होता है। शीतल स्पर्श केवल जल-तत्वकाही
होनेसे जहां कहीं शीतलताका बोध होता है वहां सब जल तत्वका अस्तित्व मान लेना ! भारतीय
तत्त्वज्ञोंकी भांति ग्रीक तत्त्वज्ञों में भी कुछ लोग “सभी जलसे निर्माण होकर जलमें लीन होता
हैं !” कहते हैं। प्राणि, वनस्पति, आदिमें जहां आर्द्रता रहती है वह जलतत्त्वके कारण है ।
तेज—पंच महाभूतोंमें, तीसरा, जिसका स्पर्श उष्ण है उसको तेज कहा गया है। शब्द,
स्पर्श, रूप यह उसके धर्म हैं । अग्नि अथवा तेजको छांदोग्योपनिषदमें “सत्” से निर्मित
प्रथम महाभूत कहा है । न्याय शास्त्रमें इसको चमकीला शुभ्रवर्णका कहा गया है तो छांदोग्योप-
निषदमें तेजका रंग लाल माना गया है। लाल रंग तेजोरूप है। शुभ्र वर्ण जल रूप है। और
काला वर्ण पृथ्वीरूप है ऐसा श्वेताश्वतर उपनिषदमें कहा गया है। अध्यात्मशास्त्रमें तेजको
ब्रह्मका प्रतीक माना गया है। तेज, ज्ञान और सद्गुणोंका सूचक है। अनेक उपनिषदोंमें
“ ब्रह्मतेजोरूप है और तेजो रूपसे उसका साक्षात्कार होता है !” ऐसा कहा गया है। वैसे ही
मुंडकोपनिषदमें, अत्यंत दीप्त स्वर्ण-तेजो मंडलके मध्यमें दीखनेवा शुद्ध शुभ्र निष्कलंक ब्रह्म सर्व
श्रेष्ठ तेज है !” ऐसा कहा है। तथा छांदोग्योपनिषदमें “इस संसार सेतुका अतिक्रमण करनेके
बाद अंधे मनुष्यको भी अंधत्वका कोई दुःख नहीं होता। उसकी आंखोंके सामने सदैव तेजोमय
ब्रह्म चमकता रहता है। रात भी उसको दिनके समान दीखती है !” ऐसा कहा गया है। अनेक
संतोंने अपने साहित्यमें तेजोमय ब्रह्म-साक्षात्कारका वर्णन किया है। ज्ञानेश्वरीके ग्यारहवे अध्यायमें
भी यह देख सकते हैं।
वायू—न्याय और वैशेषिकमें वायुको रूपरहित स्पर्श-बोध जन्य तत्त्व कहा है। वह
नित्य और अनित्य दो प्रकारका है। नित्य वायु परमाणुरूप और अनित्यवायु कार्य रूप है। त्वक्
नामका वायु वायुजन्य इंद्रिय सारे शरीरभर रहता है जो वायुका अनुभव करता है। शरीरमें
संचार करनेवाले वायुको प्राण कहते हैं। उपनिषदोंमें जैसे शरीरके श्वासोच्छ्वासको प्राण कहा
गया है वैसे ही विश्वके जीवनतत्त्वको प्राण कहा गया है। इससे प्राण व्यक्ति अथवा विश्वका सामर्थ्य
बन गया है। उपनिषदोंमें सारे वस्तु प्राणसे उत्पन्न होकर उसीमें लय होते हैं ऐसा भी कहागया है।
इस प्राणको भूतोंका मध्यबिंदु माना है। छांदोग्योपनिषदमें वायुही मूलतत्त्वमाना है। कहा
गया है “वायु सबको विलीन करनेवाला तत्त्व है। कोई भी पदार्थ हो उसीमें विलीन होता है।
अग्नि बुझ जाता है तो वायुमें। सूर्य वायुमें अस्त होता है। पानी वायुमें सूख जाता है। वायु ही
सबको पूर्णरूपसे निगल जाता है !” अंत जिसमें होता है उत्पन्न भी उसीमेंसे होता है यह मान
लेना है ! इस विश्वमें सतत और संतत चलनेवाला प्राणवायुका प्रवाह ही मूलभूत जीवन तत्त्व
होनेकी बात पुराने ग्रीक दार्शनिकोंने भी कही है। ईशावास्योपनिषदमें संभवतः समष्टिरूप जो वायु
अनिल कहा है वही यह संतत बहनेवाला प्राणवायु है। तैत्तिरीय उपनिषदमें “जिससे ये सब भूत
उत्पन्न होते हैं, और उत्पन्न होनेपर जीते हैं तथा अंतमें सब इसीमें विलीन होते हैं वही एक
मूलतत्त्व है। वही ब्रह्म है !” और ग्रीक तत्त्वज्ञ यही वाक्य दुहराकर इस तत्त्वको वायु कहते हैं।
इसका विवेचन करते समय ग्रीक तत्त्वज्ञ कहता है “मनुष्य या अन्य प्राणी श्वासोच्छ्वासके वायुसे
ही जीते हैं। इसलिये वायु यह चिरंजीवी, शक्तिमान श्रेष्ठ ऐसा तत्त्व है।”
आकाश—प्रवाहण जैबालीने आकाशको सारे जगतका उत्पत्तिकारण माना है। यह इस
जगतकी अंतिम गतिके विषयमें भी कहता है। विश्वका आकाश बनेगा। इसके मतसे सभी भूत
ज्ञानेश्वरी १६२