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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1008

समाज है। इनको अतिमानव माना गया है। पुरानी पोथियोंमें गंधर्वोकी उत्पत्तिके विषयमें अनेक
प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। ऋग्वेदमें भी गंधर्वोंका उल्लेख है। गंधर्व सौंदर्य-प्रिय, अलंकार-प्रिय,
तथा स्त्री-लंपट जाति है। वे फूलके पागल हैं। इनकी स्त्रियोंको अप्सरा कहते हैं। इनमें नृत्य
संगीत वाद्य-कला निपुण सुंदर-कन्याओंका विवाह न करनेकी प्रथा थी। ये सामाजिक संपत्ति थी।
कलोपासना ही इनका ध्येय। संभवतः इसीलिये संगीत शास्त्रको गंधर्व-वेद कहा जाता है।
गंधर्वोंके आठ गण कहे गये हैं (१) हाहा, (२) हूहू (३) चित्ररथ (४) हंस
(५) विश्वावसु (६) गोमायू (७) तुंबुरु (८) नंदी। अग्नि-पुराणमें ११ गण कहे गये हैं।
(१) भन्नास (२) अंगारी (३) बंभारी (४) सूर्यवच (५) कृधू (६) हस्त (७) सुहस्त
(८) मूर्द्धन्वान् (९) महामना (१०) विश्वावसू (११) कृशानु ।
चित्ररथ—कश्यप और मुनिका गंधर्वपुत्र । इसका नाम अंगारपर्ण। फिर यह चित्ररथ
कहा जाने लगा। लाक्षाग्रहसे छूटकर जाते समय अर्जुनकी इससे लडाई हुई थी। अर्जुनका
पराक्रम देखकर प्रसन्न होकर अंगारपर्णने अर्जुनको कई विद्याएं सिखाईं। अर्जुनसे भी कुछ सीखा।
युधिष्ठिरके राज-सूय यज्ञमें इसने उन्हे १०० घोडे दिये थे। इसीने युधिष्ठिरको किसीको देखकर
किस वर्णाश्रमका है यह जाननेकी विद्या सिखाई। तथा तपस्यासंपर्णाख्यान सुनाया।
गीता १०. श्लो० २६-सिद्धोंमें कपिल मुनि—
सिद्ध—विश्वमें जो अनेक गूढ रहस्य हैं उनमें शरीर रहित चैतन्यका संचार भी एक गूढ
तम रहस्य है। यह भी एक योनि है। ये केवल मानवोंमें ही नहीं अतिमानवोंमें भी हैं जो
विश्वके प्रभावी देवता या शक्तियोंके हस्तक बन कर लोकहितके कार्यमें निमग्न होते हैं। साथ
साथ भक्त, ज्ञानी, योगी आदि जीवनमें कृतकृत्य होकर देहपातके बाद उपास्य देवताकी आज्ञासे
उनके हस्तक बन कर काम करते हैं। इन्हे देवताके समान मान दिया जाता है। योगसाधनमें
ऐसे सिद्ध अत्यंत सहायक होते हैं। पतंजल-योगके विभूति-पादमें सिद्धदर्शन भी एक विभूति
है। सिद्धोंके विषयमें इनकी परंपराओंके विषयमें अध्ययन पूर्वक अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं।
ये सिद्ध ईश्वरके समान नित्य माने गये हैं। “विश्वमें होनेवाले लोककल्याणकारी महान घटना-
ओंमें सिद्धोंका हाथ रहता है” ऐसे अनेक विद्वानोंने मुक्त-कंठसे कहा है। अर्थात् देह रहित लोक
हितकारी नित्य-चैतन्य शक्तिको सिद्ध कह सकते हैं और इन सिद्धोंमें—
कपिल मुनि—कर्दम और देवहूतीका पुत्र । इसका स्थान सिद्धपुर या और (?) बिंदुसर ।
इसने अपनी माताको ब्रह्मज्ञान कहा। जब यह समाधिस्थ था पिताके अश्वमेधके घोडोंके अश्व
रक्षक सगर पुत्रोंने-इसीने अश्व चुराया इस भ्रमसे-इस पर शस्त्र प्रहार किया और इसकी आंखोंसे
निकली क्रोध ज्वालासे जल कर राख हो गये।
इसको आदि सिद्ध माना गया है। आसुरी इसका शिष्य, यह प्रत्यक्ष शिष्य नहीं है।
कपिलप्रतिपादित सिद्धांतका स्फुरण मुझमें हुवा ऐसे यह कहता है। कपिलको सांख्यशास्त्रका
आदि प्रवर्तक माना जाता है। तत्त्वज्ञानके सहारे मोक्ष प्राप्त करना इस शास्त्रका उद्देश है। सांख्य
शास्त्र कर्मकांडसे ज्ञानको अधिक महत्व देता है। उपनिषद् भी ज्ञानको कर्मसे श्रेष्ठ मानते हैं।
ज्ञानेश्वरी ६२