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सर्वकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 680 में से

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पृष्ठ 95

प्रथम उद्योतः ३५
ध्वन्यालोकः
केचित्पुनर्लक्षणकरणशालीनबुद्धयो ध्वनेस्तत्त्वं गिरामगोचरं
सहृदयहृदयसंवेद्यमेव समाख्यातवन्तः । तेनैवंविधासु विमतिषु स्थितासु
सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपं ब्रूमः ।
फिर लक्षण बनाने में शालीनबुद्धि कुछ लोगों ने ध्वनि के तत्त्व को वाणी से
परे, केवल सहृदय जनों के हृदय द्वारा संवेद्य, समाख्यान किया है। इस कारण, इस
प्रकार की विमतियों के होने पर सहृदय जनों के मन की प्रसन्नता के लिए हम उस
( ध्वनि ) का स्वरूप कहते हैं।
लोचनम्
शालीनबुद्धय इति । अप्रगल्भमतय इत्यर्थः । एते च त्रय उत्तरोत्तरं
भव्यबुद्धयः । प्राच्या हि विपर्यस्ता एव सर्वथा । मध्यमास्तु तद्रूपं जानाना
अपि सन्देहेनापह्नुवते । अन्त्यास्त्वनपह्नुवाना अपि लक्षयितुं न जानत इति
नहीं किया, प्रत्युत उपालम्भ ही करने लगे। नहीं भग्न हुए नारियल की भाँति जैसा
सुना वैसा ही उस ग्रन्थ का उद्ग्रहण (धारण) मात्र कर लिया। अत एव कहते हैं—
परिकल्पना १ करके इस प्रकार कहा है—। यदि इस प्रकार ग्रन्थार्थ की योजना नहीं
करते हैं तो 'ध्वनि-मार्ग को स्पर्श करके' यह पूर्वपक्ष का कथन विरुद्ध हो जाता।
शालीनबुद्धि—। अर्थात् अप्रगल्भमति । ये तीनों (विप्रतिपत्तिकार उत्तरोत्तर
भव्यबुद्धि हैं। क्योंकि पहले वाले (अभाववादी) सर्वथा विपर्यय में पड़ गए हैं। मझले
(भाक्तवादी) उस (ध्वनि) का स्वरूप जानते हुए भी सन्देह के कारण छिपा देते
हैं। और अन्त वाले नहीं छिपाते हुए भी (ध्वनि को) लक्षित करना नहीं जानते हैं।
इस क्रम से इन (विप्रतिपत्तिकारों) का विपर्यास, सन्देह और अज्ञान का प्राधान्य है।
जाता है। 'गङ्गायां घोषः' आदि स्थल में सामीप्य आदि धर्म 'गुण' है, उन्हीं गुण रूप उपायों से जिस
'गङ्गा' आदि शब्द की अर्थान्तर 'तीर' आदि में वृत्ति हो, यह 'गुणवृत्ति' का शब्दपरक समास है।
उन्हीं उपायों से तीरादि अर्थ में जिस शब्द की वृत्ति हो, यह उसका अर्थपरक समास है और
'गुण द्वारा वर्तन गुणवृत्ति है, यह अमुख्य अभिधा व्यापार-परक समास है। 'ध्वनति', 'ध्वन्यते',
'ध्वननम्' इस रूप में 'ध्वनि' शब्द भी शब्द, अर्थ और व्यापार इन तीनों में सङ्गत होता है।
इस प्रकार भाक्तवादी के कहने का तात्पर्य है कि 'ध्वनि' तत्त्व उपचरित शब्द, अर्थ और व्यापार
के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। उनका दृढ़ पक्ष यह है कि किसी भी शब्द के दो ही अर्थ हो सकते हैं
मुख्य या अमुख्य। जब मुख्य अर्थ में अभिधा को व्यापार स्वीकार किया गया, तब अमुख्य अर्थ
ही शेष रहा, ऐसी स्थिति में ध्वनि 'भाक्त' ही सिद्ध होता है। क्योंकि अर्थ की कोई तृतीय
राशि मुख्य और अमुख्य के अतिरिक्त सम्भव नहीं।
१. जैसा कि वृत्तिग्रन्थ में आचार्य ने जो कहा है कि प्राचीन आचार्यों ने काव्यों में अमुख्य
व्यवहार का संकेत किया है उसका स्पष्टीकरण 'लोचन' में आचार्य अभिनवगुप्त ने भामह, भट्टोद्भट
एवं वामन की उक्तियों को उद्धृत करके किया है। भामह और भट्ट उद्भट ने मुख्य के अतिरिक्त
गुणवृत्ति व्यापार को और वामन ने सादृश्य से लक्षणा को 'वक्रोक्ति' के रूप में स्वीकार किया है।