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सर्वकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 680 में से

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पृष्ठ 80

२० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु ।
पृथक्पृथगनुप्रासमुशन्ति कवयः सदा ॥ इति ॥
पृथक्पृथगिति । परुषानुप्रासा नागरिका । मसृणानुप्रासा उपनागरिका,
ललिता । नागरिकाया विदग्धया उपमितेति कृत्वा । मध्यममकोमलपरुष-
मित्यर्थः । अत एव वैदग्ध्यविहीनस्वभावासुकुमारापरुषग्राम्यवनितासादृश्यादियं
'इन तीन वृत्तियों में सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों के उपनिबन्ध (के रूप में)
पृथक् पृथक् अनुप्रास को सदा कवि लोग चाहते हैं।'
पृथक् पृथक्- । परुष¹ अनुप्रास वाली (वृत्ति) नागरिका है, मसृण अनुप्रास
वाली वृत्ति उपनागरिका या ललिता है। नागरिका या विदग्धा से उपमित, यह करके ।
मध्यम अर्थात् अकोमल एवं अपरुष । अत एव वैदग्ध्य से विहीन स्वभाव वाली होने
के कारण असुकुमार एवं अपरुष ग्राम्य वनिता के सादृश्य से यह (तृतीया वृत्ति)
अर्थात् इन्हें छोड़कर न टिकने वाली बताया है, उन्हीं में पहले यह सिद्ध करते हैं कि किस प्रकार
वृत्तियाँ अनुप्रास अलङ्कार की आश्रयभूत जातियाँ हैं। वर्णनीय या वर्णन के विषय अपने स्वभाव
के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं—दीप्त (तीव्रता या तीखापन लिए हुए, रौद्र आदि रस में),
मसृण (अर्थात् मधुर, जैसे शृङ्गार आदि रस में), मध्यम (दोनों निर्दिष्ट स्वभाव के बीच के
स्वभाव का वर्णनीय, जैसे हास्य आदि रस में)। इस प्रकार दीप्त के परुषत्व स्वरूप, मधुर के
ललितत्व-स्वरूप एवं मध्यम के मध्यमत्व-स्वरूप के विवेचन के लिए अनुप्रास की तीन जातियाँ
बताई गई हैं। इस प्रकार अनुप्रास इन वृत्तियों का आधारित अलङ्कार हैं। इसी कारण 'अनुप्रास'
शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखते हैं—'वर्तन्ते अनुप्रासभेदा आसु' अर्थात् वर्तमान हैं अनुप्रास के
भेद इनमें। इस तथ्य को लोचनकार ने आचार्य उद्भट के 'काव्यालङ्कार सारसंग्रह' से वचन (१. ८)
उद्धृत करके प्रमाणित किया है। आचार्य उद्भट के अनुसार अनुप्रास में वृत्तियों के अनुसार
सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों का उपनिबन्धन पृथक्-पृथक् रूप से कवियों का अभिप्रेत होता है,
अर्थात् कवि लोग वर्णनीय वस्तु के स्वभाव के अनुसार शब्दचयन करने का प्रयत्न करते हैं।
इसी प्रसङ्ग में आचार्य उद्भट ने अपने ग्रन्थ में तीन वृत्तियों में किस-किस प्रकार के सजातीय
व्यञ्जन प्रयुक्त होते हैं, इसका निर्देश किया है—
शषाभ्यां रेफसंयोगैष्टवर्गेण च योजिता । परुषा नाम वृत्तिः स्याद् ल्हह्लाद्यैश्च संयुता ॥
सरूपसंयोगयुतां मूर्ध्नि वर्गान्त्ययोगिभिः । स्पर्शैर्युतां च मन्यन्त उपनागरिकां बुधाः ॥
शेषैर्वर्णैर्यथायोगं कथितां कोमलाख्यया । ग्राम्यां वृत्तिं प्रशंसन्ति काव्येष्वादृतबुद्धयः ॥
(१. ५-७)
इसके अनुसार वृत्तियों में निम्न प्रकार के व्यञ्जनों का प्रयोग होता है—
परुषा—श, ष, रेफ के संयोग, टवर्ग, ल्ह, ह्ल, ह्य आदि ।
उपनागरिका—समानरूप वर्णों के संयोग, वर्ग के अन्त्य अक्षर से शिरोभाग में युक्त स्पर्श
वर्ण (क से लेकर म तक के वर्ण)।
कोमला अथवा ग्राम्या—यथायोग शेष वर्ण।
१. निर्दिष्ट तीन प्रकार की वृत्तियों के नामकरण की सार्थकता का निर्देश करते हैं। वह वृत्ति
'नागरिका' कहलाती है जो परुष वर्णों से आरब्ध होने के कारण परुष अनुप्रास से युक्त होती है।
'परुषा' वृत्ति ही 'नागरिका' कहलाती है। मसृण या स्निग्ध वर्णों के अनुप्रास वाली वृत्ति 'उप-
नागरिका' कहलाती है। इसे 'ललिता' भी कहते हैं। 'उपमिता नागरिकया उपनागरिका' इस