ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
आक्रन्दाः स्तनितैर्विलोचनजलान्यश्रान्तधाराम्बुभि-
स्तद्विच्छेदभुवश्च शोकशिखिनस्तुल्यास्तडिद्विभ्रमैः ।
अन्तर्मे दयितामुखं तव शशी वृत्तिः समैवावयो-
स्तत्किं मामनिशं सखे जलधर त्वं दग्धमेवोद्यतः ॥
इत्यादौ ।
रसनिर्वहणैकतानहृदयो यं च नात्यन्तं निर्वोढुमिच्छति । यथा—
हे मित्र मेघ, मेरे आक्रन्द ( वियोगजनित आक्रन्दन ) तुम्हारे गर्जनों के, मेरे
आंखों के जल तुम्हारे निरन्तर धाराजलों के एवं उस ( प्रिया ) के विच्छेद से उत्पन्न
हुए ( मेरे ) शोकाग्नि ( तुम्हारे ) विद्युद्विलासों के सदृश हैं, मेरे हृदय में प्रिया का
मुख है, तुम्हारे भीतर चन्द्रमा है, इस प्रकार मेरी और तुम्हारी वृत्ति बराबर है, फिर
क्यों तुम निरन्तर मुझे जला डालने के लिए तत्पर हो ?
इत्यादि में ।
रसनिर्वाह में एकाग्र-हृदय (कवि) और जिसका अत्यन्त ( आदि से अन्त तक )
निर्वाह करना नहीं चाहता । जैसे—
लोचनम्
एवं ग्रहणत्यागौ समर्थ्य 'नातिनिर्वहणैषिता' इति भागं व्याचष्टे—
रसेति । चकारः समीक्षाप्रकारसमुच्चयार्थः । बाहुलतिकाया बन्धनीयपाशत्वेन
रूपणं यदि निर्वाहयेत् , दयिता व्याधवधूः, वासगृहं कारागारपञ्जरादीति पर-
इस प्रकार ग्रहण और त्याग का समर्थन करके 'दूर तक निर्वाह करने की इच्छा
न हो' इस भाग की व्याख्या करते हैं—रस०—। 'और' ( 'च' ) समीक्षा के प्रकारों
के समुच्चयार्थ है । बाहुलतिका का बन्धनीय पाश के रूप में रूपण को यदि निर्वाह
करता, प्रिया को व्याध की पत्नी एवं वासगृह को कारागार-पञ्जर बनाता तो यह अधिक
भिन्न हैं । यदि ऐसी स्थिति में भी संकर ही मानते हैं तब 'संसृष्टि' का विषय समाप्त हो जायगा ।
इस पर संकर-वादी पुनः कहता है कि यहां माना कि एकाश्रयानुप्रवेश रूप संकर नहीं है, किन्तु
अङ्गाङ्गिभाव या अनुग्राह्यानुग्राहक भाव रूप संकर तो अनिवार्य है, क्योंकि यहां श्लेष के द्वारा ही
व्यतिरेक आत्मलाभ कर रहा है । इस पर कहते हैं कि 'नो कल्पापाय०' में बिना उपमा के व्यतिरेक
पाया जाता है, ऐसी स्थिति में श्लेष को व्यतिरेक का अनुग्राहक नहीं माना जा सकता । तब वादी
कहता है कि 'रक्तस्त्वं०' में श्लेष मात्र से चारुत्व की प्रतीति नहीं है अतः उसे व्यतिरेक का अङ्ग
मानना ही होगा । तब वादी को निरुत्तर करते हुए 'आक्रन्दाः०' इस उदाहरण में श्लेष के बिना
उपमा और व्यतिरेक दिखाया । इस प्रकार यह सिद्धान्तित किया कि प्रस्तुत उदाहरण में श्लेष
और व्यतिरेक दोनों की संसृष्टि है और व्यतिरेक की विवक्षा से प्रबन्धप्रवृत्त भी श्लेष त्यक्त होता
हुआ रसविशेष ( विप्रलम्भ शृङ्गार ) का पोषक है ।