ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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ध्वन्यालोकः
अनित्या दोषाश्च ये श्रुतिदुष्टादयः सूचितास्तेऽपि न वाच्ये अर्थ-
मात्रे, न च व्यङ्ग्ये शृङ्गारव्यतिरेकिणि शृङ्गारे वा ध्वनेरनात्मभूते ।
किं तर्हि ? ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारेऽङ्गितया व्यङ्ग्ये ते हेया इत्युदाहृताः ।
अन्यथा हि तेषामनित्यदोषतैव न स्यात् । एवमयमसंलक्ष्यक्रमद्योतो
ध्वनेरात्मा प्रदर्शितः सामान्येन ॥ ११ ॥
अनित्य दोष जो श्रुतिदुष्ट आदि सूचित किए गए हैं वे भी न अर्थमात्र वाच्य में
और न शृङ्गाररहित व्यङ्ग्य में अथवा न ध्वनि के अनात्मभूत शृङ्गार में होते हैं ।
तब क्या होते हैं ? अङ्गीरूप व्यङ्ग्य ध्वन्यात्मा शृङ्गार में ही वे त्याज्य कहे गए हैं।
ऐसा न माना जाय तो उनका अनित्य दोष होना ही नहीं बनेगा । इस प्रकार
सामान्य रूप से यह असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का आत्मा बताया गया ॥ ११ ॥
लोचनम्
सर्पति' इति । कल्पनादुष्टास्तु द्वयोः पदयोः कल्पनया । यथा 'कुरु रुचिम्' इत्यत्र
क्रमव्यत्यासे । श्रुतिकष्टस्तु अधाक्षीत् अक्षोत्सीत् तृणेढि इत्यादि । शृङ्गार
इत्युचितरसोपलक्षणार्थम् । वीरशान्ताद्भुतादावपि तेषां वर्जनात् । सूचिता इति ।
न त्वेषां विषयविभागप्रदर्शनेनानित्यत्वं भिन्नवृत्तादिदोषेभ्यो विविक्तं प्रदर्शितम्।
नापि गुणेभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । बीभत्सहास्यरौद्रादौ त्वेषामस्माभिरुपगमात्
शृङ्गारादौ च वर्जनादनित्यत्वं च दोषत्वं च समर्थितमेवेति भावः ॥ ११ ॥
हैं, जैसे 'कुरु रुचिम्' इस क्रम को बदल देने पर । 'श्रुतिकष्ट' है, 'अधाक्षीत्'
'अक्षोत्सीत्', 'तृणेढि' इत्यादि । उचित रस के उपलक्षण के लिए 'शृङ्गार' का प्रयोग
किया है । वीर, शान्त, अद्भुत आदि रसों में भी उन (दोषों) का वर्जन है ।
सूचित—। न कि विषय-विभाग दिखाने से इन के अनित्यत्व को भिन्नवृत्त आदि दोषों
से अलग दिखाया गया है । और न कि इनका गुणों से व्यतिरिक्तत्व भी बताया है ।
बीभत्स, हास्य और रौद्र आदि में इन दोषों को हमने स्वीकार किया है और शृङ्गार
आदि में इनका वर्जन किया है, अतः इनके अनित्यत्व और दोषत्व का समर्थन ही
किया है ॥ ११ ॥
गुण और अनुप्रासादि अलङ्कार दोनों ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं। लौकिक गुण और
अलङ्कार में भेद अवश्य है, किन्तु काव्य के गुण और अलङ्कार में भेद की कल्पना गड्डुलिका-प्रवाह
(भेड़चाल) है। आलोक और लोचन में गुण को रसनिष्ठ धर्म एवं अलङ्कार को शब्द-अर्थनिष्ठ
धर्म माना है, इस प्रकार आश्रयभेद से भेद है।
प्रस्तुत ग्रन्थ में माधुर्य, ओजस् और प्रसाद ये तीन ही गुण माने हैं। जो कि प्राचीन ग्रन्थों में
दस शब्द-गुण और दस अर्थ-गुणों का उल्लेख मिलता है उसका अन्तर्भाव, जैसा कि 'काव्यप्रकाश'
में बताया गया है इन्हीं तीन गुणों में हो जाता है। यह विषय 'काव्य-प्रकाश' (अष्टम उल्लास)
से विदित कर लेना चाहिए ।