ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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ध्वन्यालोकः
तत्प्रकाशनपरश्चार्थोऽनपेक्षितदीर्घसमासरचनः प्रसन्नवाचका-
भिधेयः । यथा—
यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां
यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गर्भशय्यां गतो वा ।
और उस ( ओज ) का प्रकाशक, दीर्घ समास की अपेक्षा न करनेवाला, प्रसन्न
( प्रसाद-युक्त ) वाचकों द्वारा अभिहित अर्थ है, जैसे—
पाण्डवी सेनाओं में अपनी भुजाओं पर अधिक गर्व करनेवाला जो-जो ( व्यक्ति )
शस्त्र धारण करता है, पाञ्चाल के गोत्र में जो-जो बड़ा-छोटा अथवा अभी गर्भ में
लोचनम्
क्रोधस्यैवोद्दीपनविभावत्वं कृतमिति नात्र शृङ्गारशङ्का कर्तव्या । सुयोधनस्य
चानादरं द्वितीयगदाघातदानाद्यनुद्यमः । स च सञ्चूर्णितोरुत्वादेव । स्त्यान-
ग्रहणेन द्रौपदीमन्युप्रक्षालने त्वरा सूचिता । समासेन च सन्ततवेगवहनस्व-
भावात् तावत्येव मध्ये विश्रान्तिमलभमाना चूर्णितोरुद्वयसुयोधनानादरणप-
र्यन्ता प्रतीतिरेकत्वेनैव भवतीत्यौद्धत्यस्य परं परिपोषिका । अन्ये तु सुयोध-
नस्य सम्बन्धि यत्स्त्यानावबद्धं घनं शोणितं तेन शोणपाणिरिति व्याचक्षते ।
य इति । स्वभुजयोर्गुरुर्मदो यस्य चमूनां मध्येऽर्जुनादिरित्यर्थः । पाञ्चा-
लराजपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन द्रोणस्य व्यापादनात्तत्कुलं प्रत्यधिकः क्रोधावेशोऽश्व-
त्थाम्नः । तत्कर्मसाक्षीति कर्णप्रभृतिः । रणे सङ्ग्रामे कर्तव्ये यो मयि सद्विपये
इस सम्बोधन से क्रोध का ही उद्दीपन विभाव रूप का सम्पादन किया है, ऐसी स्थिति
में यहाँ 'शृङ्गार' की शंका नहीं करनी चाहिए ।
दूसरी बार गदा का आघात देने का उद्योग न करना, यह सुयोधन का अनादर
है । वह अनुद्योग उसके ऊरुयुगल के सञ्चूर्णित हो जाने से ही स्पष्ट हो जाता है ।
'स्त्यान' ( 'घनीभूत' ) कहने से द्रौपदी के क्रोध के प्रक्षालन में त्वरा सूचित की है ।
और समास के द्वारा निरन्तर वेग से बहने के स्वभाव के कारण तब तक मध्य में
विश्राम न प्राप्त करती हुई, चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के अनादरण तक
पर्यवसित प्रतीति एकरूप से होती है, इस प्रकार वह ( भीम के ) औद्धत्य का पूर्ण
रूप से परिपोष करती है। दूसरे लोग व्याख्या करते हैं कि 'सुयोधन का जो
स्त्यानावबद्ध ( जोर से निकल कर घनीभूत ), घन ( अर्थात् गाढ़ा ) जो शोणित, उससे
लाल हाथ वाला' ।
पाण्डवी सेनाओं में—सेनाओं के बीच अपनी भुजाओं पर अधिक मद है जिसका,
अर्थात् अर्जुन आदि । पाञ्चाल नरेश के पुत्र धृष्टद्युम्न ने द्रोण का वध किया, अतः
उसके कुल के प्रति अश्वत्थामा का क्रोधावेश अधिक है । उस ( द्रोणवध रूप ) कर्म के
साक्षी, ( आंखों के सामने द्रोण का वध देखने वाले ) कर्ण प्रभृति । मेरे द्वारा कर्तव्य