ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
पूर्वं हि समासोक्त्यादिषु वस्तुध्वनेर्नान्तर्भाव इति दर्शितम् । वाच्यं च वाचकं
च तच्चारुत्वहेतवश्चेति द्वन्द्वः । वृत्तावपि शब्दाश्चालङ्काराश्चार्थाश्चालङ्काराश्चेति
द्वन्द्वः। मत इति। पूर्वमेवैतदुक्तमित्यर्थः । ननूक्तं भट्टनायकेन—'रसो यद्वा
अन्तर्भाव नहीं है। पहले दिखा चुके हैं कि समासोक्ति आदि अलङ्कारों में वस्तुध्वनि
का अन्तर्भाव नहीं है। 'वाच्य और वाचक और उनके चारुत्वहेतु' यह द्वन्द्व समास है।
वृत्ति में भी 'शब्द, अलङ्कार और अर्थालङ्कार' यह द्वन्द्व समास है। माना गया है।—
अर्थात् पहले ही यह कहा जा चुका है। शङ्का—भट्टनायक' ने कहा है 'रस यदि परगत
१. इसके सम्बन्ध में विभिन्न आचार्यों के सैद्धान्तिक विचारों के जानने के पूर्व सामान्यतः
यहाँ भरत मुनि के 'रससूत्र' से परिचित होना आवश्यक है, क्योंकि प्राचीन सभी व्याख्याएँ
उन्हीं के रस-सूत्र पर आधारित हैं। भरतमुनि कहते हैं—'विभावानुभावसञ्चारिसंयोगाद्रस-
निष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारी या व्यभिचारी भाव के संयोग से (स्थायीभाव)
रस रूप में निष्पन्न होता है। इसके पूर्व कि हमें इस सूत्र की विभिन्न व्याख्याएँ विदित हों, विभाव
आदि को समझ लेना आवश्यक है।
स्थायीभाव—वासना के रूप में बहुत काल तक प्राणियों के, विशेष रूप से मनुष्य के भीतर
स्थिर रहने वाली चित्तवृत्तियाँ 'स्थायीभाव' कहलाती हैं। साहित्य-शास्त्र में आठ स्थायीभावों
का निर्देश है—
रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा।
जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः॥
कुछ लोगों ने 'निर्वेद' (वैराग्य) को भी एक स्थायीभाव माना है।
विभाव—वे पदार्थ, जिनसे स्थायीभाव उद्बुद्ध होते हैं 'विभाव' कहलाते हैं। वे दो प्रकार
के हैं—आलम्बन और उद्दीपन। नायक-नायिका आलम्बन-विभाव हैं और उद्यान, चन्द्रोदय आदि
उद्दीपन-विभाव हैं। आलम्बन-विभाव से स्थायीभाव उद्बुद्ध हो जाता है और उद्दीपन-विभाव से
अङ्कुरित हो जाता है। अङ्कुरण भी उद्बोधन का ही एक रूप है।
अनुभाव—बाह्य कटाक्ष आदि चेष्टाएँ 'अनुभाव' कहलाती हैं। इनसे स्थायीभाव प्रतीत होने
लगता है। विभाव स्थायीभाव के कारण माने जाते हैं अनुभाव कार्य। चेष्टाएँ स्थायीभाव या
उद्बुद्ध वासना के अनुसार होती हैं अतः पश्चात् होने के कारण उन्हें 'अनुभाव' कहते हैं
(अनु पश्चाद् भवन्तीत्यनुभावाः)। इन कार्य रूप अनुभावों अर्थात् कटाक्षादि चेष्टाओं से रत्यादि
स्थायीभाव शीघ्र अवगत हो जाते हैं।
सञ्चारी भाव या व्यभिचारी भाव—ये स्थिर न रहनेवाली चित्तवृत्तियाँ हैं। जब कि स्थायीभाव
स्थायी होते हैं तो ये व्यभिचारीभाव अस्थायी होते हैं।
इस प्रकार आलम्बन और उद्दीपन विभावों से स्थायीभाव उद्बुद्ध होता है, अनुभावों से प्रतीति
के योग्य होता है और व्यभिचारियों से परिपोष प्राप्त कर आस्वाद्यमान हो 'रस' हो जाता है।
इस प्रकार साहित्यिक आचार्यों ने रस आठ माने हैं—
शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसाः स्मृताः॥
जिन्होंने 'निर्वेद' को भी स्थायीभाव माना है, वे 'शान्त' को नवम रस मानते हैं।