सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 234

१७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अर्थान्तरे सङ्क्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् ।
अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विधा मतम् ॥ १ ॥
तथाविधाभ्यां च ताभ्यां व्यङ्ग्यस्यैव विशेषः ।
अर्थान्तर में सङ्क्रमित और अत्यन्त तिरस्कृत, इस रूप से अविवक्षितवाच्य
ध्वनि का वाच्य दो प्रकार का माना गया है ॥ १ ॥
क्योंकि उन (दोनों प्रकार के वाच्यों) से व्यङ्ग्य का ही विशेष (उत्कर्ष) है।
लोचनम्
मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः । सङ्क्रमितमिति
णिचा व्यञ्जना व्यापारे यः सहकारिवर्गस्तस्यायं प्रभाव इत्युक्तं तिरस्कृतशब्देन
च । येन वाच्येनाविवक्षितेन सताऽविवक्षितावाच्यो ध्वनिर्व्यपदिश्यते तद्वाच्यं
द्विधेति सम्बन्धः । योऽर्थ उपपद्यमानोऽपि तावतैवानुपयोगाद्धर्मान्तरसंवलन-
यान्यतामिव गतो लक्ष्यमाणोऽनुगतधर्मी सूत्रन्यायेनास्ते स रूपान्तरपरिणत
उक्तः । यस्त्वनुपपद्यमान उपायतामात्रेणार्थान्तरप्रतिपत्तिं कृत्वा पलायत इव
स तिरस्कृत इति । ननु व्यङ्ग्यात्मनो यदा ध्वनेर्भेदो निरूप्यते तदा वाच्यस्य
द्विधेति भेदकथनं न सङ्गतमित्याशङ्क्याह—तथाविधाभ्यां चेति । चो यस्मा-
कारिकाकार को भी सम्मत ही है। 'सङ्क्रमित' इस 'णिच्' प्रत्यय से और 'तिरस्कृत'
शब्द से व्यञ्जना व्यापार में जो सहकारी वर्ग है उसका प्रभाव है, यह कहा¹ है।
सम्बन्ध यह है कि जिस वाच्य के अविवक्षित होने से अविवक्षितवाच्य ध्वनि कहा
जाता है वह वाच्य दो प्रकार का है। जो अर्थ उपपन्न होता हुआ भी, उतने ही
अंश में उपयोग के न होने से धर्मान्तर के मिल जाने के कारण, दूसरा बना—जैसा
मालूम पड़ता हुआ, धर्मी के अनुगत होने की स्थिति में सूत्र की भाँति, होता है,
वह रूपान्तर-परिणत (अर्थान्तरसङ्क्रमित) कहा गया है। परन्तु जो कि अनुपपन्न होता
हुआ, उपायमात्र होने के कारण (क्योंकि मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी लक्षण का
निमित्त है) दूसरे अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करके जैसे पलायन कर जाता है, वह
तिरस्कृत कहा जाता है। (शंका) जब कि व्यङ्ग्य रूप ध्वनि का भेद-निरूपण
करते हैं, तब वाच्य का 'द्विधा' यह भेदकथन सङ्गत नहीं होता है, यह आशङ्का
करके कहते हैं—उन दोनों प्रकार के—। 'च' 'और' का प्रयोग ('यस्मात्') य!
१. वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता, प्रत्युत सङ्क्रान्त कराया जाता है अर्थात्
'सङ्क्रमित' होता हैं, इस प्रकार यहाँ 'णिच्' प्रत्यय के प्रयोग से प्रयोजक कर्ता की अपेक्षा है, यहाँ
प्रयोजक कर्ता है व्यञ्जना-व्यापार में सहकारिवर्ग, अर्थात् लक्षणा और वक्ता की विवक्षा आदि।
बिना इनकी सहायता से वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता। यही स्थिति 'तिरस्कृत' शब्द
की भी है। प्रस्तुत अविवक्षित वाच्य ध्वनि को इसी कारण 'लक्षणामूल ध्वनि' भी कहते हैं।
लक्षणा के आधार पर ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ये दो भेद