ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 14, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें( १० )
रसादि ध्वनि किसी भी स्थिति में, बल्कि स्वप्न में भी अभिहित नहीं होता, इसलिए अलौकिक
है। इस प्रकार ध्वनिकार के मत में रस ही वस्तुतः आत्मा है, वस्तु और अलङ्कार ध्वनियों का
पर्यवसान सर्वथा रस के प्रति होता है, इसलिए वाच्य से उत्कृष्ट होते हैं। अतः सामान्यतः तीनों
के लिए 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहा है (दे० लोचन, पृ० ४०, ४५, ५०, ५१, ७९, ८६, ९२)।
स्वयं आचार्य आनन्दवर्धन ने रस की स्वशब्दवाच्यता का प्रत्याख्यान विस्तार के साथ
किया है (पृ० ८१-८४)।
मथितार्थ यह कि ध्वनि की प्रतिष्ठा प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ पर है। ध्वनि व्यङ्ग्य अर्थ की
प्रधानता की स्थिति में होता है। वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतिष्ठा या भूमि है, इसलिए वह सर्वथा
ध्वनि के प्रकरण में उपेक्ष्य नहीं। इसी कारण द्वितीय कारिका में ध्वनिकार ने प्रतीयमान अर्थ के
साथ वाच्य अर्थ का समशीर्षिकया गणन किया है, यद्यपि प्रतीयमान अर्थ ही काव्य का आत्मा या
सर्वस्व है।
'ध्वनि' का अर्थ
ध्वन्यालोक में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग पाँच अर्थों में किया गया है—व्यङ्ग्य अर्थ, वाचक शब्द,
वाच्य अर्थ, व्यञ्जना व्यापार और समुदाय रूप काव्य। जैसा कि आचार्य अभिनवगुप्त लिखते हैं—
अर्थो वा शब्दो वा व्यापारो वा। अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्येवम्।
व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति। व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति। कारिकया तु प्राधान्येन
समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम्। पृ० १०४-५
तेन वाच्योऽपि ध्वनिः वाचकोऽपि शब्दो ध्वनिः, द्वयोरपि व्यञ्जकत्वं ध्वनतीति कृत्वा।
सम्मिश्रयते विभावानुभावसंवलनयेति व्यङ्ग्योऽपि ध्वनिः, ध्वन्यत इति कृत्वा। शब्दनं
शब्दः शब्दव्यापारः, न चासावभिधादिरूपः, अपि त्वात्मभूतः, सोऽपि ध्वनिः। काव्यमिति-
व्यपदेश्यश्च योऽर्थः सोऽपि ध्वनिः, उक्तप्रकारध्वनिचतुष्टयमयत्वात्। पृ० १४१-१४२
पञ्चधाऽपि ध्वनिशब्दार्थे येन यत्र यतो यस्य यस्मै इति बहुव्रीह्यर्थाश्रयेण यथोचितं
सामानाधिकरण्यं सुयोज्यम्। पृ० १४३
'ध्वनि' शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त पाँचों अर्थों में इस प्रकार योजना होगी —
(१) ध्वनतीति ध्वनिः; (२) ध्वन्यत इति ध्वनिः; (३) ध्वननं ध्वनिः।
प्रथम के अनुसार वाच्य अर्थ और वाचक शब्द 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होते हैं, द्वितीय के
अनुसार केवल व्यङ्ग्य रूप अर्थ ध्वनि है और तृतीय के अनुसार व्यञ्जना व्यापार ध्वनि है।
'ध्वनि' शब्द का पाँचवाँ विषय 'समुदाय रूप काव्य' है, क्योंकि ये चारों प्रकार उसमें होते हैं।
इसलिए 'काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः' यहाँ समुदाय रूप काव्य में 'ध्वनि' शब्द का
व्यवहार है और प्रथम कारिका में 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' व्यङ्ग्य अर्थ की दृष्टि से कहा गया है।
अन्य सभी अर्थों में व्युत्पत्तितः और व्यवहारतः 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग होने पर भी मुख्यतः
व्यङ्ग्य अर्थ ही 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होता है और वह भी शब्द और अर्थ को अतिशयित
करके चारुत्वातिशय के कारण प्रधान रूप से प्रतीयमान हो तब 'ध्वनि' कहलाता है। व्यङ्ग्य अर्थ
की स्थिति में ही वाच्यादि भी 'ध्वनि' शब्द से वाच्य हो सकते हैं।