ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
स्यात् । न चापि प्राक्पदार्थेषु सङ्केतग्रहणं वृत्तम्, अन्वितानामेव सर्वदा
प्रयोगात् । आवापोद्वापाभ्यां तथाभाव इति चेत्-सङ्केतः पदार्थमात्र एवेत्य-
भ्युपगमे पाश्चात्त्यैव विशेषप्रतीतिः ।
अथोच्यते—दृष्टैव झटिति तात्पर्यप्रतिपत्तिः किमत्र कुर्म इति । तदिदं वय-
मपि न नाङ्गीकुर्मः । यद्वक्ष्यामः—
तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाक्यार्थविमुखात्मनाम् ।
बुद्धौ तत्त्वावभासिन्यां झटित्येवावभासते ॥ इति ॥
यह कि पहले पदार्थों में सङ्केतग्रह भी नहीं हुआ है, क्योंकि सर्वदा अन्वितों का ही
प्रयोग है । यदि कहिए—'आवापोद्वाप' के द्वारा उस प्रकार (पृथक् पदार्थों में सङ्केतग्रह)
होगा, तब तो सङ्केत को पदार्थमात्र में ही स्वीकार करने पर विशेष (वाक्यार्थ )
की प्रतीति बाद में ही होगी ।
यदि कहते हैं—'झट-से तात्पर्य (पर्यन्तिक अर्थ) की प्रतीति देखी गई है तो
हम क्या करें ?' तो हम भी इसे अस्वीकार नहीं करते ! क्योंकि हम कहेंगे—
'उस प्रकार वाक्यार्थ से विमुख स्वभाव वाले सहृदय जनों की तत्त्वावभासिनी
बुद्धि में वह अर्थ (पर्यन्तिक अर्थ) झट से अवभासित हो जाता है।'
पदार्थों में संकेतग्रह होता ही नहीं, क्योंकि अन्वित पदार्थों का ही सर्वदा आप प्रयोग करते हैं।
ऐसी स्थिति में संकेतग्रह को पहले मानने का पक्ष सर्वथा अन्विताभिधानवादी मीमांसक के
मत में गलत होगा ।
१. आवापोद्वाप = प्रक्षेप-निक्षेप; ग्रहण-त्याग । यहाँ अन्विताभिधानवाद का स्पष्टीकरण
आवश्यक है । जैसा कि 'अभिहितान्वयवाद' में पहले 'अभिधा' शक्ति द्वारा पदार्थों का ज्ञान,
तत्पश्चात् तात्पर्य शक्ति द्वारा अन्वय रूप वाक्यार्थ का ज्ञान है वह प्रस्तुत 'अन्विताभिधानवाद'
में सर्वथा त्याज्य पक्ष है। इसके अनुसार 'अभिधा' से अन्वित पदार्थ का ही ज्ञान होता है अर्थात्
जो वाक्यार्थ है वही वाच्यार्थ है। ये लोग अन्वयांश में अतिरिक्त शक्ति की कल्पना नहीं करते ।
जैसे 'गामानय' इस वाक्य में 'गो' शब्द का कोई अर्थ नहीं, बल्कि यहाँ 'गौ' की प्रतीति 'आनयन'
से अन्वित होकर, एवं 'आनयन' की प्रतीति 'गौ' से अन्वित होकर होती है । यह मत प्रभाकर-मत
या गुरुमत के नाम से प्रसिद्ध है। प्रभाकर ने 'व्यवहार' को संकेतग्रह का प्रधान उपाय माना
है। व्यवहार में देखा जाता है कि कोई बड़ा आदमी (उत्तम वृद्ध) अपने से छोटे आदमी
(मध्यम वृद्ध) से 'गामानय' कहता है, उस समय वह दूसरा आदमी 'गौ' को लाकर उपस्थित
करता है। समीप में स्थित बालक उत्तम वृद्ध के कथन और मध्यम वृद्ध के कार्य दोनों को सुनता
और देखता है। इस प्रकार वह बालक 'गामानय' इस अखण्ड वाक्य का अर्थ-ज्ञान करता है।
तत्पश्चात् उत्तम वृद्ध के द्वारा 'गां बधान, अश्वमानय' (गौ को बाँधो और अश्व को लाओ) यह
कहे जाने पर बालक 'गाम्' और 'आनय' का अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। यही 'आवापोद्वाप'
के द्वारा संकेत का ग्रहण है। इस पर आचार्य अभिनवगुप्त का कहना है कि ऐसी स्थिति में आप
भी यही स्वीकार कर रहे हैं कि संकेत पदार्थ मात्र में ही होगा, फिर वाक्यार्थ रूप विशेष की
प्रतीति पश्चात् ही होगी, पहले नहीं। इसलिये 'दीर्घदीर्घतरव्यापार' का पक्ष किसी प्रकार सिद्ध
नहीं हो सकता ।