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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

६२ धनुर्वेदसंहिता
क्रमेण भवति च युवयस्या युध्यतां सा प्रसेना ॥
जिनके छठे स्थान में क्रूर रवि मंगल और पाप शनि राहु केतु ये पड़े हों
वे वीर युद्ध में लड़ें और काम के नहीं होते, अथवा च-व-भ-ड-छ-क ये
अक्षर पहिली सेना में लिखे, इसके पीछे स्वरवर्ण अकारादि सब लिखे,
ऊपर व्यंजनों के स्वरों को क्रम से स्थापित करे, जिस सेना का युवास्वर
हो वही प्रथम होके लड़े॥६०॥
उदाहरणम्
यथा, विवस्वान्, भरत, धुन्धुमार, डित्थ,
छत्रपति, कुक्षि,
इन अक्षरों के नामवाले योद्धाओं को प्रथम सेना युवास्वर में युद्ध ठाने
तो जीते॥१॥
अस्या वस्त्राणि पीतानि ध्वजा पीता च तद्वति ।
युद्धयूपस्तथा पीतश्चतुरस्त्रांकसंयुतः ॥६१॥
इसके पीले वस्त्र, पीली झंडी-वैसा ही युद्ध यज्ञ का बड़ा झण्डा जहां
गाड़ा जाय वहां सेना ठहरे। चौकोर चिह्न का॥६१॥
श्वेतरक्तहरित्कृष्णा चान्या सेना हि त्वादिवत् ।
कर्तव्या पार्थिवैर्नित्यं जयलाभसुखेच्छुभिः ॥६२॥
हे विश्वामित्र! जय और लाभ सुख के वास्ते पहली सेना का जैसे क्रम है
उसकी तरह चार सेना चाहनेवाले राजाओं को श्वेत, लाल, हरी और
काले रंगवाली करनी चाहिये॥६२॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्यौ यथाक्रमम् ।
अधीशाः पंचसेनानां विज्ञेयाः शृणु गाधिज ॥६३॥
हे विश्वामित्र! ब्रह्मा १ विष्णु २ रुद्र ३ चन्द्र ४ सूर्य ५ ये पांच देवता
पांच सेनाओं के स्वामी हैं॥६३॥
ब्रह्मा रुद्रबले जीयाद्विष्णुश्चन्द्रबले जयेत् ।
रुद्रः सूर्यबलं प्राप्य- चन्द्रो ब्रह्मबलं युधि ॥६४॥
सूर्यो विष्णुबलं लब्ध्वा जयेच्चैव न संशयः ।

हिन्दीटीकासमेता ६३
ब्रह्माजी महादेव का बल पाकर जीतते हैं, विष्णु चन्द्रमा के बल में
जीतते हैं और रुद्रजी सूर्य का बल पाकर जीतते हैं, चन्द्रमा ब्रह्मा के बल
से युद्ध में जीतते हैं, सूर्यनारायण विष्णु के बल को पाकर जीतते हैं,
इसमें संदेह नहीं॥६४॥
अ ब्रह्मा विष्णुरी रुद्र उश्चन्द्रस्त्वे च भास्करः ।
ओ ज्ञेयःपार्थिवैर्नित्यं जन्यशास्त्रविचक्षणैः ॥६५॥
(अ) ब्रह्मा (इ) विष्णु (उ) रुद्र (ए) चन्द्र (ओ) सूर्य, युद्धशास्त्र के
चतुर राजाओं ने जानना॥६५॥
प्राप्य स्वं स्वं बलं सेनाः पूर्वोक्ता युद्धगा यदि ।
क्षणाधन अरीन्सर्वान्मारयंतीति रुद्रवाक् ॥६६॥
पहिले कही हुई सेना यदि अपना अपना बल पाकर युद्ध को जाय तो
आधी आधी क्षण में सब शत्रुओं को मारें यह महादेवजी की वाणी
है॥६६॥
इति पदातिक्रमः
अथाश्वक्रमः
मण्डलं चतुरस्रं च गोमूत्रं चार्द्धचन्द्रकम् ।
नागपाशक्रमेणैव भ्रामयेत्कटपंचकम् ॥६७॥
गोलाकार-चौकोर-गोमूत्राकार-अर्धचन्द्राकार और नागपाश क्रम से
घोड़े की कवायद कराने से वह फिर कहीं नहीं अटकता भ्रमावे॥
गोल चौकार
गोमूत्राकार

६४ धनुर्वेदसंहिता
अर्द्धचन्द्र नागपाश
इन पांच गतियों से जो घोड़ों को फिरा लेगा उसका घोड़ा नहीं
अटकेगा।।६७।।
इत्यश्वक्रमः
अथ हस्तिक्रमः
(कार्यम्)
गजानां पर्वतारोहणम्, जलेभ्रमणम्, धावनम्, उत्थानम्,
उपविशनम्; अलातचक्रादिभिर्भीतिवारणम्
कार्यम् ।।६८।।
हाथियों का पहाड़ों पर चढ़ाना, जल में चलना, भागना, उठना, बैठना,
अग्निचक्रादिकों से भय दूर करना सिखावे।।६८।।
अलातचक्ररूपम्
इति गजक्रमः

हिन्दीटीकासमेता ६५
रथः
रथाश्वसाधनं तु समादिस्थले विधेयम् ॥
रथ के घोड़ों को सम आदि स्थल में अभ्यास कराना चाहिये॥
इति रथक्रमः
अथ सेनापतिकरणविधिं वक्ष्यामः ।
शृणु भो राजर्षे विश्वामित्र! आकारविद्याबलयुक्तं
क्षत्रियं सेनापतिं विदध्यात् तस्यैते नियमाः समस्त
वाहिनीमेकाकारदृष्ट्यावलोकयेत् अन्यच्च सर्वान्पदा-
तीन् परिश्रमसदृशमधिकारं दद्यात् व्यूहरचनायामति-
निपुणश्च भवेत् स एव सेनानीर्विधेय इति ।
अब सेनापति करने की विधि कहते हैं, सुनो! हे राजऋषि विश्वामित्र!
आकारविद्या और बल से जो युक्त हो, ऐसे क्षत्रिय को सेनाध्यक्ष करे,
उसके ये नियम हैं, सारी सेना को एकसम दृष्टि से देखे और सब पैदल
आदि परिश्रम के सदृश अधिकार (ओहदा) दे, और व्यूहरचना में
अतिचतुर हो, उसे ही सेनानी करना चाहिये॥
अथ शिक्षा
तत्रादौ पठनपाठनविधिंब्रूमः । आदौ क्षात्रकोशव्याकरण
सूत्राण्यध्येतव्यानि । द्वावध्यायौ सप्तमाष्टमौमनोर्मि-
ताक्षराव्यवहाराध्यायश्च जयार्णवविष्णुयामलविजया-
ख्यस्वरशास्त्राण्यपराणिच पठितव्यानि ततः सरहस्यं
धनुर्वेदमापठेत् ।
अब पठनपाठन की विधि कहते हैं, पहिले क्षात्रकोश व्याकरण सूत्र पढ़ने
चाहिये, दो अध्याय सातवां और आठवां मनु का तथा व्यवहाराध्याय
मिताक्षरा धर्मशास्त्र, जयार्णव, विष्णुयामल, विजयाख्यतंत्र और
स्वरशास्त्र पढ़ने चाहिये, इनको पढ़कर रहस्यसहित धनुर्वेद गुरु से
पढ़े।

६६ धनुर्वेदसंहिता
हन्तव्याऽहन्तव्योपदेशः
सुप्तं प्रसुप्तमुन्मत्तं ह्यकच्छं शस्त्रवर्जितम् ।
बालं स्त्रियं दीनवाक्यं धावन्तं नैव घातयेत् ॥६९॥
अब किसको मारना चाहिये और किसको नहीं, सोये हुए को, गाढ़
निद्रा में सोते हुए को और नशा पिये हुए को जिसका धोती वा लंगोट
खुल गया हो उसको, जिसके पास हथियार न होवे उसको तथा बालक
अर्थात् बारह वर्ष से कम अवस्थावाले को सज्जन स्त्री को और जो दीन
वचन बोले उसको, रण छोड़कर भागते हुए को, धर्मात्मा न
मारे॥६९॥
धर्मार्थं यस्त्यजेत्प्राणान्किं तीर्थैश्च जपैश्च किम् ।
मुक्तिभागी भवेत्सो वै निरयं नाधिगच्छति ॥७०॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा स्त्रीणां बालवधेषु च ।
प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥७१॥
इति श्रीम‍हर्षिवसिष्ठप्रणीता वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता
समाप्ता
हे विश्वामित्र! धर्म के अर्थ जो प्राणों को छोड़े उसको तीर्थ और व्रतों से
क्या है, वह स्वर्ग और मोक्ष को पाता है, नरक में नहीं जाता और जो
ब्राह्मण गऊ स्त्री बालक इनके लिये प्राण देता है, वह मोक्ष का भागी
होता है॥७०॥७१॥
इति श्रीवासिष्ठीधनुर्वेदसंहिता हरितगोत्रोद्भव स्वामि
रामरक्षपालविरचित हिन्दीटीकासमेता
संपूर्णतामयासीत् ॥

कर्मकाण्ड सम्बन्धी हमारे कुछ प्रकाशन
अन्त्येष्टि श्राद्ध कर्म पद्धति (संस्कृत) पत्राकार व पुस्तकाकार
उपाकर्म पद्धति मूल "श्रावणी कर्म" के लिये परमोपयोगी
ग्रह शांति-हिन्दी टीका सहित (शुक्ल यजुर्वेदोक्त)-इसमें मातृस्थापन पूजन
आभ्युदीपक श्राद्ध पद्धति और ग्रहशांति है। यह यज्ञोपवीत तथा विवाहादि शुभ कर्म में
बहुत उपयोगी है
गौडीय श्राद्ध प्रकाश महानिबन्ध-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, (मूलमात्र, पत्राकार)
सभी श्राद्ध, पितृकर्म संबधी सभी वैष्णवादि पूजनादिकों का अपूर्व संग्रह
नित्य कर्म प्रयोग माला-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, नित्य नियम के ६२ विषयों
सहित। संस्कृत में
प्रेत मञ्जरी-हिन्दी टीका सहित। वैतरणी दान प्रेतदाहविधि, दशाहादि श्राद्ध,
एकादशाहश्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शय्यादानादि सपिंडी श्राद्ध, षोडश, मासिक श्राद्ध प्रयोग,
त्रयोदशाहपद दानादि है। पुस्तकाकार व पत्राकार दोनों में उपलब्ध
व्रतोद्यापन प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। मूलमात्र पत्राकार व सजिल्द में
उपलब्ध
सुगम विवाह पद्धति-(गंगाधारी)-हिन्दीटीकासहित
सर्वदेव प्रतिष्ठा प्रकाश-पं० चतुर्थीलालजीकृत। सम्पूर्ण देवताओं की सर्वोत्तम प्रतिष्ठा
विधि और प्रतिष्ठोपयोगी अनेकों प्रकार के कुंड, मण्डल, यंत्र आदि के चित्र बनाने तथा
रंग पूरने की विधि भी है।
संस्कार प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें षोडश संस्कार, लुप्त संस्कार
प्रायश्चित, व्रात्यप्रायश्चित प्रयोग, पुनरुपनमन प्रकार इत्यादि सभी विषय है। मूल मात्र
संस्कृत में। सजिल्द
वासिष्ठी हवन पद्धति-हिन्दी टीका सहित
विष्णु पूजन विधि-हिन्दी टीका सहित
विवाह सोपांगविधि-'वालोवोधिनी' नामक हिन्दी टीका सहित
शांति प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें गणपत्यादि पूजन, पुण्याह वाचन,
कलश स्थापनादि और विनायकादि ३० शांति प्रयोग तथा वास्तु शांति तथा वास्तु
शांति प्रयोगादि समन्त्रक हैं। मूल मात्र पत्राकार
सकाम शिवपूजन विधान हिन्दीटीकांसहित-वैदिक, तांत्रिक मन्त्रों से शिव पूजन
स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) प्रायः समस्त शुभकर्मों में पढ़ा जाता है।
संध्योपासन-हिन्दीटीकासहित देवर्षि पितृतर्पण सहित
हरिद्रामातृका पूजा-विवाहादि मंगल करने योग्य
(चातुर्थीलाली) उपनयनपद्धति-सटिप्पणीका नवीन आवश्यक विषयों से अलंकृत
'यज्ञोपवीत संस्कार' कराने के लिये परमोयोगी

पुस्तके मिलने के स्थान :-
खेमराज श्रीकृष्णदास
श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
७वीं खेतवाडी, खम्बाटा लेन,
बम्बई-४०० ००४
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेस व बुक डिपो
अहिल्याबाई चौक, कल्याण
(जि० ठाणे-महाराष्ट्र)
खेमराज श्रीकृष्णदास, चौक-वाराणसी (उ० प्र०)
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

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श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, | लक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेस व बुक डिपो
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७वीं खेतवाडी, खम्बाटा लेन, | (जि० ठाणे-महाराष्ट्र)
बम्बई-४०० ००४
खेमराज श्रीकृष्णदास, चौक-वाराणसी (उ० प्र०)
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४