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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता ५
फिर आचार्य को शिष्य की सिद्धि की इच्छा से शिवजी का कहा हुआ
पाप और विघ्नों का नाश करनेवाला अङ्गन्यास करना
चाहिये।।१९।।
शिखास्थाने न्यसेदीशं बाहुयुग्मे च केशवम् ।
ब्रह्माणं नाभिमध्ये तु जङ्घयोश्च गणाधिपम् ॥२०॥
चोटी के स्थान पर जहाँ ब्रह्मरन्ध्र है वहाँ श्रीमहादेवजी को स्थापन करे
और दोनों बाहुओं पर भगवान् को और नाभि के बीच में ब्रह्माजी और
जंघाओं पर गणेशजी को स्थापन करे।।२०।।
ॐ ह्रौं शिखास्थाने शंकराय नमः ।
ॐ ह्रौं बाह्वोः केशवाय नमः ।
ॐ ह्रौं नाभिमध्ये ब्रह्मणे नमः ।
ॐ ह्रौं जङ्घयोर्गणपतये नमः ॥२१॥
इन पूर्वोक्त चार मंत्रों से चारों देवताओं का ध्यान करता जाय और
शिखादि को हाथ से छूता जाय।।२१।।
ईदृशं कारयेन्न्यासं येन श्रेयो भविष्यति ।
अन्येऽपि दुष्टमंत्रेण न हिंसन्ति कदाचन ॥२२॥
इस प्रकार अङ्गन्यास करावे और शिष्य करे, जिससे कल्याण हो। इस
न्यास के करने से और भी मारण आदि दुष्ट मंत्रों से नहीं मार
सकते।।२२।।
शिष्याय मानुषं चापं धनुर्मंत्राभिमंत्रितम् ।
काण्डात्काण्डाभिमंत्रेण दद्याद्वेदविधानतः ॥२३॥
गुरु शिष्य को “काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ति परुषः परुषः परि” इस वेद के
मंत्र से वेदविधि के साथ मनुष्य सम्बन्धी धनुष को धनुष के मंत्र से
मन्त्रित करके दे।।२३।।
प्रथमं पुष्पवेधं च फलहीनेन पत्रिणा ।
ततः फलयुतेनैव मत्स्यवेधं च कारयेत् ॥२४॥
मांसवेधं ततः कुर्यादेवं वेधो भवेत्त्रिधा ।
एतैर्विधेः कृतैः पुंसां शराः स्युः सर्वसाधकाः ॥२५॥