देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७३२ ) देवीभागवत-भाषा । १२४
वास करते हैं वह मनुष्य परमज्ञान प्राप्त करके भवसमुद्रसे मुक्त होता है तथा देवीलोकमें
वास करता है ॥ ९५ ॥ देवीके इन अष्टोत्तर नामोंका पाठ करके वह मनुष्य सिद्धि
प्राप्त करता है जिस किसी स्थानमें उक्त नामावली पुस्तकमें लिखित हो ॥ ९६ ॥ उस
स्थानमें ग्रहभय और महामारीका भय इत्यादि कुछभी नहीं होता वरन् पर्वकालमें
समुद्रकी समान उस स्थानमें सौभाग्यकी वृद्धि होती है ॥ ९७ ॥ अष्टोत्तरशतनामके
जपनेवाले मनुष्यको कुछ दुर्लभ नहीं रहता वह देवीका भक्त निश्चयही कृतकृत्यता
प्राप्त करता है ॥ ९८ ॥ वह साधुव्यक्ति देवीका स्वरूप होता है देवतागण उसको देखकर
प्रणाम और उसकी पूजा करते हैं सज्जन मनुष्य जो उनकी पूजा करते हैं उसमें फिर
कहना क्या है ? ॥ ९९ ॥ इस अत्युत्तम अष्टोत्तरशतनामके श्रद्धासहित पाठ
करनेपर पितृगण तृप्त होकर सद्गति प्राप्त करते हैं ॥ १०० ॥ यह सम्पूर्ण स्थान
साक्षात् संविन्मय मुक्तिक्षेत्र हैं अतएव हे राजेन्द्र ! बुद्धिमान् मनुष्य इन सम्पूर्ण
सिद्धपीठोंका आश्रय करते हैं ॥ १०१ ॥ हे महाराज ! आपने महेश्वरीका जो
जो रहस्य और अतिरहस्यका विषय पूंछा था वह सम्पूर्ण मैंने वर्णन किया इससमय
आप अब क्या सुननेकी इच्छा करते हैं ? सो कहिये ॥ १०२ ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायां त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः ३१.
जनमेजयने कहा हे मुनिवर ! आपने पहले कहा है कि, अनन्तर यह परमज्योति
हिमालयके पृष्ठमें आविर्भूत हुई थी इससमय उस परमज्योतिका विषय विस्तार-
सहित मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ कौन बुद्धिमान् मनुष्य इस शक्तिका कथामृत
पान करनेसे विरत होगा यद्यपि सुधापायी देवताओंको किसी प्रकार मृत्युकी सम्भा-
वना हो तथापि देवीकथामृतपान करनेवालोंके पक्षमें उसकी कुछ सम्भावना नहीं
होती ॥ २॥ व्यासजीने कहा हे महाराज ! देवीके प्रति जिसप्रकार आपकी एकान्त
भक्ति देखता हूं, इससे मुझको बोध होता है कि आप महात्माओंसे शिक्षित कृतकृत्य
भाग्यवान् और धन्य हुए हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥ हे राजन् ! अब मैं
परमपुरातत्व वर्णन करता हूं श्रवण करो देवादिदेव महेश्वरने उस अग्निदग्ध
सतीके देहको धारण कर भ्रान्त चित्तसे भूमण्डलपर भ्रमण करते करते
जिस स्थानमें स्थिर होकर अवस्थिति की ॥ ४ ॥ उस स्थानमें वह निय-