सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 474 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 330

३३० दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां


अवनमनोन्नमननैरन्तर्यनष्टदृष्टमध्ययष्टिकम्, अवपतनोत्पतननिर्व्यवस्थ-
मुक्ताहारम्, अङ्कुरितघर्मसलिलदूषितकपोलपत्रभङ्गशोषणाधिकृतश्रवणप-
ल्लवानिलम्, आगलितस्तनतटांशुकनियमनव्यापृतैकपाणिपल्लवं च निष-
द्योत्थाय निमील्योन्मील्य स्थित्वा गत्वा चैवातिचित्रं पर्यक्रीडत राजकन्या।
अभिहत्य भूतलाकाशयोरपि क्रीडान्तराणि दर्शनीयान्येकेनैव वानेकेनैव
कन्दुकेनादर्शयत् । चन्द्रसेनादिभिश्च प्रियसखीभिः सह विहृत्य विहृतान्ते
कन्दुको यत्र तद्यथा । अवनमनेति-अवनमननवनतीकरणमुन्नमनमूर्धीकरणं तयो-
नैरन्तर्येण सातत्येन नष्टदृष्टा अवनमनेन नष्टाऽदर्शनं गता-उन्नमनेन च दृष्टा मध्य-
यष्टिः शरीरमध्यभागो यस्मिंस्तद्यथा । अवपतनेति-अवपतनोत्पतनाभ्यां निर्व्य-
वस्थश्चञ्चलो मुक्ताहारो यस्मिंस्तद्यथा । अङ्कुरितेति-अङ्कुरितेन ईषत् संजातेन
घर्मसलिलेन स्वेदवारिणा दूषितयोर्व्यासयोः कपोलयोर्गण्डयोः पत्रभङ्गानां पत्ररच-
नानां स्वेदबिन्दुसिक्तानामित्यर्थः- शोषणे शुष्ककरणे अधिकृतो नियुक्तः श्रवणप-
ल्लवानिलः कर्णकिसलयवायैर्यत्र तद्यथा तथा । आगलितति-आगलितस्य
स्रस्तस्य स्तनतटांशुकस्य कुचतटावरणस्य नियमने बन्धने व्यापृतो नियुक्त
एकः पाणिपल्लवः करकिसलयो यस्मिंस्तद्यथा तथा । निषद्य-उपविश्य । निमील्य
चक्षुरिति शेषः । अतिचित्रं-नानाविधम् । अभिहत्य ताडयित्वा । भूतलाका-
शयोः-भूतले दर्शनीयानि आकाशे च दर्शनीयानि । क्रीडान्तराणि-नाना क्रीडाः ।
दर्शनीयानि-द्रष्टुं योग्यानि-मनोहराणीत्यर्थः । विहृत्य-क्रीडित्वा । विहृतान्ते-
उछलती हुई बाहर-भीतर घूमनेवाला कन्दुक बना रही थी । उस राजपुत्रीकी देहका
मध्यभाग, कभी दिखाता था और कभी नहीं भी दिखाता था । ऊपर और नीचे
नमित और अनमित होनेसे उस राजकन्याकी मोतीकी माला चञ्चलायमान हो रही
थी। उस राजकुमारीके कपोलोंपर जो पत्र रचनायें, ( चन्दनादिकी ) थीं, वे गेंद
खेलनेके कारण उत्पन्न हुए पसीनेकी बूंदोंसे भींगती थीं, परन्तु, तुरन्त ही उस राजपुत्रीके
कानोंपर सजे हुए नूतन किसलय अपनी हवासे उन्हें सुखा भी देते थे । उस राज-
पुत्रीका एक हाथ ( कर किसलय ) उसके कुचोंपरसे खिसकते हुए वस्त्रको ( अञ्चलको )
सम्भालनेमें व्यस्त दीख रहा था। वह राजकन्या उठकर, खड़ी होकर, आँखें बन्द
कर तथा आंखें खोल कर, कभी ठहरकर, कभी चलकर अतिविचित्र प्रकारकी
कन्दुक क्रीड़ा कर रही थी । वह राजकुमारी कभी पृथिवीपर, कभी आकाशकी
ओर, कभी एक प्रकारसे और कभी-कभी अनेक प्रकारसे एक ही गेंदसे क्रीड़ा
कर रही थी । अर्थात् कभी वह एक गेंदकी अनेक गेंदोंके समान लोगोंको प्रतीति
कराती थी और कभी एक ही गेंदकी प्रतीति करा रही थी । अपनी प्रिय सखी चन्द्र-