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सर्वकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

१०२ दशकुमारचरितम् । [ पूर्वपीठिकायां
वीक्ष्य विरचितमन्दहासो व्याजहार—'देव, भवदनुचरे मयि तिष्ठति तव
कार्यमसाध्यं किमस्ति । अहमिन्द्रजालविद्यया मालवेन्द्रं मोहयन् पौरजन-
समक्षमेव तत्त नयापरिणयं रचयित्वा कन्यान्तःपुरप्रवेशं कारयिष्यामीति
वृत्तान्त एष राजकन्यकायै सखीमुखेन पूर्वमेव कथितव्यः' इति ।
संतुष्टमना महीपतिरनिमित्तं मित्रं प्रकटीकृतकृत्रिमक्रियापाटवं विप्रलम्भ-
कृत्रिमप्रेमसहजसौहार्दवेदिनं तं विद्येश्वरं सबहुमानं विससर्ज ।
( २४ ) अथ राजवाहनो विद्येश्वरस्य क्रियापाटवेन फलितमिव मनो-
रथं मन्यमानः पुष्पोद्भवेन सह स्वमन्दिरमुपेत्य सादरं बालचन्द्रिकामुखेन
निजवल्लभायै महीसुरक्रियमाणं संगमोपायं वेदयित्वा कौतुकाकृष्टहृदयः
अभिरामं मनोज्ञदर्शनम् । व्याजहार उवाच । अनिमित्तं निष्कारणम् । प्रकटीकृतं
प्रकाशीकृतं कृत्रिमक्रियायां इन्द्रजालकर्मणि पाटवं चातुर्यं येन तम् । विप्रलम्भः
प्रतारणं कृत्रिमप्रेम कपटानुरागः सहजसौहार्दं निष्कपटमित्रता—तानि वेत्तीति तं
सबहुमानं बहुसत्कारपूर्वकम् ।
( २४ ) क्रियापाटवेन कार्यकौशलेन । फलितमिव सिद्धप्रायम् । महीसुरेण
ब्राह्मणेन ऐन्द्रजालिकेनेत्यर्थः क्रियमाणमनुष्ठीयमानम् । वेदयित्वा ज्ञापयित्वा । क्षपां
नीय कोई बात नहीं रहनी चाहिये । अतः आप सुनें—एक दिन इस केलिवनमें मालवेशपुत्रा
राजकुमारी अवन्तिसुन्दरी आयी थी । वसन्तमहोत्सवके निमित्त वह आयी थी तथा मेरे ये
सखा राजवाहन भी दैववश उसी समय उपवनमें आ गये । परस्पर अवलोकन करते हुए इन
दोनोंमें प्रेम हो गया किन्तु आगे कोई उपाय नहीं दिखलायी पड़ता है जिससे ये दोनों दीर्घ
कालिक सुख-भोग प्राप्त कर सकें । इसी हेतु इनकी यह क्षीण दशा हो रही है । लज्जासे
मनोज्ञ राजकुमारके मुखको देखकर मन्द-मन्द मुसकानसे विद्येश्वरने कहा—हे देव ! आपका
अनुचर मैं उपस्थित हूँ फिर आपको किस बातकी चिन्ता । संसारमें क्या असाध्य है—
कुछ भी नहीं । आप किसी सखी द्वारा उस राजपुत्रीके समीप यह कहलादें कि-मैं इन्द्र-
जाल विद्या द्वारा मालवेश मानसारको मोहित करके समस्त पुरवासियोंके समक्ष तुम्हारे
साथ विवाह करके तुम्हारे मन्दिरमें प्रविष्ट होऊंगा । ऐन्द्रजालिककी बातोंपर प्रसन्न होकर
राजवाहनने उस निष्कारण मित्र तथा कृत्रिम क्रिया-कुशलज्ञ, विप्रलम्भ कृत्रिम प्रेम तथा
सहज सौहार्द आदि क्रियाओंको जाननेवाले उस विप्रको सम्मानके साथ विदा किया ।
( २४ ) तदनन्तर विद्येश्वरकी कला-कुशलतासे मानो राजवाहनकी मनोकामना पूर्ण हो
गयी ऐसा सोचकर राजवाहन अपने घर पुष्पोद्भवके साथ-साथ लौटा तथा वहाँपर बाल-
चन्द्रिकाको बुलवाया और उस विप्रद्वारा उपदेशित वे सब युक्तियाँ बता दीं । फिर उत्सुकतापूर्ण