छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
बादशाह सामने की कछार चढ़कर झपाटे से उस अँधेरी रात में ऊपर आया। इस
विजय के लिए आलमगीर ने कितना खून पसीना बहाया था? लाखों मनुष्यों और
जानवरों को मारा था, पागल कर दिया था अथवा भयंकर रोग के मुख में झोंक दिया
था।
थका-हारा बादशाह उस रात्रि बेला में, तुलापुर के भीमा कछार पर आकर
खड़ा हो गया। उस घुप्प अँधेरे में नदी की काली धारा की ओर आहत दृष्टि से
देखने लगा। बादशाह के डेरे में विजय की सूचक नौबत बजी। हर्षोल्लास से
सैकड़ों तासे-ढोल एक साथ बजने लगे थे। हजारों मुगल सैनिक बाजार में खुशी से
नाचने लगे थे। मशालों का नृत्य आरम्भ हो गया था। 'सम्भा मर गयाऽऽ, सम्भा
कत्ल किया गयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए घुड़सवार जोर-जोर से शोर मचा रहे थे। यह
अमावस्या की रात इन दैत्यों के लिए उत्सव की रात बन गयी। आसमान में विजय
की चन्द्रज्योति प्रकाशित हुई। चारों ओर हर्षोल्लास का वातावरण छाया था।
कछार पर खड़ा बादशाह आतंकित-सा बार बार नदी की धारा की ओर देख
रहा था। वह क्षणभर के लिए हैरान हुआ कि कहीं वहाँ काले पानी में सम्भाजी तो
नहीं खड़ा है? उसे शंका हो रही थी, किन्तु उसके आसपास त्योहार जैसा उत्सव
फौज मना रही थी। शंका के लिए कोई अवकाश शेष नहीं था! समाप्त कर दिया
गया काफिर बच्चा अन्ततः समाप्त हो गया था। पिछले आठ वर्षों में जिसने मुगल
सेना के लाखों लोगों और जानवरों को विनष्ट करने के लिए जमीन-आसमान एक
कर दिया था, आखिर समाप्त हो गया। उस जहन्नमी शिवाजी का दुष्ट छोकरा
समाप्त हो गया।
औरंगजेब बड़ी राहत का अनुभव कर रहा था। वह बड़ी प्रसन्नता से हँसा,
खिलखिलाकर हँसा, बार-बार हँसा। यह सफलता इतनी बड़ी थी कि बादशाह
विदूषक की भाँति खूब हँसा। धीरे धीरे उसकी हँसी बन्द हो गयी। पहला दौर
समाप्त हो गया। बादशाह के अंगों में कूट-कूटकर भरा हुआ क्रूर हैवान आलमगीर
के अति हिंसात्मक रूप को देखकर दूर भाग गया। बादशाह के अंग-प्रत्यंग में एक
अनाम खालीपन भर गया था। वह घबराने लगा। उसे अपनी कामयाबी से ही भय
लगने लगा। खालीपन उसे खाने लगा, बेचैन करने लगा। वह सोचने लगा कि यदि
सम्भा सचमुच समाप्त हो गया है तो इसके बाद वह लड़े तो किसके विरुद्ध?
'बादशाह सलामत चलिए! हजरत चलिए।' इस आवाज से औरंगजेब का
ध्यान टूटा। वह होश में आया। शहाबुद्दीनखान, रूहूल्लाखान, हसनअलीखान जैसे
बड़े सरदार नदी के किनारे की ओर दौड़ पड़े थे। उन्हें अपने मालिक की इस
दिग्विजय पर बधाइयाँ देनी थीं। रूहूल्लाखान बड़े उत्साह से बोला, "चलिए
हजरत आपको मुबारकबाद देने के लिए सारी फौज बेताब हो रही है। अपने खास
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सरदारों ने वहीं पर फतह की बड़ी महफिल सजा रखी है।"
"वहाँ पर मरगट्टों के बड़े बड़े ब्राह्मण, जमींदार और अनेक मराठा
जागीरदार खासतौर पर हाजिर हैं। चलिए, उनसे मुलाकात कीजिए।" हसनअलीखान
ने साग्रह कहा।
बादशाह कुछ अजीब ढंग से हँसते हुए बोला, "क्या मिलना उन मराठा
कुत्तों से? जागीर की लालच में आये कुत्ते, उनकी परवाह कौन करता है?"
"लेकिन, लेकिन जहाँपनाह?"
"उन मूर्खों पर गर्व करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यदि आज धक्का
मारकर बाहर निकाल दिया जाये तो कल वे फिर पैरों में पूँछ दबाए ये नामर्द फिर आ
जाएँगे।"
"लेकिन जहाँपनाह, फौज को आपसे एक बहुत जरूरी काम है।"
इखलामखान बादशाह के नंगे सिर की ओर देखते हुए बोला। "आपके सिर पर
कितने सालों से ताज नहीं—"
"अँ?"
"जी हाँ, मेरे आका, चलिए आपऽ। वर्षों से आपके ताजविहीन सिर को
देखकर हम फौजियों को शर्म आती रही है। सम्भा का खात्मा किये बगैर सिर ताज
धारण न करने की सौगन्ध आपने पाँच वर्ष पहले ली थी। कल्याण के एक विशेष
सुनार से आधे करोड़ की कीमत का, हीरे जवाहरात वाला राजमुकुट हमने आपके
लिए तैयार करवाया है।"
"हाँ, हाँ हुजूर! चलिए आज वह मुकुट पूरी शानो शौकत के साथ आपकी
खिदमत में पेश करना है।" एक साथ पाँच-छह लोग बोल पड़े।
"इसकी क्या वजह है?" बादशाह ने खिन्न मन से पूछा।
"आपकी इस महान बहादुरी के लिए। एक निहायत नापाक, नादान दुश्मन
को आपने आज जिन्दा कत्ल कर दिया। आपने तो बहुत बडी फतह हासिल की है
हजरतऽ।"
अपने साथियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा से बादशाह ऊब चुका था। वह
चलते चलते रुक गया। ऐसा लगा जैसे उसका दम फूल रहा हो। वह सोच नहीं पा
रहा था कि सत्य बात को कहे या न कहे। उसके भीतर का कठोर शासक उसके
पापों के द्वार पर कड़ा पहरा दे रहा था। किन्तु उसके अन्तरतम में बैठी मानवीय
आत्मा द्रवित हो गयी थी। वह अपने बादशाह के अनुशासन को धोखा दिया। आँखों
की पुतलियों के पीछे भरे आँसुओं को वह सँभाल नहीं पाया, उनकी सीमा टूट
गयी। पहरेदारों की चिन्ता किये बिना उसकी आँखों से तीन बूँद आँसू ढरक गये,
गालों से होते उसकी सफेद दाढ़ी में समा गये।
सम्भाजी · 767
औरंगजेब उदास स्वर में बोला, "अरे बेवकूफोऽ कैसा जश्न मना रहे हो?
मारने वाला मर गया और मरने वाला अमर हो गया। जिसने कत्ल किया वह मर
गया, जिसका कत्ल हुआ वह अमर हो गया।"
उन्नीस
भूकम्प के बाद के उजड़े हुए कुरूप दिन की तरह वह भयानक दिन था। भीमा के
तट पर कोरेगाँव परिसर में अनेक गाँवों में डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। छह
सात गाँवों के बाहरी हिस्से में फैला, तीन-साढ़े तीन लाख का फौजी खेमा दिन में
भी झपकियाँ ले रहा था। संगीत और गायन-वादन के विरोधी बादशाह ने मौज
मस्ती की खुली छूट दे दी थी। काफिरों के निपात के उपलक्ष्य में रातभर गाना
बजाना चलता रहा। आज सवेरे देर से बादशाही खेमा जगा।
वढू गाँव की स्थिति अन्य गाँवों से अलग थी। कल शाम को शम्भुराजा की
नृशंस हत्या की खबर कुछ ही लोगों को थी। शेष गाँव के हट्टे कट्टे युवक अपने
घरों में घायल होकर पड़े थे। दो दिन पहले ही बादशाही फौज के हत्यारे सैनिकों ने
घरों में घुसकर उन्हें बुरी तरह पीटा था। पिछले पाँच-छह दिनों से गाँव में शाही
फौज के घोड़े आते थे और खड़ी फसल में घुसकर उन्हें तहस-नहस कर देते थे।
विशेष रूप से रूहूल्लाखान के खेमे के घोड़े खुले छोड़े जाते थे।
इस ध्वंसलीला के कारण गाँव के लोग बहुत चिढ़ गये। युवकों ने लाठियाँ
लेकर घोड़ों को मार भगाया। घोड़ों का झुंड नदी पार चला गया। इससे
रूहूल्लाखान बहुत क्रुद्ध हुआ। उसी रात रूहूल्लाखान के दो-तीन सौ सैनिकों ने
वढू गाँव पर आक्रमण कर दिया। काफिरों के युवकों का यह प्रतिशोध उससे सहन
नहीं हुआ। सैनिकों ने घरों में घुसकर युवकों, बूढ़ों आदि सभी को खींच-खींचकर
बाहर निकाला और चौराहों पर लाकर उन्हें मारते-मारते बेदम कर दिया। इस बात
को अभी दो ही दिन हुए थे। युवकों का घायल शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था।
लोग आहत और विवश अपने घरों में पड़े थे। बादशाह के विरोध में शिकायत करें
भी तो किससे? वे अपनी मार की असह्य पीड़ा झेलते हुए, अपने झोपड़ों की आड़
में निढाल पड़े थे।
दोपहर बीती। गाँव के दामाजी पाटील के बाड़े से धोने वाले कपड़ों का बड़ा
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गट्ठर लेकर जना धोबिन बाहर निकली। शाम होने के पहले उसे कपड़ों को धो
डालना था। वह भीमा और इन्द्रायणी के संगम के बहाव की ओर गयी। नदी के
पाट में अनेक जगहें निकल आयी थीं। दूसरी ओर तुलापुर के किनारे पर जगह
जगह फौजियों के डेरे-तम्बू लगे थे।
उस ओर नदी का स्वच्छ पानी और धोने के लिए एक बड़ा और चौड़ा पत्थर
जना को दिखाई पड़ा। वह उसी ओर तेजी से बढ़ गयी। पाटील की बारहबन्दी पानी
में खंगालकर धोने लगी। जना की उम्र तीस वर्ष की थी। मायका पाबल और
ससुराल वढू। बचपन से ही उसने लोक गायकों से शिवाजी महाराज के पवाड़े सुने
थे। इसलिए रायगढ़ के प्रति उसके मन में बड़ा आकर्षण था। विवाह से पहले उसने
अपने पिता से कई बार कहा था, "तात्या आप मेरे लिए रायगढ़ के आसपास का
कोई दूल्हा क्यों नहीं ढूँढ़ देते?"
"इतनी दूर क्यों रे छोकरी?" पिता ने पूछा था।
"वहाँ रही तो किसी न किसी दिन शिवाजी महाराज और सम्भाजी महाराज
के कपड़े धोने को मिलेंगे न? ऐसा होने पर जन्म सार्थक हो जाएगा।"
जना के भाग्य में वढू गाँव ही था। गाँव की धोबिन के नाते दामाजी पाटील के
घर के कपड़े धोने को मिलते थे। रोज की तरह सहज भाव से उसका कार्य शुरू था।
उसी समय तुलापुर गाँव का बैजा गड़रिया अपनी भेड़ों को लेकर आता दिखाई
दिया। कपड़ों को और स्वच्छ करने के लिए जना थोड़े गहरे पानी में उतर गयी।
कपड़ों को पानी में खँगालते समय एक विचित्र वस्तु उसके हाथ लगी। रस्सी की
तरह की उस लिजलिजी वस्तु को किनारे की ओर सरकाते-सरकाते तंग आकर जना
चिल्ला पड़ी।
"कौन युवा है यह? आदमी है कि जानवर? बकरे की अंतड़ी को पानी में
डालने की बेवकूफी लोग क्यों करते हैं?"
जना की बात सुनकर बैजा गड़रिया फीकी हँसी हँसते हुए बोला, "जना वह
अँतड़ी बकरे की नहीं, आदमी की है।"
"हैंऽऽ? क्या कह रहे हो?"
"तुम्हें पता नहीं है क्या? कल रात उस बादशाह ने शिवाजी महाराज के बेटे
शम्भू महाराज को यहीं नदी के किनारे, बकरे की तरह काटा है। ध्यान से पीछे देख,
उन्हीं का रक्त-मांस पीछे चटाई पर पड़ा है।"
"क्या कह रहे हो, मामा?"
"हाथ नहीं लगाना। घर भाग जा। शम्भूराजा के रक्त-मांस को छूना नहीं।
यह बादशाह का हुक्म है। खान के सिपाही तुझे बेदम करके मारेंगे।"
सम्भाजी •• 769
धोने वाले कपड़ों को वैसे समेटकर जना तत्काल पीछे मुड़ी। वह अपने गाँव
की ओर सरपट भागने लगी। उसने पाटील के बाड़े में कपड़ों की गठरी को नीचे
गिरा दिया। उसकी यह दशा देखकर राधाबाई पाटील ने पूछा, "क्या हो गया है,
आज तुझे? कपड़े बिना धोये ही वापस लेकर आ गयी। नदी के घाट पर कोई साँप
बिच्छू देख लिया क्या?"
"अपने गाँव के सयानों में साहस नहीं रह गया तो क्या जाता है? वैसे ही
नाग की तरह मुवों को घूमने दो।" जना ने चिढ़कर कहा।
"क्या कह रही हो, जना?"
"माँ जी, शिवाजी महाराज के बेटे की अंतड़ियाँ निकालकर उस बादशाह ने
नदी की रेत में फेंक दी हैं। इसकी शर्म हमारे गाँव के मर्दों को क्यों नहीं आ रही
है? ये मुये रणुए क्यों मूँछों पर ताव देते हैं और बाजार में सीना तानकर चलते हैं?"
यह खबर सुनते ही राधाबाई पाटील के हाथ का निवाला नीचे गिर गया।
पाटील के बाड़े के पास बढ़इयों के बाड़े और गाँव की चौपाल में भी यह दुखद
समाचार पहुँचा। समाचार पाते ही गाँव का कलेजा दहल गया। महादेव के मन्दिर में
पिछले कुछ दिनों से गोरखनाथ बाबा ठहरे हुए थे। गाँव के वरिष्ठ लोग दौड़कर
गये। वे भी दुख से काँप गये। यह दुखद समाचार उनके कानों तक पहले ही पहुँच
चुका था।
उसी शाम को दामाजी पाटील कोरेगाँव से लौट आये। लोग आकर उनके
आसपास जमा हो गये। 'दुहाई हो माई-बाप' गोपाल नाक चिल्लाते हुए आया।
पुनः महादेव मन्दिर के चबूतरे पर गाँव वालों का जमावड़ा हुआ। सभी के मन
उदास थे। बादशाह के कृत्य से सभी का कलेजा काँप गया था। भय के कारण उनके
शरीर में कँपकँपी छूट रही थी। शम्भूराजा की हत्या के समाचार से सभी को पीड़ा
हो रही थी। अनेक लोगों की आँखों में आँसू भरे थे।
अपने को न रोक पाकर गोरखनाथ जी बोले, "और तो कुछ नहीं, किन्तु
महाराज के बेटे का रक्त-मांस अपने गाँव की सीमा के पास पड़ा रहे और हम
चुपचाप बैठे रहें, यह सोचकर दुख हो रहा है?"
"आपकी बात सच है महाराज।" मन्दिर के बाहर बैठा गोविन्द नाक बोला,
"शिवाजी महाराज ने इस प्रदेश में अपने बाल-बच्चों पर कुछ कम उपकार किये हैं
क्या? आज उनके बेटे की अंतड़ियों के लोथड़े हमारी सीमा पर पड़े हैं और हम
हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें यह ठीक नहीं है। पाटीलजी आप सोचें।"
दामाजी पाटील आस्तिक वृत्ति का व्यक्ति था। पंढरीनाथ की नियमित सेवा
करता था। तुकोबा के चिरंजीव, नारायण महाराज को पिछले कुछ वर्षों से सरकारी
सहायता मिल रही थी। शम्भूराजा के समय में ही देहू से पंढरपुर के लिए पालकी
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यात्रा आरम्भ हो गयी थी। उसके साथ दामाजी ने चार बार यात्राएँ की थीं। गोविन्द
नाक ने अपने जीवन में शम्भूराजा की बहादुरी की असंख्य कहानियाँ सुनी थीं।
उसका सगा मौसेरा भाई रायप्पा नाक अपने भाई के साथ बहादुरगढ़ की ओर निकल
गया था। उसे शम्भू महाराज से मिलना था। परन्तु वे दोनों भाई लौटकर नहीं आये।
वहीं कहीं शहीद हो गये। शिवाजी और सम्भाजी के साथ सारे गाँव का ऐसा ही
आत्मीय रिश्ता था। इसलिए सभी छोटे-बड़े तिलमिला रहे थे।
आज का यह प्रसंग बहुत जटिल था। सभी की बातें सुनकर दामाजी पाटील
ने निर्णायक स्वर में कहा, "भाइयो, शम्भू महाराज के लिए आप लोगों की अपेक्षा
मेरे दिल में अधिक दर्द है। पर करना क्या है? गाँव के सामने ही तीन-चार लाख
की फौज का घेरा लगा हुआ है। बादशाह की शक्ति असीम है। बादशाह ने फरमान
जारी किया है कि शम्भू महाराज के रक्त-मांस को किसी को छूना नहीं है।"
"सच है पाटील, आज दिनभर आसपास के दस गाँवों के लोग दिनभर घर
से बाहर नहीं निकले। सभी भयभीत होकर सोच रहे हैं कि बादशाह के साथ
बेवजह पंगा क्यों लिया जाए? अपने गाँव के साठ-सत्तर युवकों को चार दिन पहले
सैनिकों ने इतना पीटा है कि उन युवकों ने अभी भी बिस्तर नहीं छोड़ा है। अब फिर
गाँव में नयी मुसीबत नहीं चाहिए। पाँच कोस के क्षेत्र में अन्य सभी गाँव चुपचाप
बैठे हैं तो हम ही क्यों यह आफत मोल लें?"
भोजन का समय हो गया था। गाँव के पाटील ने अपना निर्णय सुना दिया।
गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गये। वे रोटी खाकर बिस्तर में जाने की तैयारी
करने लगे।
किन्तु जना धोबिन बड़ी साहसी महिला थी। राधाबाई पाटील के साथ उसकी
घनिष्ठ मित्रता थी। जना आज अपना दाना पानी भूलकर राधाबाई के बाड़े में ही
बैठी थी। राधाबाई ने भोजन परोसते समय पुनः पाटील से निवेदन किया, "शम्भू
महाराज के लिए कुछ तो कीजिए जी?" राधाबाई ने बहुत आग्रह किया किन्तु
मुगल सेना के विरुद्ध खड़े होने की दामाजी की इच्छा न थी।
अन्ततः बाड़े में राधाबाई और जना ही बैठे रह गये थे। राधाबाई ने गोविन्दा
के द्वारा गाँव की महिलाओं को सन्देश भेजा। सन्देश पाते ही गाँव की माताएँ,
बेटियाँ आदि पाटील के बाड़े में इकट्ठा हो गयीं। गाँव की उन महिलाओं को हाथ
उठाकर जना ने सम्बोधित किया, "इतनी निर्दयता? दुनिया पर क्या पानी पड़ गया
है? अपने गाँव के एकदम पास शम्भू महाराज के मांस के लोथड़े इस तरह क्यों पड़े
रह जाएँ? पाटीलबाई, मैं तो कहती हूँ कि हमारे पूर्वजों ने पिछले जन्मों में जरूर बड़े
पुण्य किये होंगे। इसीलिए तो शिवाजी महाराज का बेटा हमारे गाँव की सीमा की
गोद में सोने के लिए इतनी दूर आ गया।"
सम्भाजी :: 771
शिवाजी और सम्भाजी राजा के विषय में चर्चा होने लगी। उनकी स्मृतियों से
महिलाओं का कलेजा काँपने लगा। रात काफी बीत चुकी थी फिर भी वहाँ से हटने
के लिए कोई तैयार नहीं था। मन्दिर के गोरखनाथ बाबा को पाटिलबाई ने अपने बाड़े
पर बुलवा लिया। गोरखनाथ बाबा कुछ वर्ष पहले सज्जनगढ़ पर शम्भू महाराज से
मिले थे। उसकी चर्चा करते हुए बाबा को स्मरण हुआ कि स्वराज्य के युवराज
कितने साहसी और उदार थे। यह चर्चा करते-करते उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं।
अन्य उपस्थित लोग भी भीतर ही भीतर हिल गये। इसी बीच इस पूरे प्रसंग से
व्यथित गोविन्दा नाक वहाँ आ गया। अपनी लाठी को पेट पर टिकाते हुए वह कुछ
दूरी पर बैठ गया।
जना क्रोध से आगबबूला हो रही थी। वह गोरखनाथ बाबा से क्रोधावेश में
पूछने लगी, "बाबा, मान लीजिए कोई बड़ा भूकम्प आ जाये तो उसमें पूरा गाँव
नीचे धँस सकता है कि नहीं?"
"सच है।"
"जंगल में जब दावाग्नि लगती है तो वहाँ के गाँव जलकर खाक होते हैं कि
नहीं?"
"बिल्कुल होते हैं, बिटिया।"
"तो मैं कहती हूँ कि हम ऐसे ही निकलकर चलें और शम्भू महाराज के रक्त
मांस को इकट्ठा करके ले आयें, उनका दाह संस्कार करें। आखिर बादशाह करेगा भी
तो क्या? गाँव को जला देगा, इतना ही न?"
जना की बात सुनकर राधाबाई भी उठकर खड़ी हो गयीं। उनका भी खून
उबल पड़ा। इसी बीच गोरखनाथ बाबा बोल पड़े, "अपनी परम्परा के अनुसार गाँव
के आसपास यदि कोई लावारिस शव पड़ा हुआ मिले तो उसे उठाकर दाह संस्कार
करना चाहिए, इस प्रकार मनुष्य शरीर को मुक्ति दी जाती है। शास्त्रों और पुराणों का
भी ऐसा ही आदेश है।"
और यहाँ शिवाजी महाराज के बेटे के शरीर के लोथड़े पड़े हैं। फिर भी हम
सारे नामर्द चूड़ियाँ पहनकर चुप बैठे हैं।" दूर से गोविन्दा की आवाज आयी।
उस एकत्र भीड़ में मानो क्रोध और दुख से प्रेरित नशा चढ़ गया। सारी
अबलाएँ सबला बनकर खड़ी हो गयीं। क्रोध से वे आगबबूला हो रही थीं।
"चलोऽऽ, नदी की ओर चलोऽऽ" चारों ओर से शोर उठा। ये महिलाएँ
डंडे, लकड़ी, मूसल जो कुछ भी मिला वह लेकर जाने के लिए तैयार हो गयीं।
बाहर घना अँधेरा था किन्तु सभी माताएँ और पुत्रियाँ आँचल कमर में खोंसकर अपने
लक्ष्य के लिए तैयार हो गयीं।
बाड़े के भीतर उठने वाला शोर दामाजी पाटिल के कानों में पड़ा। भीतर सोये
772 :: सम्भाजी
हुए पाटील हड़बड़ी में बाहर आ गये। वे गुर्राये, "भगवान यह क्या बचपना चला
रखा है? बादशाह गाँव पर गधे का हल चलाएगा तब पता चलेगा आपको।"
"देखिए जी! शिवाजी महाराज के बेटे का मांस चील और गिद्धों को देने से
पहले यदि हम मर जाएँ तो क्या बुरा है? ऐसा गाँव और ऐसा जीवन चाहिए
किसलिए? संभालिए अपना गाँव और घर। हम तो चले।"
राधाबाई पाटील ने हाथ में भाला ले लिया और बाड़े से तीर की तरह बाहर
निकलीं। उनके साथ जना धोबिन और हाथ में कमंडल लिये गोरखनाथ बाबा
निकले। साथ बढ़ूगाँव की सारी स्त्रियाँ भी निकल पड़ीं। गाँव की सीमा पार कर
सब नदी की ओर दौड़ने लगीं। आगे आगे हाथ की लाठी नचाता गोविन्दा नाक
था।
नदी का किनारा समीप आने पर स्त्रियाँ बड़ी सावधानी से नदी कछार उतरने
लगीं। वे नहीं चाहती थीं कि शाही फौज को इसकी भनक लगे। आसमान में घना
अँधेरा था। महिलाओं ने सहजभाव से पीछे मुड़कर देखा। गाँव के सारे पुरुष उनके
पीछे दौड़ते हुए नदी के किनारे आ गये थे। उनमें दामाजी पाटील भी थे। जो लड़के
घायल हो गये थे, उनमें से भी कुछ बड़े उत्साह से लँगड़ाते हुए पीछे-पीछे दौड़ते
आ गये थे।
दगामस्ती मौज मजा करने के बाद, बादशाह के सैनिक देर से सोये थे।
इसलिए उन्हें गहरी नींद आ गयी थी।
गाँव वाले दुबके-दुबके नदी का पाट पार किये। दूसरे किनारे पहुँचकर गाँव
वालो ने माचिस कांडी जलाई। उसके फुरफुरे प्रकाश में नदी का किनारा प्रकाशित
हो गया। शम्भू महाराज के कान, हाथ पैर के टुकड़े जैसे एक-एक अवयव मिलने
लगे। गाँव वालों ने अपनी धोतियाँ खोलीं और शम्भूराजा के मांस के टुकड़ों को
उनमें इकट्ठा किया।
अपना काम कर लेने के बाद सभी ग्रामीण झपाटे से वापस लौटे। वे गाँव की
चौपाल पर वापस पहुँच गये।
लड़के अपने घरों की ओर भागे। कोई उपले लेकर आया तो कोई लकड़ी
लेकर आया। दाहक्रिया की पूरी तैयारी की गयी। किन्तु कठिन प्रश्न यह उपस्थित
हुआ कि किसकी जगह में चिता रचाई जाए?
दामाजी पाटील तो अपनी सारी जमीन निछावर करने को तैयार था किन्तु
उसकी जमीन कोसभर की दूरी पर थी। गाँव के अन्य जमीन मालिक घबरा रहे थे
उन्हें भय था कि कल बादशाह के कर्मचारी आकर उनकी गर्दन पकड़े तो?
अमीरों का वह पाखंड गोविन्दा से सहन नहीं हुआ। वह आगे बढ़कर अपनी
जमीन दिखाते हुए बोला, "आइए, इधर आइए। यह हम महारों की जमीन है। यहीं
सम्भाजी :: 773
हमारी ही जमीन में शम्भू महाराज का दाह संस्कार कीजिए। आप अमीर लोग हैं
आपको घर चाहिए, जमीन चाहिए। हम महार हैं, हमें आप जैसा ताम-झाम कहाँ
लगता है? कल बादशाह का संकट आया तो परिवार लेकर चले जाएँगे।''
"अरे, गोविन्दा का मौसेरा भाई रायप्पा भी शम्भूराजा का सेवक था।'' बीच
से कोई बोला।
"सिर्फ रायप्पा ही नहीं महाराज, शिवाजी महाराज की पालकी को कहार के
रूप में जन्मभर कौन ढोता रहा? हमारी ही जाति के लोग न? और इन शम्भू
महाराज की बात क्या कहें? हम महार्रों के लड़कों की थाली में हाथ डालकर साथ
खाने वाला यह पहला राजा था भाइयो। हम उन्हें कैसे भूल सकते हैं?''
गोविन्दा की ही जमीन में शीघ्रता से चिता तैयार की गयी। अन्तिम संस्कार
शीघ्रता से पूरा करना था। बादशाह के गुंडों के कभी भी आ जाने की आशंका थी।
दामाजी पाटील ने गाँव के बाहर युवकों की फौज खड़ी कर दी थी। उन्हें निर्देश
दिया गया था कि यदि बादशाह के घुड़सवार किसी ओर से अचानक आयें तो उन्हें
गाँव की सीमा के बाहर रोका जाए। ढेलबाँस और पत्थरों के टुकड़ों के साथ खड़े
इन युवकों को कहा गया था कि प्राण चले जायें तो भी दाह संस्कार में रुकावट नहीं
आनी चाहिए। इसी आदेश के अनुसार गाँव के लड़के सीमा पर पहरा देते खड़े थे।
गोरखनाथ बाबा ने चिता पर बेलपत्र और तुलसीपत्र चढ़ाए।
शम्भू महाराज की चिता को अग्नि दी गयी।
आग धधक कर जलने लगी।
आग की लपटें काले अंधेरे में आसमान की ओर उछलने लगीं।
इसके साथ ही गाँव वालों ने विलाप करना आरम्भ कर दिया। स्त्रियाँ और
बच्चे जोर-जोर से रोने लगे। एक-दूसरे से लिपटकर रोने वालों का विलाप पूरे गाँव
में फैल गया।
"अरे रायगढ़ के राजेश्वरऽऽ, तू कहाँ से आ गया रेऽऽ, अरे उड़ते पखेरूऽऽ
हे शम्भू महाराजऽऽ।''
भोर होने से पहले ही चिता बुझा दी गयी। महाराज की गर्म राख लेकर पुनः
सारा गाँव भीमा नदी के किनारे की ओर दौड़ा। किरणों के फूटने से पहले वह राख
नदी को अर्पित कर दी गयी।
अब उजाला होने लगा था। पखेरू जाग गये थे। नदी के तट पर एकत्र गाँव
के लोग एक-दूसरे को अभिमान से देख रहे थे। एक महान कार्य के सम्पन्न कर
पाने का सन्तोष उनके चेहरों पर विद्यमान था। वरिष्ठ स्त्रियों के मुख पर वीरता की
श्री झलक रही थी।
774 :: सम्भाजी
भीमा की धारा की ओर देखते हुए गोरखनाथ बाबा ने हाथ जोड़ लिए।
श्रद्धाभाव से उन्होंने धारा की वन्दना की। बाबा के आसपास गाँव के लोगों की भीड़
जमा हो गयी थी। बाबा गदगद स्वर में बोले-
“गाँववालों यह बात सच है। तुम्हारे पूर्वजों के महान पुण्यों के कारण ही
शिवाजी महाराज का यह पराक्रमी बेटा चिरनिद्रा में लीन होने के लिए, तुम्हारे गाँव
की मिट्टी की गोद में आया। उधर उस इन्द्रायणी को देखिए। कुछ वर्ष पहले कुछ
दुष्ट समाज कंटकों ने तुकोबा माउली की अभंग गाथा को उसकी धारा में डुबो दिया
था। कहते हैं कि स्वयं माता इन्द्रायणी ने उसे पानी के बाहर निकाल दिया। उसी
प्रकार काल के भीतर समायी हमारे शिवपुत्र की पराक्रम गाथा को ऊपर आने में
कितने वर्ष लगेंगे, किसी को भी ज्ञात नहीं। किन्तु आज, कल, परसों, नरसों या कुछ
शतकों के बाद ही क्यों न हो, वह ऊपर आएगी अवश्य। क्योंकि सत्य से अधिक
शाश्वत चीज संसार में दूसरी नहीं है। जब कभी भ्रम और अफवाहों के पर्दे फाड़कर
वास्तविकता समाज के सामने अपने सही रूप में आएगी तब देहू और आलेंदी की
तरह इस बढ़ गाँव में भी मेले लगेंगे। देश के लिए, धर्म के लिए, मिट्टी के लिए
और स्वाभिमान के लिए मृत्यु को गले लगाने वाले इस वीर पुरुष की समाधि के
दर्शन करने के लिए, इस शक्ति-स्थल की ओर दुनिया दौड़ेगी।”
सम्भाजी . 775
सम्भाजी : यथार्थ और अयथार्थ
- सम्भाजी के व्यक्तिचित्र को धूमिल, अवास्तविक और विकृत बनाने का
आरम्भ मल्हार रामराव चिटणीस ने किया। ये बालाजी आवजी के वंशज थे। उन्होंने
यह विवरण सम्भाजी महाराज की मृत्यु के एक सौ पचीस वर्ष बाद लिखा। उनके
पूर्वज बालाजी आवजी और उनके पुत्र आवजी को हाथी के पैर के नीचे कुचलवाकर
मार दिया गया था। इसका दुख मल्हारराव के मन में पहले से ही था। यह इतिहास
लेखन वस्तुतः उसी प्रतिशोध का परिणाम था। - मल्हारराव ने अपना अधिकाधिक असन्तोष कवि कलश को लेकर व्यक्त
किया है उनके अनुसार उस अघोरी कापालिक के कारण ही राजा और राज्य के लिए
खतरा पैदा हुआ। यही उनका प्रमुख अनुमान है। परन्तु सम्भाजी राजा, औरंगजेब
जैसे प्रबल शत्रु और उसकी बलशाली सेना के साथ आठ वर्षों तक किस तरह जूझते
रहे, यह उनके ध्यान में नहीं आया।
विशेष रूप से सम्भाजी के दक्षिण कर्नाटक पर किये गये दो आक्रमण,
बुरहानपुर पर उनका दबाव, कुशल अंग्रेजों पर उनके प्रभाव, अरबों के साथ मैत्री,
बसई से लेकर पणजी तक पश्चिमी तट के प्रत्येक बन्दरगाह पर पुर्तगालियों के साथ
संघर्ष, का कोई विवरण मल्हारराव के पास नहीं है। उन्हें बस एक सत्य मालूम है
कि सम्भाजी ने अपने वरिष्ठ कर्मचारियों और सगे सम्बन्धियों को कैद किया था।
विशेष रूप से 1685 के पश्चात् महाराष्ट्र के भयानक अकाल और उसके दुखद
परिणाम, उसी प्रकार गोलकुंडा और बीजापुर के शासकों को मिलाकर औरंगजेब के
आक्रमण के विरुद्ध सम्भाजी द्वारा छेड़ा गया अभियान और महासंग्राम की तैयारी
की ओर इस इतिहास में कोई ध्यान नहीं दिया गया। - मराठों का विश्वसनीय इतिहास लिखने में रियासतकार सरदेसाई ने
अद्वितीय कार्य किया। ग्रांट डफ के बाद उन्होंने ही मराठों के क्रमवार इतिहास
लेखन का कार्य सम्पन्न किया। इतिहास के कोनों में अलक्षित तथ्यों को उन्होंने
स्पष्ट रूप से आलोकित किया। 1832 में 'हितचिन्तक' मासिक पत्रिका में आपने
776 . सम्भाजी
'भाऊसाहब पेशवा के जीवनवृत्त की रेखाएँ' शीर्षक से एक आलेख लिखा था।
'पानीपत' उपन्यास लिखते समय भाऊसाहब के अभिनव चरित्र चित्रण में मैंने उस
लेख का सुन्दर उपयोग किया था।
किन्तु रियासती में सम्भाजी के समय का इतिहास लिखते समय सरदेसाई के
भीतर का अनुशासित, सजग और नीर-क्षीर विवेकी इतिहासकार दिखाई नहीं
पड़ता। मल्हारराव द्वारा किये गये मिथ्या और द्वेषपूर्ण चित्रण से सम्भाजी के चरित्र
पर धूल की इतनी मोटी पर्त जम गयी है कि उसे हटा पाना परिश्रम का कार्य है।
इसलिए सरदेसाई ने भी लगभग मल्हारराव की कार्बन कापी ही तैयार की।
'रियासत' में अनेक असत्य और विकृत विधान भरे पड़े हैं।
शिवाजी महाराज ने कभी भी पन्हालगढ़ पर सम्भाजी को कैद अथवा
नजरबन्द नहीं किया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह प्रमाणित है। दिलेरखान के
पास जाते समय उनकी पत्नी दुर्गादेवी साथ थीं न कि येसूबाई, परन्तु रियासतकार
येसूबाई को वहाँ भेज देते हैं और बड़ी नाटकीयता से उन्हें पुरुषवेष में तैयार करके
उन्हें मुक्त भी करा देते हैं। अपनी रियासत के पहले खंड 'शककर्ता शिवाजी' के
पृष्ठ क्रमांक 344 पर (सद्यःप्रकाशित पापुलर प्रकाशन का संस्करण देखें)
रियासतकार लिखते हैं कि 'सोयराबाई सम्भाजी द्वारा मारी गयीं।' इसके विपरीत
इस बात के असंख्य प्रमाण तब भी थे और आज भी हैं कि सम्भाजी के
सिंहासनारोहण के वर्ष डेढ़ वर्ष बाद तक सोयराबाई जीवित रहीं।
4 सम्भाजी के सम्बन्ध में अत्यधिक मात्रा में पुर्तगाली दस्तावेज मूल रूप में
उपलब्ध हैं। कवि कलश और उनके बीच हुए पत्राचार और अँग्रेजों के साथ हुई
सन्धि के मूल दस्तावेज उपलब्ध हैं। आज भी वाराणसी की काशी नागरी प्रचारिणी
सभा में सम्भाजी के संस्कृत काव्य महाकाव्य, ब्रजभाषा काव्य सम्बन्धी जानकारी
सुरक्षित है। दुर्दैव से किसी अध्येता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत
अध्येताओं में इस बात की होड़ लगी रही कि वे किस प्रकार सिद्ध कर सकें कि
शिवाजी महाराज जैसे युगपुरुष का बेटा कितना मद्यपी, विषयासक्त, उद्धत और
अशिष्ट था।
औरंगजेब ने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि काफिर का बच्चा सम्भा जब तक हाथ
नहीं लगता, तब तक मैं मुकुट नहीं पहनूँगा। इसके अनुसार अपने नंगे सिर,
हिन्दुस्तान का शहंशाह सम्भाजी की खोज में जंगल-जंगल भटकता रहा। इस बात
के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होने पर भी हमारे नाटककारों को उसमें कोई
नाट्यतत्त्व दिखाई नहीं पड़ा। इसके विपरीत विषयी, क्रोधी और दुष्ट राजकुमार
उन्हें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ड्रामेटिक डिवाइस दिखाई पड़ी। इतिहासकारों ने भी उसी
सम्भाजी 777
का समर्थन किया। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। कुडालकर बाकरे शास्त्री संस्कृत
दानपत्र में, जो आज भी उपलब्ध है, सम्भाजी का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वे
भावुक मन के राजकुमार और स्फटिक से भी निर्मल थे। रियासती का 'उग्र प्रकृति
सम्भाजी' खंड शीर्षक के साथ ही मिथ्या विधानों से भरा पड़ा है।
5 यह सब विस्तार से लिखने का कारण यह है कि मल्हारराव की बड़ी
भूलों को रियासतकार ने ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया। नाटककारों ने 'रियासती'
को श्रेष्ठ ऐतिहासिक कृति के रूप में देखा। सम्भाजी मराठी नाटकों के लिए एक
अन्यतम विषय सिद्ध हुआ। मराठी में इस एक विषय पर सत्रह से भी अधिक नाटक
लिखे गये हैं। नाटककारों को प्रतिभा के अनेक विलक्षण पंख फूटे हैं। रायगढ़ पर
गंगासागर नामक तालाब में उन्होंने कल्पना की नाव छोड़ी। उसी नाव में बैठकर
येसूबाई नौकाविहार करती हैं। नाव से उतरकर वे झटपट रंगमंच पर प्रवेश करती हैं।
मंच पर उनका प्रवेश अपने चरित्रभ्रष्ट पति की आलोचना के लिए ही होता है।
कवि कलश के परिचय के लिए जब मंच पर पर्दा उठता है तो उन्हें भैंसे की
खाल पर अनुष्ठान करते हुए बिठाया जाता है। भैंसे की गीली या सूखी खाल
कितनी सख्त और मोटी होती है? उसे बिछाने के लिए कितने लोग लगेंगे? इस पर
बैठने वाला व्यक्ति कितना विचित्र लगेगा? एक पुराने रंगकर्मी ने मुझे बताया कि
कवि कलश के मंच पर प्रवेश के लिए हम भैंसे की खाल की जगह बकरे की खाल
बिछाते थे।
6 प्रा नरहर कुरुंदकर 'श्रीमान योगी' की प्रस्तावना में लिखते हैं,
"सम्भाजी ने पुर्तगालियों के तीन-चौथाई राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला
लिया। कर्नाटक का राज्य दुगुना हो गया, सेना पहले से दुगुनी हो गयी। शिवाजी
की राजनीति का विकास सम्भाजी में दिखाई पड़ता है।" कुरुंदकर ने सन् 1960 में
एक विस्तृत लेख लिखकर सम्भाजी के चरित्र पर उज्ज्वल प्रकाश डाला था। अरबी
और फारसी दस्तावेजों के आधार पर सेतु माधव पगड़ी जैसे वरिष्ठ अध्येता सम्भाजी
के सम्बन्ध में जीवनभर बड़े आदर और गौरव से लिखते और बोलते रहे। शिवपुत्र
सम्भाजी ने हिन्दुस्तान के पुर्तगाली शासकों को किस तरह हैरान किया? इसका
प्रमाण उन पत्रों में उपलब्ध है जो पुर्तगाली वाइसराय कांट दी आल्होर ने अपने
पुर्तगाल के राजा को लिखे थे। किन्तु इन सभी बातों की पूर्णतः उपेक्षा की गयी।
प्रा कुरुंदकर ने अपने अध्ययन के अन्त में स्पष्ट किया है कि, "सम्भाजी की
भ्रष्टता का आरोप 1690 के बाद आरम्भ हुआ। श्री पगड़ी का भी यही मत है।
इसका अर्थ यह है कि सम्भाजी के कठोर अनुशासन से जिन्हें कष्ट पहुँचा था अथवा
जागीर न बाँटने की शिवाजी महाराज की नीति का सम्भाजी ने जिस कठोरता से
778 :. सम्भाजी
पालन किया था, उससे महाराष्ट्र के बहुत से जागीरदार और जमींदार दुखी हो गये
थे। उन्होंने सम्भाजी की मृत्यु के पश्चात ही बड़े पैमाने पर सम्भाजी की बदनामी
करनी आरम्भ की।
7. शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में और प्रमुख कर्मचारियों में दुर्भाग्य से
अनेक आगे चलकर विश्वसनीय नहीं रहे। बालाजी आवजी और मोरोपन्त जैसे
वरिष्ठ एवं सम्मानित व्यक्ति इसमें सम्मीलित थे। राजनीति में कुशल अण्णाजी दत्तो
और उनके द्वारा स्थान-स्थान पर नियुक्त स्वार्थी कर्मचारियो द्वारा भ्रष्टाचार और
अविश्वसनीयता का वातावरण बढ़ रहा था। वय से तरुण और हृदय मे पवित्र
सम्भाजी ने उनके विरोध में आवाज उठाई। इससे प्रभावित अधिकारियों ने शिवाजी
महाराज से शिकायत की। इसलिए ऐन मौके पर शिवाजी महाराज ने कर्नाटक युद्ध
में उन्हें साथ ले जाने से मना कर दिया। यहीं से सम्भाजी और अधिकारियों के बीच
संघर्ष आरम्भ हुआ। पीढ़ियों के बीच का अन्तर भी इसमें कारणीभूत था।
शिवाजी के पुत्र और दूसरे छत्रपति बने सम्भाजी के भोजन में विष मिलाकर
उन्हें मारने का प्रयास इन अधिकारियों ने अनेक बार किया। इस राजद्रोह और
विश्वासघात को बार-बार क्षमा करने पर भी इसकी पुनरावृत्ति होती रही। उन लोगों
ने अपने राजा को समाप्त कर देने का प्रयास बार बार किया। इसीलिए अन्त मे इन
कर्मचारियों को राजदंड देने के कर्तव्य का निर्वाह सम्भाजी को करना पडा। इन्हीं
कर्मचारियों के वंशजों ने बाद में सम्भाजी के चरित्र का हनन किया। पानीपत के युद्ध
के समय भाऊसाहब का साथ छोड़कर जो लोग महाराष्ट्र भाग आये थे उन्होंने अपने
सम्मान की रक्षा के लिए पानीपत का जो झूठा इतिहास रचा उसमें और जानबूझकर
सम्भाजी की की गयी बदनामी में एक ही मनोवृत्ति काम कर रही थी।
8 औरंगजेब के महाआक्रमण का मुँह मोड़ने के लिए सम्भाजी ने हर सम्भव
प्रयत्न किया था। कुतुबशाह और आदिलशाह ही नहीं, इक्केरी के बासप्पा नाईक
तक दक्षिण के अनेक राजाओं का एक संघ सम्भाजी ने तैयार किया था। परन्तु
कुतुबशाह विलासी वृत्ति का और आदिलशाह उम्र में कम और अनुभव में शून्य था।
फिर भी दक्षिण की रक्षा करने में सम्भाजी राजा, हंबीरराव मोहिते, निलोपन्त पेशवा,
खंडो बल्लाल केसो त्रिमल पिंगले आदि की भूमिका उल्लेखनीय है। औरंगजेब के
सेना समुद्र से यदि सम्भाजी आठ वर्षों तक लगातार न लड़ते, दो-चार महीने में ही
हथियार डाल दिया होता तो आज का महाराष्ट्र कहाँ होता ?
9 कवि कलश के सम्बन्ध में नाटककारों ने एक कपटी, पाखंडी और धूर्त
व्यक्ति का चित्र प्रस्तुत किया है किन्तु कविराज की उपलब्ध काव्य-पंक्तियाँ उन्हें
एक ईमानदार और राजनिष्ठ व्यक्ति प्रमाणित करती हैं। एक ओर जहाँ शिवाजी
महाराज के सभी जामाता औरंगजेब के साथ जाकर मिल गये थे वहीं यह कनौजी
सम्भाजी :: 779
ब्राह्मण, सम्भाजी का साथ मृत्यु की सीढ़ियों तक निभाता रहा। विशेष रूप से 1685
के बाद जब महाराष्ट्र के अनेक मराठा और ब्राह्मण जागीरदार जागीर प्राप्त करने के
लिए औरंगजेब के कदम चूम रहे थे, ऐसे समय में कवि कलश ने पत्र लिखा था,
"राजद्रोह नहीं करूँगा। सम्भाजी महाराज का साथ नहीं छोड़ूँगा।" ऐसे अनेक मूल
पत्र उस समय के कागज पत्रों में उपलब्ध हैं। पेशवा कार्यालय में कवि कलश का
ऐसा पत्र भी सुरक्षित है जिसमें उन्होंने लिखा था कि अत्याचार के कारण धर्मान्तर
करने वाले हरसूल के कुलकर्णी को पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाए, उनका
शुद्धीकरण किया जाए। इन कागज पत्रों और प्रमाणों पर यदि गम्भीरता से विचार
किया जाये तो नाटककारों और इतिहासकारों के आक्षेप अपने आप निर्मूल हो जाते
हैं।
10. 'बुसातीन उस्-सलातिन' नामक ग्रन्थ में उल्लेख है कि सम्भाजी का
एक ब्राह्मण कन्या के साथ प्रेम था। वे उससे मिलने के लिए रात को किले से बाहर
जाते थे। यह कन्या थी अण्णाजी दत्तो की बेटी, ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं। 'द
मिलिट्री सिस्टम ऑफ मराठाज़' जैसा शोधपरक और उच्चकोटि का ग्रन्थ लिखते
हुए डॉ सेन ने कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार उस
समय प्रत्येक किले के किलेदार सन्ध्या समय किले के दरवाजों को अपने से भीतर
से ताला लगाते थे। दूसरे दिन वह स्वयं चाबी लेकर जाते थे और उनके सामने
दरवाजा खोला जाता था। स्वयं शिवाजी महाराज के किले पर रहते हुए ऐसी
परिस्थिति में आधी रात सम्भाजी का घूमना सर्वथा असम्भव कल्पना है। गोदावरी
की एक लोककथा है। श्री द. ग. गोडसे ने उसे बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
किसी सुन्दर और शौर्यवान पुरुष से अनेक स्त्रियाँ एकतरफा प्रेम कर सकती हैं।
परन्तु इसका अर्थ उस पुरुष का स्त्रीलम्पट अथवा चरित्रहीन होना नहीं होता।
11. जिस समय सम्भाजी संगमेश्वर में पकड़े गये उस समय असावधान थे
क्या? अथवा उस समय विनोद विलास में डूबे होने के कारण पकड़े गये?
इतिहासकारों ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि इस प्रवास के समय राजा
के साथ कौन-कौन थे। रायगढ़ का स्थानीय कार्यभार सँभालने वाली महारानी
येसूबाई, हिन्दवी स्वराज्य के सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े, रामदास स्वामी के पट्ट
शिष्य रंगनाथ स्वामी, धनाजी, सन्ताजी जैसे कुशल और आत्मीय जनों के बीच
सम्भाजी भोग विलास में कैसे रम सकते थे? इतिहास साक्षी है कि संगमेश्वर
पहुँचने के पहले सम्भाजी ने पास के विशालगढ़ के किले के गिरे हुए बुर्ज को दो
तीन दिन में ठीक करवाया था। यदि दूसरा समय होता तो इस कार्य में महीनों लग
जाते। उसी समय सुदूर दक्षिण के तमिल प्रान्त में केशव त्रिमल के नेतृत्व में अठारह
हजार की सेना लड़ रही थी। आंबा घाट पर सात-आठ हजार की मलकापुरी फौज
780 :: सम्भाजी
तैनात थी। फिर यह राजपुत्र असावधान कैसे था ? शादी-ब्याह के अवसर पर सौ-
दो सौ लोगों की अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़े तो कमर टेढ़ी हो जाती है। यह
बत्तीस वर्ष का शिवपुत्र प्रचंड अकाल, बादशाह से मिल गये अपने सगे बहनोइयों,
धोखेबाज देशद्रोही जागीरदारों से अकेला जूझ रहा था। अपनी साठ-सत्तर हजार
की सेना लेकर औरंगजेब की विशाल सेना का मुकाबला करने के लिए शिवपुत्र को
कितनी तैयारी करनी पड़ी होगी ? इसकी कल्पना की जा सकती है।
12. सम्भाजी महाराज ने दक्षिण में जो दो अभियान किये, उसकी ओर डॉ.
बी. मुद्धाचारी के अतिरिक्त किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। आज भी दक्षिण में
सम्भाजी के अभियान की साक्षी देने वाले अनेक शिलालेख तमिल और कन्नड़
भाषा में उपलब्ध हैं। किन्तु उनकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है।
कुछ महीने पहले मैं अपने एक आई.ए.एस. श्रेणी के अधिकारी आनन्द
पाटील (जिलाधिकारी, शिवगंगा, तमिलनाडु) के साथ त्रिचनापल्ली गया था। आज
पाषाणकोट वहाँ पर बोधचिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है। आज भी पाषाणकोट के
पास बैठकर कावेरी के पाट को देखते हुए दिल धड़कने लगता है। एक समय
कावेरी नदी में घोड़ा कुदाकर सम्भाजी ने पाषाणकोट को किस तरह जीता ? इसकी
कल्पना से शरीर काँप उठता है।
जंजीरा के पास सम्भाजी द्वारा बनाए गये सेतु के कुछ पत्थर आज भी उस
अतीत का साक्ष्य दे रहे हैं। सम्भाजी के साथ धोखा श्रृंगारपुर के पास मालेघाट की
सँकरी राह आज भी उतनी ही भयानक, अन्धकारभरी और रहस्यमय दिखाई पड़ती
है। बस के आने जाने के लिए दूसरी ओर अनुस्कुरा घाट को तोड़कर रास्ता बनाया
गया है फिर भी अनेक वाहनों के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है। उसके समीप से
आज भी सम्भाजी के समय की टूटी-फूटी राह विद्यमान है।
'मगनलाल ड्रेस वाला' के किराए के कपड़े पहनकर मद्यपी के रूप में रंगमंच
पर नाचने वाला सम्भाजी कोई और है। किन्तु सह्याद्रि की घाटियों को ढाल की तरह
उपयोग करने वाला, घोड़े पर अपना सिंहासन लादकर बादशाही फौज से जीवनभर
संघर्ष करने वाला, महाराष्ट्र के इतिहास को कल्पान्त तक कायम रखने वाला
सम्भाजी बहुत-बहुत अलग है।
13. सम्भाजी का दुखद अन्त बहुत दारुण था। जिस प्रकार नाटककार तीसरे
अंक में औरंगजेब और सम्भाजी को आमने-सामने खड़ा करते हैं, वस्तु स्थिति वैसी
नहीं है। संगमेश्वर में धोखे से पकड़े जाने के बाद से उनकी तुलापुर की मृत्यु तक
की चालीस दिनों की कालावधि अत्यन्त पीड़ादायी है। बादशाह ने दारा जैसे अपने
सगे भाई को भी दो-चार दिन की ही कैद दी थी। किन्तु सम्भाजी से उनके सभी
सम्भाजी :: 781
महत्त्वपूर्ण किलों का अधिकार औरंगजेब को लेना था। उस कालखंड में महारानी
येसूबाई, दुर्गाबाई और सम्भाजी के सभी कुटुम्बियों पर कितने अरिष्ट टूट पड़े थे
इसकी केवल कल्पना की जा सकती है।
14. ताराबाई के समय के दस्तावेजों में अर्जोजी यादव का मूल पत्र मौजूद है।
उसमें 'मातो श्री दुर्गाबाई से मिलकर आया' ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। इससे यह शंका
निर्मूल हो जाती है कि दुर्गाबाई सम्भाजी की पत्नी थीं अथवा उपपत्नी।
15. बखरकार और इतिहासकार जिस तरह दिखाते हैं, वैसी औरंगजेब की
विवाहयोग्य उस समय कोई लड़की नहीं थी। इसलिए नाटकों के अनुसार सम्भाजी
द्वारा उसके हाथ माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके अतिरिक्त यह कहना कि
सम्भाजी जीवन भर विलासी और बदचलन था किन्तु आँखों के आगे मृत्यु को देख
धार्मिक बन गया। एक दिन के लिए ही क्यों न हो 'धर्मवीर' बन गया, ठीक नहीं
है। जिन्दगीभर व्यसनी और बदचलन व्यक्ति बादशाह के पास जनानखाने की
चाभी माँगेगा। क्योंकि उसकी मूलवृत्ति वही है। बाकी की बकवास क्यों करता
बैठेगा?
कुछ लोग सम्भाजी राजा की मृत्यु के सन्दर्भ में फिल्मी ढंग से हृदय परिवर्तन
की बात करते हैं। यह पूर्णतया असत्य है। सत्य तो यह है कि युगपुरुष शिवाजी
महाराज के योग्य पुत्र सम्भाजी राजा अपने पिता के पुण्य के प्रति सजग बने रहे।
औरंगजेब के विरुद्ध अंबर के राजा रामसिंह को संस्कृत में लिखा गया पत्र आज भी
उपलब्ध है। उसमें औरंगजेब जैसे शत्रु को नेस्तनाबूद करने के लिए उत्तर के राजाओं
को एक होने का आवाहन किया गया है। सम्भाजी राजा को मराठा नौसेना का
महत्त्व अच्छी तरह ज्ञात था। इसीलिए शिवाजी महाराज के बाद उन्होंने एक भी
बेड़ा कम नहीं होने दिया। मुम्बई बन्दरगाह का महत्त्व समझने के कारण ही उन्होंने
अंग्रेज गवर्नर केजविन से मुम्बई खरीदने का प्रयास किया। अन्त में उन्होंने कराल
काल के मुँह में अपना सिर दे दिया किन्तु सह्याद्रि का एक भी महत्त्वपूर्ण किला
औरंगजेब के हाथ में नहीं जाने दिया। त्रिचनापल्ली से बुरहानपुर तक उन्होंने अपनी
तलवार का चमत्कार दिखाया। जिस उद्देश्य से वे आठ वर्ष तक जूझते रहे, उसी
ध्येय से आयु के मात्र बत्तीसवें वर्ष में मृत्यु के सामने गये।
16. इस बृहद उपन्यास के लेखन में मेरे अनेक मित्रों और शुभेच्छुओं ने
आत्मीय सहयोग प्रदान किया, उन सभी का मैं हृदय से आभारी हूँ। महान शोधकर्ता
डॉ. र.वि. हेरवाडकर की पुत्री सौभाग्यवती शिरीन कुलकर्णी ने हेरवाडकर के
संग्रहों में से अनेक ग्रन्थ उपलब्ध कराए। इन ग्रन्थों से मुझे बड़ी सहायता मिली।
इसी प्रकार डॉ. सदाशिव शिवदे ने अपने संग्रह से अनेक दस्तावेज उपलब्ध कराए।
इसके लिए मैं उनका सदैव ऋणी रहूँगा। आज महाराष्ट्र में सम्भाजी के साहित्य पर
782 :: सम्भाजी
गहराई से शोध करने वाले डॉ. जयसिंह राव पवार और डॉ. सदाशिव शिवदे ख्यात
शोधकर्ता हैं। इन दोनों के साथ समय-समय पर होने वाले विचार-विमर्श और
उनके द्वारा दिए गये सुझावों का मुझे बहुत लाभ हुआ है। इसके अतिरिक्त पुणे के
डेकन कॉलेज की ग्रन्थपाल सौभाग्यवती मोरे, लोकमान्य तिलक ग्रन्थालय,
चिपलूण के कार्यवाह, मेरे मित्र प्रकाश देशपाण्डे, सुधागढ़ पाली के श्री सूर्यकान्त
ताटे और सुरेश पोतदार का सहयोग भी मेरे लिए मूल्यवान है। पत्रकार श्री मधुकर
भावे, और उल्लासदादा पवार ने मुझे इस संकल्प सिद्धि की प्रेरणा निरन्तर दी है।
बहादुरगढ़ (तहसील श्रीगोंदा) की यात्रा के समय मेरे मित्र प्रकाश और श्री
अरुण जाखड़े ने बहुत समय दिया। शृंगारपुर और संगमेश्वर देखते समय श्री
मुरलीधर बोरसूदकर, सत्यवान बिचारे, श्रीकान्त बेड़ेकर, शृंगारपुर के दीपक म्हस्के
व विनायक म्हस्के तथा मेरे अधिकारी मित्र दिनकर पाटील व. वसन्त पाटील ने
उत्साह से सहयोग किया। भयंकर मालेघाट देखते समय सत्यवान बिचारे सर्पदंश के
शिकार हो गये थे। साधन सामग्री की आपूर्ति करने वाले पूर्व केन्द्रीय मन्त्री रमाकान्त
खलप और नासिक के लोकेश शेवड़े का भी मैं हृदय से आभारी हूँ। श्री उद्धव
ठाकरे ने स्वयं हेलिकाप्टर से जंजीरा और रायगढ़ किले के स्वयं लिए गये दो
छायाचित्र उपलब्ध कराए। मैं उनका आभारी हूँ। इस ग्रन्थ के महत्त्व की वृद्धि करने
वाले अनेक छायाचित्र खींचने वाले, स्थान-स्थान पर मेरे साथ भटकने वाले
छायाचित्रकार प्रवीण देशपाण्डे का मैं आभार मानता हूँ।
इस उपन्यास के लेखन में मेरे मित्र उपन्यासकार श्री अनन्त सामन्त श्री
सम्भाजी जाधव, मेरी पत्नी सौभाग्यवती चन्द्रसेना पाटील, बन्धु सुरेश पाटील,
कविवर्य केलुसकर के साथ हुई चर्चाओं का बड़ा उपयोग हुआ है। मेरे मित्र
गजलकार श्री दिलीप पांढरपट्टे के साथ विचार-विमर्श से उर्दू भाषा के उपयोग में
महत्त्वपूर्ण सहायता मिली। इस उपन्यास की पांडुलिपि तैयार करने में श्री पंडित
आलुगड़े की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मैं उनकी लगनशीलता और कार्यकुशलता के
लिए उन्हें शाबासी देता हूँ।
श्री शंकर सारडा, डॉ. म.द. हातकडंगलेकर, निर्मल भट्टाचार्य, वामन
भोवाल, सुहास सोनावणे, कल्याण तावरे, डॉ. सुवर्णा निंबालकर विलास राठौड़,
डॉ. हिकमत उदान, प्रा अशोक गोडबोले, श्री रमेश कीर आदि ने मुझ पर और मेरे
साहित्य पर सदैव ही स्नेह की वर्षा की है। उनके ऋण से उऋण होना सम्भव नहीं।
चित्रकार श्री चन्द्रमोहन कुलकर्णी ने चित्रांकन की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक
निभाई। उसी तरह इस वृहद उपन्यास को समय पर और सुरुचिपूर्ण ढंग से
प्रकाशित करने के लिए श्री अनिल और सुनील मेहता-पिता-पुत्रों का आभारी हूँ।
प्रकाशन के सन्दर्भ में 'मेहता पब्लिशिंग हाउस' की श्रीमती चारुलता पाटील और
सम्भाजी :: 783
अश्विनी खेर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ।
मुझे विश्वास है कि आज तक जिस आत्मीयता से मेरे उपन्यासों का मराठी
भाषा में आदर होता रहा है उसी प्रकार 'सम्भाजी' का भी होगा। उसी प्रकार अन्य
भारतीय भाषाओं में असंख्य पाठकों की ममता मुझे मिलेगी।
प्रस्तुत उपन्यास में दिनांक, सन् और अन्य विवरण अँग्रेजी पद्धति से केवल
पाठकों की सुविधा के लिए दिए गये हैं। पाठक कृपया इस बात को ध्यान में रखें।
17. सम्भाजी महाराज के व्यक्तित्व और चरित्र पर अभिनव प्रकाश डालने
का महत्त्वपूर्ण कार्य सबसे पहले वा.सी. बेन्द्रे ने किया। उसके पश्चात् सेतु
माधवराव पगड़ी, कमल गोखले, विजय देशमुख से लेकर डॉ. जयसिंहराव पवार
और डॉ. सदाशिव शिवदे तक लोगों ने निरन्तर यह कार्य किया है। स्वातंत्र्यवीर
सावरकर जैसे क्रान्तिपुरुष ने भी सम्भाजीराजा के गौरवपूर्ण कार्यों का उल्लेख अनेक
बार बड़े आदर से किया है।
दिनांक 26 फरवरी, 1908 को सन्ध्या समय सोलापुर में दासनवमी के उत्सव
के अवसर पर लोकमान्य तिलक ने एक भाषण दिया था। उस भाषण में शिवपुत्र
सम्भाजी का गुणगान करते हुए उन्होंने एक स्वरचित संस्कृत श्लोक कहा था। उसी
श्लोक से मैं अपने इस निवेदन की पूर्णाहुति करता हूँ-
"स्वधर्मे निधनं श्रेयो
गीतावचनं उज्ज्वलम्
शिवसुतोश्च हौतात्म्यं
धर्मराष्ट्रकृत्ये खलु ते।।"
-विश्वास पाटील
784 :: सम्भाजी
संदर्भ साधने
- ऐतिहासिक साधने (1588 से 1821) सम्पादक : शां. वि. आवळसकर
- श्री शिवछत्रपतींची 91 कलमी बखर
आणि भोसले घराण्याची चरित्रावली वि. स. वाकसकर - हिन्दवी स्वराज्य आणि मोगल सेतुमाधवराव पगडी
- श्री शिवछत्रपती-संकल्पित शिवचरित्राची
प्रस्तावना, आराखडा व साधने त्र्यं. शं. शेजवलकर - भारतवर्षीय मध्ययुगीन चरित्रकोश सि. वि. चित्राव
- अर्वाचीन महाराष्ट्रेतिहासातील
राज्यकारभाराचा अभ्यास (भाग 1 ला) शं. ना. जोशी - मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने वि. का. राजवाडे
खंड 1 ते 8 - कोकणचा राजकीय इतिहास डॉ. वि. गो. खोबरेकर
- मोगल-मराठा संघर्ष (फारसी साधने) सम्पादक : सेतुमाधवराव पगडी
- महाराष्ट्राचा पत्ररूप इतिहास सम्पादक : द. वि. आपटे
व प्रा. रा. वि. ओतुरकर - कवीन्द्र परमानन्दकृत श्री शिवभारत सम्पादक : सदाशिव महादेव
दिवेकर - मल्हार रामराव चिटणीस विरचित सम्पादक : र. वि. हेरवाडकर
श्रीमन्त छत्रपती सम्भाजी महाराज आणि
थोरले राजाराम महाराज यांची चरित्रे - मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने-पोर्तुगीज सम्पादक : ए. बी. द. ब्रागांस
परेरा
दप्तर-खंड तिसरा आशिया विभाग अनुवादक- स. शं. देसाई
(1 ते 5)
सम्भाजी :: 785