छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
रहना बादशाह का रोज का नियम था। किन्तु पिछले चार दिनों से बादशाह बहुत
बेचैन था। तम्बू के भीतर बैठे उससे रहा ही न जाता था। चन्दनी अम्बारी में सजे
और सूँड़ से पूँछ तक स्वर्णांलंकारों को धारण किये अपने शानदार हाथी पर वह बड़े
ठाट से बैठता। उसके आगे-पीछे पाँच पाँच सौ घुड़सवारों की सेना रहती।
बादशाह भैरवनाथ मन्दिर के समीप वाली लम्बी सीमारेखा को पार करता। वहाँ से
उसका काफिला पूरब की ओर सरस्वती के सूखे पाट में घुस जाता। वहाँ से
काफिला खंडोबा के विस्तृत समतल मैदान पर पहुँच जाता। औरंगजेब अपने हाथी
पर से अपनी नजर चारों ओर घुमाता। बहादुरगढ़ के आसपास की धूप उसे परेशान
करती। वह मन ही मन कहता, "अल्ला करें, उस जहन्नमी सम्भा का यहाँ आना
मृगजाल न बन जाय।" इन विचारों से बादशाह काँप उठता था।
दोपहर के बाद बादशाह का काफिला नदीतट की दूसरी ओर एक चक्कर
लगाता था। यह काफिला जब दमड़ी मस्जिद के सामने पहुँचता तो मस्जिद की
सीढ़ियों पर बैठा बूढ़ा फकीर अपने झुलसे होठों पर काली चिलम रखता और
फूँकते हुए बादशाह को देखकर जोर से हँसता। बहादुरगढ़ और उसके आस-पास
के इलाके की चार लाख की बस्ती में यह फटीचर फकीर अकेला व्यक्ति था जो
औरंगजेब को दूसरों की तरह झुककर सलाम नहीं करता था। फकीर होने के
बावजूद बादशाह के सामने झोली नहीं फैलाता था। उसने स्वयं एक एक दमड़ी
इकट्ठी करके दमड़ी मस्जिद खड़ी कर ली। उस फकीर की अनासक्त मुद्रा देखकर
बादशाह को शिवाजी महाराज का स्मरण हो आता था। शिवाजी नाम के एक
जमींदार ने फकीर क़ी दमड़ी की तरह ही एक-एक व्यक्ति को एकत्र किया था और
हिन्दवी स्वराज्य का एक मंगल मन्दिर खड़ा कर लिया था। शिवाजी समाप्त हुए तो
बादशाह ने सन्तोष से अपनी आँखें बन्द कर ली थीं किन्तु उसकी आँखें खुलें इसके
पहले ही दूसरी घटना घट गयी। सम्भाजी नाम का गरुड़ स्वराज्य मन्दिर के कलश
पर अपने बलशाली डैने फैलाए जमकर बैठ गया था। उसके पंख जलाने के लिए
आतुर बादशाह को निरन्तर भ्रमण करते हुए दक्षिण में अपने जीवन के आठ वर्ष
गुजारने पड़े थे। उसकी दहशत बादशाह ही नहीं उसके सैनिकों और जानवरों पर
इतनी गहरी बैठ गयी थी कि सम्भाजी सचमुच गिरफ्तार हुआ है क्या ? यदि हुआ है
तो मुगल सेना तक पहुँचेगा क्या ? ऐसी अनेक शंकाएँ शहंशाह को घेर रही थीं।
भीमा नदी के नीले पाट में बादशाह की फौज का प्रतिबिम्ब दिखाई देने
लगता। बादशाह का हाथी चाँदबीबी महल के सामने रुक जाता था। नौकर जल्दी से
सीढ़ियाँ लेकर, दीवार की तरह ऊँचे हाथी से लगाते थे। बादशाह बड़े अभिमान से
नीचे उतरता था, फिर जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर जाकर महल के छज्जे
में खड़ा हो जाता था। वहाँ से कभी नदी के विस्तृत पाट को कभी पीलखाने की
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ओर देखता था। बीच-बीच में महल के दरवाजे के पास ढह गये भग्नावशेष को
देखता था। वहीं पर कभी एक सातमंजिला महल था, जो अब मिट चुका है। उसी
जगह पर एक गुप्त खजाना है, ऐसी अफवाह पूरे बहादुरगढ़ में फैली थी। वहाँ के
गुप्त धन को प्राप्त करने का पागल प्रयास अनेक साहसी लोगों ने किया था। किन्तु
वहाँ कुदाल मारते ही भयानक चमत्कार घटित होता था। बड़े बड़े डसने वाले
जहरीले भौंरे बहुत बड़ी संख्या में निकलते थे और शरीर के अंग प्रत्यंग को बींधने
लगते थे। बादशाह इन्हें मूर्खताभरी बातें मानता और उपेक्षा करता।
उस दिन बादशाह बहुत देर तक छज्जे में खड़ा रहा। उस ढहे हुए अवशेष
को ध्यान से देखता रहा। उसी के नीचे गुप्त धन है यह बात उसके ध्यान में आती
रही। उस रात बादशाह ने एक भयानक सपना देखा—
स्वयं बादशाह के हाथों में एक बड़ा गहदाला था। वह स्वयं, उसका वजीर,
उसके शहजादे, पोते और सरदार बड़े परिश्रम से उस जगह को खोद रहे थे। वे भी
पसीने से तरबतर हो गये थे। अन्ततः वे गुप्त धन की सन्दूक तक जा पहुँचे। सन्दूक
के अन्दर बहुत कीमती जवाहरात चमक रहे थे। सबसे बड़ा तेजस्वी हीरा बादशाह
ने झपटकर ले लिया। तेईस साल पहले बादशाह ने आगरे में दो पानीदार चमकती
आँखे देखी थीं। उनकी चमक इन्हीं हीरों जैसी थीं। वे आँखें सम्भाजी महाराज की
थीं। वही अनमोल हीरा अचानक हाथ में आ गया था। इसलिए बादशाह प्रसन्न
होकर खिलखिलाकर हँसने लगा। उसके साथ दमड़ी मस्जिद वाला फकीर भी
जोर जोर से हँसने लगा। इसी बीच बगल से भौंरों का दल उठा। उनकी विचित्र
और विकट ध्वनि सुनाई देने लगी। एक ही साथ दसों दिशाओं में भौंरों ने बादशाह
पर हल्ला बोल दिया।
'हर हर महादेव, हर हर महादेव' का उद्घोष होने लगा। जहाँ देखिए वहाँ
भौंर ही भौंर। भौंरों ने बादशाह के लिए दिल्ली की राह रोक दी थी। भौंरों के झुंड
के पार एक सूनी जगह पर बादशाह को अपनी कब्र दिखाई देने लगी। उस पर बिछी
चादर के टुकड़े-टुकड़े हो गये थे।
उस भयानक सपने से बादशाह का गला सूख गया। वह आधी रात में ही
बिछौने से उठ गया। बाहर बैठक में आकर उसने अपने वजीर, सेनापति और
शहजादों को जगा दिया। सभी पर एक तीखी नजर डालकर केवल इतना ही कहा
"असदखान जुल्फिकार, बरायदखान अभी का अभी हुक्म की तामील करो। कम
से कम तीस हजार की फौज किले के बाहर तैयार करो। आसपास के सौ डेढ़ सौ
गाँवों में फौज भेज दो।"
"लेकिन लेकिन हुजूर! हुक्म की तामील हो गयी है। किसी भी गाँव में
घोड़ा तो क्या कोई खस्ताहाल खच्चर भी नहीं बचा है।" असदखान ने कहा।
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“घोड़ों को नहीं दो पैर वाले गधों को कोड़े लगाओ। हर हट्टे कट्टे आदमी
को लाठी-डंडे से पीटो। दो ही दिनों में मुकर्रबखान उस काफिर बच्चे सम्भा को
लेकर आने वाला है। उस दुष्ट के हमारे पास आने तक पूरी सावधानी बरतिए।
आसपास की पंचकोसी में कोई भी मरगट्ठा गर्दन सीधी करके चलते नहीं दिखाई
देना चाहिए। सभी मूर्ख मराठों को सबक सिखाना जरूरी है।”
इस जारी किये गये हुक्म की तामील तत्काल की गयी। मुकर्रबखान की
फौज भीमा नदी के दूसरे तट पर पहुँच गयी। इसके पहले ही बादशाह ने वहाँ के
मराठों की हड्डी पसली एक कर दी थी। रास्ते के आष्टी और लिंपनगाँव जैसे गाँव
तो सिपाहियों की मार से पथरा गये थे। भीमा नदी की दाहिनी ओर बायीं ओर
केवल विह्वलताभरी चीखें और कराहें ही सुनाई दे रही थीं। कोई भी पुरुष गली
कूचों से निकलकर रास्ते पर चलता दिखाई नहीं दे रहा था। यहाँ तक कि कुत्ते भी
बाहर निकलने से घबरा रहे थे। वे बीच बीच मे अपने करुण स्वर में चिल्ला उठते
थे। उनकी अशुभसूचक करुण चिल्लाहट को सुनकर पेड़ पर बैठे उल्लू भी पत्तों के
पीछे छिपने लगे।
आठ
केवल इस समाचार से कि सम्भाजी को जिन्दा पकड़ा गया है और उसे बादशाह का
कैदी बनाया गया है, बहादुरगढ़ की फौजी छावनी में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया
था। सभी लोग अत्यन्त हर्षित थे। एक बड़ा तमाशा, जुलूस और उत्सव देखने को
मिलेगा, इस कल्पना से लोगों को चार दिन से नींद नहीं आ रही थी। पागल तो पूरे
पागल बने ही थे, सयानों को भी पागलपन के दौरे आने लगे थे। जिन्हें सर्दी, खाँसी
और हल्के ज्वर जैसी छोटी-मोटी बीमारियाँ थीं, वे भी इस समाचार से भले
चंगे हो गये।
सभी की नजरें मुकर्रबखान के आगमन पर लगी थीं। कैसी अजीब थी यह
शैतानी मुहिम। पिछले आठ सालों में सिपाहियों ने अधूरी नींद ही ली थी। लम्बी-
लम्बी दौड़ों, रामदरी जैसी घाटियों की घोर यातनाओं, प्लेग जैसी भयंकर बीमारियों
आदि से दक्षिण में सिपाहियों का दम घुटने लगा था। राजपूतों को अपने प्रदेश के
सपने आने लगे थे। जोधपुर, बीकानेर की अपनी-सी लगने वाली रूपहली बालू,
700 .: सम्भाजी
कँटीली झाड़ियाँ, अरावली की ओर से बहने वाली शीतल हवायें उन्हें अपनी ओर
खींचते थे। मुसलमान सिपाही सोचते थे कि कब आगरा और बरेली की ओर जायें
और अपने बाल-बच्चों को एक बार फिर देखें। वे सोचते थे कि दरवाजे पर खेलने
वाले बच्चे अब कितने बड़े हो गये होंगे? बड़े बूढ़ों का क्या हुआ होगा?
सभी रोज की फौजी जिन्दगी से ऊब गये थे। इसके पहले काबुल कन्दहार
की लड़ाई में बर्फ के ऊपर तलवारबाजी करके आठ-दस महीने में ही अपने बीवी
बच्चों में वापस आ गये थे। परन्तु दक्षिण की यह मुहिम तो बहुत पीड़ादायी
साबित हुई।
एक बार कभी बादशाह बूढ़ा होकर अल्लाह को प्याग हो गया तो उसका
भूत उठ खड़ा होगा और फौज को चलाएगा। ऐसा सभी फौजियों का विश्वास था।
फौज के भीतर घुसुर फुसुर बहुत होती थी किन्तु बगावत करने का साहस किसी में
भी नहीं था। जिस किसी के मन में भी ऐसा विचार उठा, उमका सिर हाथी के पैर
के नीचे कुचलकर नारियल की तरह चूर-चूर कर दिया गया।
पिछले दो-तीन सालों में गोलकुंडा और बीजापुर के अनेक सरदार आकर
औरंगजेब से मिल गये थे। उन्हें अपनी-अपनी जागीरें पाने की बड़ी उतावली थी।
गाँवों और कस्बों के किसान भी प्रमन्न थे। वे सोचते थे जो कुछ भी हो, एक बार
यह युद्ध तो रुक जाएगा। पिछले मात आठ वर्षों में खेती में कुछ अधिक पैदावार
नहीं हो पायी थी। सूखे के कारण समय पर बोवाई ही नहीं हो पायी।
अब यह आपदा समाप्त होने वाली थी।
पिछले चार दिनों से फौज में ईद से भी बढ़कर उत्सवी वातावरण बना हुआ
था। फौज के बाजार खुशी से जगमगा रहे थे। लोगों को नींद ही नहीं आ रही थी।
सभी आँखें मुकर्रब की राह देख रही थीं। बाजा बजाने वालों ने अपने तासों पर नया
चमड़ा चढ़ाया था। शहनाई की पत्तियाँ बदली गयी थीं। खिलाड़ी अपने खेलों का
अभ्यास कर रहे थे। नमाज में सभी लोग हाजिर रहते थे। फौज के साथ जो सुनार,
दर्जी जैसे व्यवसायी थे, उनके कार्य में बड़ी बरकत आ गयी थी।
अपने प्राणप्रिय बालसखा को शत्रु पकड़कर ले गया, यह समाचार पाते ही
रायप्पा महार काँप गया था। महारानी ने उससे कहा था, "राय मामा! प्राणों पर
संकट आ जाये तो भी यह पत्र महाराज तक पहुँचा दो।" महारानी के ये शब्द
रायप्पा के कानों में गूँज रहे थे। सम्भाजी के साथ हुए धोखे के कारण रायप्पा को
कुछ सूझ नहीं रहा था। देवप्पा के साथ घोड़े पर सवार वह रात में ही पंढरपुर की
ओर निकला। रास्ते में पूछ-पूछ कर उन्होंने बहादुरगढ़ के रास्ते का पता किया।
परन्तु भीमा नदी के किनारे उन्होंने जो स्थिति देखी उससे वे पानी-पानी हो गये।
आसपास के गाँव भय से तितर-बितर हो गये थे। घुड़सालें खाली हो गयी थीं।
सम्भाजी :: 701
अपने-अपने घरों को ताला लगाकर प्रजा गाँव छोड़कर चली गयी थी। गाँव श्मशान
बन गये थे। लोग कहीं बाँधों की आड़ में या नदी-नालों की खोहों में छिपे हुए थे।
जो भी हो रायप्पा को तो बहादुरगढ़ पहुँचना था। उसी इलाके में उसकी
भिश्तियों की एक टोली से भेंट हुई। चमड़े के बड़े-बड़े थैलों में पानी भरकर ले
जाना और फौजियों को पिलाना उनका मुख्य कार्य था। इन दोनों ने भी कहीं से
चमड़े की बड़ी मशक उपलब्ध की। साथ में मशक, फटी हुई पगड़ी बढ़ी हुई दाढ़ी
और काले रंग के कारण ये दोनों भाई बड़ी सहजता से उन दक्खिनी भिश्तियों में
मिल गये।
रायप्पा अन्दर का भेद जानने की कोशिश कर रहा था किन्तु दहशत के कारण
कोई कुछ बोलने को तैयार न था। भावनाविकल रायप्पा को रात-बेरात हमेशा
सम्भाजी राजा का स्मरण होता था। कालनदी की समतलभूमि और निजामपुर की
पहाड़ियों में किये गये शिकार का स्मरण उसे होता। वह विकल होकर पगड़ी का
कपड़ा मुँह में डालकर रोता था। उसकी यह अवस्था देखकर देवप्पा ने उसके पास
का पत्र निकाल लिया। उस चिट्ठी को देवप्पा ने बड़ी सावधानी से अपनी कमर में
खोंस लिया।
जुलूस के दिन भिश्तियों के मुखिया को फौजदार का आदेश आया आज
किसी बड़े राजबन्दी को लेकर सेना किले में प्रवेश करेगी। उन्हें जो टोली पानी
पिलाने के लिए तैनात हुई, उसमें रायप्पा सम्मिलित हो गया। उसी टोली को किले
के अन्दर भी जाना था। यह जानकर इन दोनों भाइयों को बड़ा सुख मिला।
दोपहर में धूप बढ़ने लगी थी। गर्मी भी बढ़ी, प्यास लगने लगी, पानी की
माँग बढ़ गयी। बगल में भैंसेगाड़ी पर पानी से भरी बड़ी-बड़ी पखालें रखी थीं।
भिश्ती अपने चमड़े के थैलों में पखाल से पानी भरते थे और फौजियों को पिलाते
थे। बादशाह के हुक्म के अनुसार मुकर्रबखान के स्वागत के लिए सभी प्रमुख सरदार
गाँव के बाहर मैदान में एकत्र हुए थे। ढोल-तासे आदि जोर-जोर से बज रहे थे।
तब तक रायप्पा को यह पता नहीं था कि यह जुलूस किसके लिए निकाला जा रहा
है। पानी बाँटते-बाँटते वह किले में अन्दर की ओर जा रहा था।
सम्भाजी राजा के शरीर की जंजीरें खड़खड़ाईं। सामने दो बदरंग ऊँट खड़े
थे। उन खस्ताहाल जानवरों की पीठ पर जीन काठी नहीं थी। पाँच-छह जनों ने
जंजीरों से जकड़े सम्भाजी राजा को ऊपर उठाया और उन्हें ऊँट पर बिठाया। राजा ने
अपनी दृष्टि इधर-उधर घुमाई। सामने हजारों फौजियों के हाथों में नंगी तलवारें
दिखीं। मैदान में सैकड़ों तम्बू और छोलदारियाँ थीं। बीच में दोनों ओर मार करने
वाली तोपों की पंक्तियाँ थीं। तोपों के पीछे काले-कलूटे रंग के गोलन्दाज खड़े थे।
उस दुष्ट नगरी में राजा के जुलूस की नहीं उनके उपहास की तैयारी चल रही थी।
702 :: सम्भाजी
सामने की ओर से फौजी पंक्तियों का जुलूस जाने वाला था। समुद्र के उमड़ते
प्रवाह की तरह जुलूस निकलने वाला था जिसमें गाँव के लोग, सैनिक और देखने
वालों की भीड़ के बीच से सैनिक आगे निकलने वाले थे। उनकी सुरक्षा का दायित्व
बहादुरगढ़ के थानेदार महादजी निंबालकर को सौंपा गया था। विशेष रूप से
शिवाजी के जामाता और सम्भाजी के बहनोई यह दायित्व बड़ी ईमानदारी से निभा
रहे थे। वे व्यवस्था की निगरानी करते इधर-उधर घूम रहे थे किन्तु सम्भाजी से
आँखें मिलाना टाल रहे थे।
खुले ऊँट पर बिठाए गये सम्भाजी को रस्सियों और जंजीरों से कसकर बाँधा
गया था। बाँधने का यह काम एक राजपूत सरदार अमरसिंह स्वयं कर रहा था।
सम्भाजी राजा ने बहुत दिनों से बन्दी होने के कारण बाहर का प्रकाश ही नहीं देखा
था। पिछले कुछ दिनों से न उनके हाथ खुले थे और न ही वे ठीक से साँस ले पा
रहे थे। किसी से बात करने का तो प्रश्न ही नहीं था। परिस्थिति ने ही उन्हें मौन
बना दिया था। अपने शरीर के चारों ओर रस्सी बाँधने वाले, लम्बी सुघड़ दाढ़ी वाले
अमरसिंह को सम्भाजी राजा ने देखा। उन्होंने अमरसिंह का हाथ पकड़ा और
भावविभोर होकर बोले, “तुम जाति से राजपूत लग रहे हो हमारे दुर्गादास के प्रदेश
के?''
“जी हाँ" उसने हुंकारी भरी।
“मित्र! तुम्हें तुम्हारे ईश्वर का वास्ता देकर कहता हूँ। बहुत हो गया यह
अपमान, हमें इस बेइज्जती से, इस यातना से मुक्त कर दो।''
“लेकिन शाही हुक्म महाराज!"
“बन्धु ! एक हिन्दू के नाते तुम्हें खून की सौगन्ध है। शिवाजी के बेटे को इस
तरह कुत्ते की मौत मरते देखना क्या तुम्हें शोभा देगा? चलो दोस्त बस एक उपकार
कर दो।" सम्भाजी ने बड़ी हताशा से कहा।
“क्या करूँ महाराज ?"
“झट से उठाओ अपनी तलवार और कर दो हमारे टुकड़े-टुकड़े। रुको मत
बन्धु ।"
अमरसिंह भावविभोर हो गया। उसने सम्भाजी राजा की आँखों में उमड़ते
आँसुओं को देखा, तत्काल उसका हाथ म्यान पर पड़ा। वह तलवार निकालने ही
वाला था कि किसी दूसरे के मजबूत हाथों का पंजा पड़ा। परिणामस्वरूप यह प्रयास
वहीं रुक गया। बगल में क्रूर चेहरे वाला इखलासखान खड़ा था। उसने पूछा,
“क्यों सरदारजी क्या इरादा है?" सचमुच अमरसिंह को सम्भाजी पर बड़ी दया आ
गयी थी। किन्तु मुक्ति का यह अवसर वहीं पर समाप्त हो गया।
विडम्बना और अपमान की कोई सीमा न रही। जिस राजा के शरीर पर महँगे
सम्भाजी :: 703
से महँगे जेवरात और कपड़े अपने हाथ सें पहनाने के लिए सूरत से पणजी तक के
दर्जी टूट पड़ते थे, उसी सम्भाजी राजा और कविराज के वस्त्र रास्ते पर उतार दिए
गये। उन्हें विदूषकों वाले रंग-बिरंगे कपड़े पहनाए गये। जिनके गले में हीरे-मोती
के हार चमकते थे उनके गले में गाय-बैल के गले में भी चुभने वाली ईरान में जिस
तरह बड़े अपराधियों के सिर पर लकड़ी की लम्बी टोपियाँ रखी जाती थीं उसी
प्रकार इन दोनों के सिर पर लकड़ी की लम्बी टोपियाँ रख दी गयी थीं। उन पर
अनेक छोटे-छोटे चिह्न रंग दिए गये थे। उन पर छोटे-छोटे घुँघरू बाँध दिये गये थे।
कुछ नौकर दोनों ऊँटों को पकड़कर आगे चलने लगे। तासे-तुरुहियाँ जोर-जोर से
बज रही थीं। राजा और कविराज को ऊँट पर उल्टा बिठाया गया था। उन्हें उन
जानवरों से बड़ी क्रूरता के साथ बाँधा गया था। राजा का हाथ ऊपर उठवाकर उसमें
एक सुराख वाली पट्टी डाल दी गयी थी। पट्टी में दोनों हाथ फँसा दिए गये थे। उन
दोनों की गर्दनें भी लकड़ी की पट्टी में अटका दी गयी थीं। इसलिए वे अपनी गर्दन
भी इधर-उधर हिला नहीं सकते थे।
एक समय के रायगढ़ के राजेश्वर को, करोड़ों मुहरों के धनी को, बत्तीस
माणिक सोने से बने सिंहासन पर बैठने वाले मराठों के नरेश कां, उनके मुख्य प्रधान
को, मरियल ऊँट पर बिठाया गया था। उन्हें विदूषकों के भड़कीले कपड़े और
लकड़ी की टोपी पहनाए गये थे। ये दोनों कैदी स्त्रियों और बच्चों के लिए अच्छे
खासे मनोरंजन बन गये थे। उद्धृत बच्चे उन कैदियों पर छोटे-छोटे पत्थर और
कीचड़ के गोले फेंक रहे थे। जैसे किसी पेड़ पर बैठे घायल बन्दर को बच्चे चिढ़ाते
हैं, उसी तरह इनके साथ भी बन्दर उपहास चल रहा था। ढोल-तासे बज रहे थे
इनका कोलाहल सुनाई दे रहा था। जुलूस में सबसे आगे महादजी थानेदार चल रहा
था।
अब नपुंसकों में भी बड़ा जोश आ गया था। नौकर भी ऊँटों को जोर-जोर से
भगा रहे थे। यह उनकी शरारत थी। भगाते-भगाते वे ऊँटों को अचानक घुमा देते
थे। ऊँची पीठ वाले ऊँटों के अचानक घूमने से बन्दियों को झटका लगता था। शरीर
से बँधी रस्सियाँ और जंजीरें शरीर में चुभ रही थीं। सम्भाजी राजा और कविराज की
आँखों के सामने लाल-पीला दिखाई पड़ रहा था, उन्हें चक्कर आ रहा था। वे एक
ओर लटक जाते थे। उन मूक जानवरों का भी बुरा हाल हो रहा था। बार-बार
लगनेवाले धक्कों और हिचकोलों से राजा के शरीर में भयानक वेदना उठ रही थी।
उनकी यह स्थिति देखकर मूर्ख लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे।
रायप्पा पानी की थैलियाँ देते और पानी पिलाते आगे बढ़ रहा था। 'मरगट्ठे
दो कैदी' ऐसे शब्द उसके कानों में पड़े। बहुत देर के बाद 'सम्भा' शब्द उसके
कानों तक आया। यह शब्द सुनते ही वह थरथरा उठा। वह भीड़ में अपना रास्ता
बनाता हुआ और पानी देने का नाटक करता हुआ सम्भाजी के ऊँट के पीछे-पीछे
704 :: सम्भाजी
चलने लगा। एक मोड़ पर उसने सम्भाजी राजा की ओर देखा। राजा की अत्यन्त
तेजस्वी, बड़ी-बड़ी आँखें उसने देखीं, आँख से आँख मिली। राजा अत्यन्त उदासी
से हँसे। उन्होंने सोचा, 'होगा कोई अपने रायप्पा जैसा दिखाई देनेवाला भिश्ती।'
सरस्वती नदी के किनारे खंडोवा का मैदान इससे पहले कभी भी इतना
भयभीत नहीं हुआ था। बहादुरगढ़ के आसपास रहने वाले बड़े विश्वास से कहते थे
कि इस मैदान में अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भूतों का जुलूस निकलता है। इस
जुलूस के आगे-आगे बैताल अपनी जटाएँ हवा में लहराते हुए भयानक नृत्य करते
हैं। किन्तु आज का यह कबन्धों का नंगा नाच अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण था। आज का
दुर्भाग्यपूर्ण जुलूस ढोल-तासे बजाता आगे निकल रहा था। शिवाजी महाराज की
मृत्यु के केवल नौ वर्षों बाद उनके राजहंसी बेटे का खुलेआम अपमानजनक जुलूस
निकाला जा रहा था। वह भयानक दृश्य, वे मरियल ऊँट, विदूषकों का वह पहनावा
और मराठों की इज्जत की धज्जियाँ उड़ते देखकर बहादुरगढ़ की मिट्टी तक काँप
उठी थी। श्मशान और मैदान के भूत पिशाच शर्मिन्दा होकर बाहर निकल गये थे।
अपने आपको तैमूर का वंशज कहने वाले, दिल्ली की राजगद्दी की पाँच सौ वर्षों की
परम्परा का उत्तराधिकारी मानने वाले इस निरंकुश और बेवकूफ बादशाह पर सभी
जड़-चेतन हँस रहे थे।
जुलूस आगे निकला। नासमझ बच्चे और स्त्रियाँ सम्भाजी राजा पर थूक रहे
थे। इस प्रकार का अभद्र व्यवहार कर रहे थे। अपने राजा की यह अपमानजनक
स्थिति देखकर निष्ठावान रायप्पा का कलेजा टुकड़े टुकड़े हो रहा था। जंजीर की
कड़ियाँ और रस्सियाँ राजा के शरीर में चुभ रही थीं। पहले तो राजा के शरीर मे
असह्य पीड़ा उठी परन्तु धीरे-धीरे उनका शरीर संवेदनशून्य हो गया। मानो वह
सूखा काठ हो गया हो। उस दुर्देवी जीव को अब किसी का भय, कोई शर्म शेष ही
नहीं रहा। अब न किसी के प्रति क्रोध था, न ही अस्वीकार। बड़ी बड़ी गम्भीर
आँखें सीधे सामने की ओर देख रही थीं।
कहाँ गयीं वे पालकियों ? राज्यारोहण के समय रायगढ़ पर निकली वह शोभा
यात्रा ? कहाँ गये वे हाथ जिन्होंने राजा को देवता की तरह पालकी में बिठाकर
घुमाया था, राजा को स्वराज्य भर में गौरव दिया था। कहाँ वह माणिक मोतियों से
सजा राजमुकुट ? और कहाँ यह घुँघरूओ वाली विदूषक की लकड़ी की टोपी ?
कहाँ गले में चमकने वाले हीरे जवाहरात के गहने ? और कहाँ यह शरीर मे चुभने
वाली, जगखाई जंजीरों का अशोभनीय बोझ ?
माघ मास का तपता सूर्य सिर पर अंगारे बरसा रहा था। जिस सिर पर देवो की
भाँति पुष्प वृष्टि होती थी, उसी सिर पर आज फटे जूतों और पत्थरों से प्रहार हो रहा
था। यह कैसा जुलूस ? यह तो देवदूतों का सिर फोड़ने वाली शोकयात्रा थी।
वे बड़ी बड़ी आँखें झपक नहीं रही थीं। उन्हीं खुली आँखों से हांकर अतीत
सम्भाजी 705
के अनेक दृश्य मन-पटल पर उभर रहे थे। डचों, पुर्तगालियों या अँग्रेजों का कोई
प्रतिनिधि जब रायगढ़ आने लगता था तो उसके वरिष्ठ सुझाव देते थे, 'वहाँ जा हो
रहे हो तो शिवाजी से मिलने के पहले राजपुत्र सम्भाजी से अवश्य मिलना।
सम्भाजी नाम का यह युवराज बहुत होशियार, तेजस्वी और आत्मीय है। वह
शिवाजी की तरह ही तेजपुंज, नीतिज्ञ और काव्यशास्त्र निपुण है। ऐसा लगता है
मानो सम्भाजी शिवाजी महाराज के ताज में चमकने वाला तुर्रा है।' इस प्रकार के
अनेक प्रसंग स्मृतिलोक में सगुण-साकार होने लगे।
'पिताजी जहाँ-जहाँ आप अनुपस्थित रहेंगे वहाँ यह सम्भा दौड़कर पहुँच
जाएगा।' आगरा में बालक सम्भाजी के मुख से निकले इस उद्गार को काल भी
विस्मृत नहीं कर सकता। केवल नौ वर्ष का वह चुलबुला बच्चा अपने पिता की
अनुपस्थिति की रिक्तता को भरने के लिए दौड़ पड़ा था। बादशाह की आँखों में
आँख डालकर देखने वाले राजकुमार को विदूषकों का लिबास पहनाकर शैतान के
दरबार में ले जाया जा रहा था।
उस जुलूस में पहरा देने वाले मुगल सिपाही भी डरे हुए थे। इस मरियल ऊँट
पर लदा हुआ व्यक्ति सम्भाजी ही है, इस बात को अच्छी तरह जानने पर भी उन्हें
विश्वास नहीं हो रहा था। उनमें से अनेक पिछले आठ सालों में बुरहानपुर,
सोलापुर, गोवा, कल्याण जैसे किसी न किसी स्थान पर सम्भाजी की सेना से लड़े
थे। उस समय की सम्भाजी की दहशत, उनका दबदबा वे अभी तक भूल न पाए
थे। उस समय उनकी रातों की नींद उड़ गयी थी।
ढोल-तासों की कान फाड़ने वाली आवाज बहादुरगढ़ के शाही द्वार पर गूँजने
लगी। छतों पर, छज्जों पर, स्त्रियों और बच्चों की भीड़ बढ़ गयी। बहादुरगढ़ के
एक महल में महाराष्ट्र के तीन दुष्ट व्यक्ति इस तरह मुँह लटकाए खड़े थे मानो
उनका बाप मर गया है। उनके साथ महाराष्ट्र के कुछ स्वार्थी मराठा और कुछ ब्राह्मण
जागीरदार, कुछ शास्त्रीपंडित भी गम्भीरता से राह देखते खड़े थे। आसमान में काले
मेघों की सेना जमा हो गयी थी। उन काली घटाओं के पीछे मानो देवता और दानव
भी रो रहे थे। यहाँ की मिट्टी पर सोने का मुलम्मा चढ़ाने वाले शिवाजी महाराज के
योग्य पुत्र का इस प्रकार खुला अपमान किया जा रहा था। यह कृत्य देवादिकों को
भी असह्य था।
उस मरियल ऊँट पर से सम्भाजी राजा ने आसमान में छाए काले मेघों की
ओर देखा। उन काले बादलों में उन्हें जीजामाता की काली आँखों का आभास
हुआ। उनका स्मरण होते ही उनकी सूनी आँखों से आँसुओं के चार फूल गालों पर
टपक पड़े। जीजामाता ने शिवाजी के आठ विवाह इस दृष्टिकोण से किये थे कि इन
सभी जागीरदार घरानों का शिवाजी को सहयोग मिलेगा। यह उनकी व्यावहारिक
सोच थी कि संकट के ये सारे घराने शिवाजी के सहाय बनेंगे। परन्तु संसार की
706 . सम्भाजी
अलग है। मराठे हों या अन्य, जागीर और धन के लोभ ने उन्हें पागल बना दिया
था। हड्डियाँ चबाने वाले कुत्ते जिस प्रकार किसी भी हालत में हड्डियाँ छोड़ने को
तैयार नहीं होते वैसे ही ये जागीरदार थे। इसलिए पहाड़ जैसे उपकारों को भूलकर
यहाँ के अनेक जागीरदार अपनी बुद्धि को शत्रु की सेज पर सुलाकर पूरी तरह रिक्त
हो गये थे।
जुलूस आगे बढ़ रहा था। रायप्पा सम्भाजी की घायल और वेदनामय अवस्था
को बार बार देख रहा था। उसे एक घटना का स्मरण हुआ। जब सम्भाजी केवल
बीस वर्ष के थे तो सांदोशी के जंगल में एक बाघ उत्पात मचा रहा था। दूसरी ओर
दृष्टि केन्द्रित किये सम्भाजी इस बाघ के शिकार के लिए बैठे थे। उस समय पीछे
की ओर से बाघ ने सम्भाजी पर छलाँग लगा दी थी। उसी क्षण रायप्पा ने अपने तेज
कोयते से चौड़ी पीठ वाले बाघ के टुकड़े टुकड़े कर दिये थे। अब मुगल बैतालों के
घेरे में वह अपने राजा की नौका डूबते देख रहा था। यह उसकी आँखों से सहा नहीं
जा रहा था।
जुलूस किसी तरह बहादुरगढ़ के नगर द्वार तक पहुँचा। सामने का
महादरवाजा खुला। राजा के लिए कुछ करने का यही अवसर था। रायप्पा का
निष्ठावान खून खौल उठा, कान गर्म हो गये, नसें जलने लगीं। सोचने समझने में
कुछ समय लगे इसके पहले ही उसने बन्दोबस्त में लगे एक राजपूत की तेज धार
वाली तलवार खींच ली। लोग कुछ समझ पाएँ इससे पहले ही उसने बगल के
अधिकारियों को सपासप छाँट दिया।
'महाराजऽऽ शम्भू महाराजऽऽ' ऐसा उद्घोष करता हुआ वह आगे बढ़ा।
अपनी तलवार से राजा के शरीर पर बँधी जंजीर को काटने का व्यर्थ प्रयास करने
लगा। इतने में 'सम्भा का आदमी.. दुश्मन...' ऐसा शोर मुगलों ने किया। ऊँट से
अकेले जूझने वाले रायप्पा की ओर एक साथ असंख्य तलवारें खिंच गयीं। रायप्पा
के सिर, बाँहें, पीठ आदि सभी अंगों पर तलवारों के घाव हुए। खून के फव्वारे उड़े।
एक ही क्षण में रायप्पा के शरीर के तीस- चालीस टुकड़े हो गये। मगरूर मुगलों पर
इस घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रास्ते में पड़े रायप्पा के मांस के टुकड़ों को
कुचलते हुए जुलूस आगे निकल गया। घटना का ज्ञान सम्भाजी को हो गया था।
रायप्पा के गर्म खून की धार सम्भाजी के पैरों पर पड़ी थी। शिवाजी, सम्भाजी और
हिन्दवी स्वराज्य को बनाने वाले सच्चे और निष्ठावान श्रमिकों के खून से किया गया
यह आखिरी अभिनन्दन था। उन ईमानदार गरीबों के परिश्रम और साहस का स्मरण
सम्भाजी को हुआ। उनका हृदय कृतज्ञता से भर आया।
सम्भाजी :: 707
भीमातट की करुण कथा
एक
शीर्ष भाग पर चाँद तारों की मीनार से सुशोभित सज धज शानदार दिखने वाले
महल के सामने से जुलूस आगे निकल रहा था। उस महल के भीतर तीन प्राणियों
को कैद किया गया था। ढोल, तासों और तुरुहियों की आवाज इन तीनों बन्दियों के
कानों में पड़ रही थी। तीनों व्याकुल हो गये। यदि उनके धक्के से सामने की दीवार
टूट सकती तो उन्होंने यह प्रयास भी किया होता। उन्हें सूचना मिल गयी थी कि
सम्भाजी को कैद कर लिया गया। उनकी मुश्कें बाँधकर उन्हें बहादुरगढ़ लाया जा
रहा है। उस दुखद समाचार से तीनों निरन्तर विलाप कर रही थीं।
बादशाह के हुक्म के अनुसार इखलासखान और हमीदुद्दीनखान सम्भाजी
राजा और कविराज को दीवाने खास की ओर जुलूम के साथ ले जा रहे थे।
बादशाह के दरबार में मक्का मदीना जैसे उत्सव का वातावरण बन गया था। दरबार
में सभी अमीर उमराव, शहजादे, पोते, रिश्तेदार आदि उपस्थित थे।
इसी समय मुकर्रबखान, इखलासखान और बहादुरखान बादशाह के सामने
प्रस्तुत हुए। उन्होंने झुककर बादशाह को सलाम किया। बादशाह ने पिता पुत्र को
अनेक मूल्यवान उपहार देकर मालामाल कर दिया। वे दोनों झुके झुके ही बगल में
सरक गये। बादशाह ने सामने की ओर नजर उठाई। जंजीरों से पूरी तरह जकड़े हुए
सम्भाजी राजा और कवि कलश खड़े थे।
इस दृश्य को देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हो गया। उसकी भावभरी प्रसन्न
अवस्था को देखकर दरबार में उपस्थित अनेक लोगों की आँखों में आँसू उमड़ पड़े।
बादशाह से रहा नहीं गया। वह अत्यधिक भाव विभोर हो अपने रत्नजड़ित
सिंहासन से उठकर खड़ा हो गया। कौड़ियों की माला सीने से चिपकाए सिंहासन
की सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया। पूरा दरबार उसकी ओर उत्सुकता से देखने लगा।
बादशाह ने जमीन पर अपना माथा टेका। अल्लाहताला का एक धुँधला बिम्ब उसकी
708 . सम्भाजी
आँखों के सामने आया। बादशाह की नाक जो स्वभावतः कुछ लाल थी अब और
भी लाल दिखाई देने लगी। उसके पतले होंठ काँपने लगे। सुनहली दाढ़ी के बाल
थरथराने लगे। आनन्दातिरेक से वह कुछ उन्मत्त-सा हो उठा था।
अल्लाहताला से याचना करते हुए बादशाह को लोग पहली बार देख रहे थे।
भरे दरबार में बादशाह सिंहासन से पहली बार नीचे उतरा था। सोलह सत्रह साल
पहले शिवाजी महाराज ने रायगढ़ पर अपना राज्याभिषेक करवाया था। यह समाचार
जब बादशाह को दरबार में मिला तो उसका मन घृणा से भर गया था। शर्मसार
बादशाह तब भी तिलमिला कर सिंहासन से नीचे उतरा था। तब भी उसने जमीन पर
झुककर कहा था—या अल्लाह! कितना बुरा समय आ गया ? कास्तकारों और
किसानों के हँसिया लेकर जंगलों में घास काटने वाले बच्चे भी सिंहासनों पर बैठने
लगे ?
आज भी बादशाह गदगद होकर भरे दरबार में अल्लाह को पुकार रहा था।
वह कृतज्ञता के भाव से भर गया था। पूर दरबार भावनाओं से आन्दोलित हो गया।
जमीन पर झुके बादशाह को कवि कलश ने देखा। उनकी कल्पना जागृत हो उठी।
जंजीरों से बँधे कवि कलश की छाती गर्व से फूल गयी। वे अपनी सरस मर्दानी
आवाज में गा उठे—
यावन रावन की सभा शम्भु बँध्यो बजरग।
लहू लसत सिन्दूर सम बहु खेल्यो रण रंग।।
ज्यों रवि सारी लखत ही, खद्योत होत बदरंग।
त्यों तुव तेज निहारि के तख्त तज्यो अवरंग।।
इसके बाद बादशाह धीमी गति से एक-एक कदम रखते उन दोनों कैदियों के
सामने आकर खड़ा हो गया। वे दोनों औरंगजेब की आँखों में आँखें डालकर
दहकती नजरों से उसे देख रहे थे। शरीर को जकड़कर बाँधने वाली जंजीरों की उन्हें
कोई चिन्ता नहीं थी। उन्हें देखकर इखलासखान चिल्लाया, "सम्भाऽऽ! पागलऽ
तुझे जिन्दगी प्यारी है या नहीं? बादशाह को तमीज से देखो। "
किन्तु वे दोनों औरंगजेब को उसी तरह देखते हुए खड़े रहे। बादशाह फिर से
सिंहासन की ओर मुड़ा तब फौलादखान हंटर की तरह सम्भाजी राजा पर टूट पड़ा,
"पागलो! बादशाह को सलाम करो। अपनी जिन्दगी बचा लो।"
परन्तु वे दोनों अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ताने दरबार की ओर देखते रहे।
बादशाह के सरदार और सेवक हाथ से उनकी ओर संकेत कर रहे थे। बेचैन होकर
फौलादखान कवि कलश की ओर गया। उनकी भुजा को नोंचते हुए चिल्लाया,
सम्भाजी :: 709
"पागलऽ अपने बाप को सलाम कर।"
खान के शब्द कविराज के सीने में घाव कर गये। कविराज ने क्रोधावेश में
आकर खान की कमर पर जोर से लात मारी। फौलादखान मुँह के बल जमीन पर
गिर पड़ा। गिरने की आवाज सुनकर बादशाह ने पीछे मुड़कर देखा तो फौलादखान
अपना अँगरखा झाड़ते हुए खड़ा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।
औरंगजेब ने जुल्फिकारखान को अपने पास बुलाया। सिंहासन के पास जाकर
जुल्फिकार नीचे घुटनों के बल बैठ गया। बादशाह ने उसके कान में कुछ महत्त्वपूर्ण
बात कही। जुल्फिकार ने विनम्र आज्ञाकारी की भाँति सिर हिलाया। जुल्फिकार बड़ी
तेजी से कदम बढ़ाते हुए दरबार से बाहर निकल गया।
उन दोनों राजबन्दियों को बन्दीखाने में भेज दिया गया। बहादुरगढ़ पर उत्सव
का वातावरण था। शर्बत के बड़े-बड़े बर्तन खाली हो रहे थे। हिन्दुओं की दीवाली
की तरह रोशनी की जा रही थी। बादशाह की बहुत बड़ी विपत्ति टल गयी थी। अब
लोग दिल्ली की ओर लौट सकेंगे, इस कल्पना से ही सभी प्रसन्न हो गये थे।
इस खुशी के भीतर एक डरावना सन्नाटा भी छा गया था। मुगल और
दक्खिनी सिपाही, एक-दूसरे के कान में कुछ खुसुर फुसुर कर रहे थे।
"शायद जहन्नमी सम्भा के लिए यह रात आखिरी रात साबित होगी।"
"बिलकुल, क्यों नहीं? दारा जैसे अपने सगे भाई का सिर दो तीन दिनों में
ही छाँट दिया था।"
"ठीक कहते हो मियाँ! उस गोकल की याद है न? वह किसानों का
विद्रोही नेता। उसे पकड़कर, बोटी-बोटी काटकर बाहर फेंक दिया गया था। मथुरा
के मन्दिर भी जलाकर खाक कर दिये गये थे।"
"सच है भाईजान। एक बार अल्लाह ताला इन काफिरों को माफ कर सकता
है किन्तु बादशाह औरंगजेब कभी नहीं।"
दो
सखुबाई का मन्दिर बहादुरगढ़ के थानेदार को बहुत प्रिय था। बहुत-सी देवी-
देवताओं की मूर्तियाँ और धातुओं पर खुदी हुई तस्वीरें रखी थीं। छत से नीचे तक
लटकने वाली सोने-चाँदी की घंटियाँ, विशेष रूप से कमर तक ऊँची म्हालजाई
710 :: सम्भाजी
देवी की मूर्ति वहाँ विद्यमान थीं। महादजी रात को कुछ देर से घर लौटे। उन्होंने
मन्दिर के सामने, संगमरमर के नंगे फर्श पर अपनी पत्नी को निढाल होकर पड़े
देखा। शरीर पर एक भी आभूषण नहीं, शोक की व्याकुलता में बाल बिखरे हुए थे।
महादजी के बाहर आने की आहट पाते ही वे घायल सिंहिनी की तरह झट से
उठीं। उनकी आँखें क्रोध से अंगार की तरह जल रही थीं। वे गरज पड़ीं,
"आइएऽऽ आइएऽऽ आ गये? बहुत बड़ी बहादुरी करके लौटे हैं? आइए मैं अपने
बहादुर स्वामी की आरती उतारती हूँ।" महादजी क्रोध और सन्ताप से व्यग्र हुई
अपनी पत्नी को मनाने की कोशिश करने लगे। सखुबाई क्रोधावेश में प्रश्नोत्तर करने
लगीं।
"हमारे छोटे भाई सम्भाजी राजा का ऐसा घोर अपमान हो रहा था। नासमझ
छोटे बच्चे भी उन पर गोबर के गोले फेंक रहे थे। यह सब देखकर आपका खून
उबला कैसे नहीं?"
"परन्तु सखु. . ?"
"वह शिवाजी जैसे प्रतापी का पुत्र था। वह जीजामाता जैसी युगस्त्री का पोता
था। इस मिट्टी का अंश था। उसको पीड़ित करने वाले शत्रु का प्रत्युत्तर क्यों नहीं
दिया आपने?"
"सखु उस बादशाह परमेश्वर को कौन प्रत्युत्तर देगा।"
सखुबाई का गला भर आया वे रोते हुए बोलीं, "सम्भाजी राजा का जहाज
डूब रहा है। उसे छोड़कर सब लोग औरंगजेब से आकर मिलें। इस प्रकार का पत्र
आपने सभी जागीरदारों को लिखा था। उस समय क्या मैंने आपसे एक भी शब्द
पृछा था?"
सखुबाई के एक भी प्रश्न का उत्तर महादजी के पास नहीं था। सखुबाई बिना
रुके गरज रही थीं, "अजी, आप एक बार इस बात की उपेक्षा भी कर दें कि वह
शिवाजी का बेटा है परन्तु यह कैसे भूल सकते हैं कि उसकी धमनियों में बहने
वाला रक्त निंबालकर की बेटी का है। वह निंबालकर का नाती है। मैं पृछती हूँ कि
यह आपको क्यों नहीं याद रहा? खून की पुकार पर खून मदद को क्यों नहीं
दौड़ा?"
सखुबाई के प्रश्नों की बौछार के सामने महादजी हतप्रभ हो गये। वे वहीं
मन्दिर में ही बैठ गये। दुख, पीड़ा और पश्चाताप के स्वर में महादजी कहने लगे,
"सखु तुम्हारे सीधे प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे कोई संकोच नहीं है इस भूमि के
अनेक जमींदारों और जागीरदारों ने अरबों-खरबों कमाये। किन्तु इस भूमि पर कोई
छत्रपति बन सकता है, राजा बन सकता है इसका उदाहरण तुम्हारे पिता शिवाजी
सम्भाजी :: 711
महाराज ने ही प्रस्तुत किया। तुम्हारे पिता और तुम्हारे भाई-शिवाजी और सम्भाजी
समय को अतिक्रान्त करके हजारों योजन आगे जाने वाले महापुरुष ही थे। हम जैसे
जमींदारों और जागीरदारों तथा शिवाजी सम्भाजी के बीच यही अन्तर है। आज जो
घटना घटी है, जो हादसा हुआ है उससे हम बहुत शर्मिन्दा हैं।
तीन
बहुत देर रात में जुल्फिकारखान सैनिक की वर्दी पहने बादशाह के सामने उपस्थित
हुआ। वह कहने लगा, "जहाँपनाह ! शाम के समय से ही मेरी फौजी टुकड़ियाँ
बहादुरगढ़ से बाहर जाने लगी हैं। हुक्म की तामील हो गयी है।"
"कुल मिलाकर कितनी फौज होगी?
"मैं अपने साथ यहाँ से बीस हजार ले जाता हूँ। इसके अतिरिक्त पूना और
चाकण में तैयार हैं। वहाँ से बीस हजार लेता हूँ और सीधे जाकर रायगढ़ को टक्कर
देता हूँ।"
"शाब्बास!" जीत का आनन्द औरंगजेब के चेहरे पर छुप नहीं पा रहा था।
वह प्रसन्नता से बोला, "बेटे जुल्फी अब तो वैसे करना भी क्या है? सम्भा की
गिरफ्तारी सुनकर मरगट्ठे अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भाग गये होंगे।
तुम्हें बस इतना ही करना है-"
"हुक्म, जहाँपनाह!"
"आजतक हमें भूत की तरह चिढ़ाने वाली सह्याद्रि की पहाड़ी पर थूकना
होगा और वहाँ के एक एक प्रदेश को जीतने की शुरुआत करनी होगी।"
जुलूस के बाद दूसरे दिन नाश्ते का समय बीत गया फिर भी सूर्य बादलों के
पर्दे से बाहर निकलने को तैयार न था। वजीर असदखान, औरंगजेब के सभी
शहजादे, सभी जनानियाँ आदि सभी की एक ही चिन्ता थी कि आगे क्या होगा?
बादशाह सम्भाजी के बारे में क्या निर्णय लेगा, इसका अनुमान वजीरे आज़म
असदखान भी नहीं लगा सकता था। उस दिन जब असदखान सजधजकर अपने डेरे
से बाहर निकलने लगा तो उसकी एक बेगम ने पूछा, "अजी, उस काफिर के बच्चे
का क्या होगा?"
"जो कुछ भी होगा, आज ही होगा।" असदखान ने उत्तर दिया, "घात-
अपघात कुछ भी हो जाये किन्तु जब तक अपना दुश्मन समाप्त नहीं हो जाता तब
712 :: सम्भाजी
तक चुप बैठना अपने आलमगीर के स्वभाव में नहीं है।"
अचानक असदखान अतीत की स्मृतियों में खो गया। उसने कहा, "बेगम,
दारा शिकोह पकड़ा गया था, तब हमारे शाहजहाँ साहब बीमार होकर बिस्तर में पड़े
थे। किन्तु बूढ़े बीमार बाप पर क्या गुजरेगी? इसकी चिन्ता जहाँपनाह ने बिलकुल
नहीं की थी। सिर्फ दो तीन दिनों में ही उन्होंने निश्चिन्त भाव से अपने सगे भाई
का सिर छाँट दिया था। इतना ही नहीं दारा के सिर को मिठाई के डिब्बे में ढककर
शाहजहाँ साहब के पास भेज दिया था। जो अपनों का ऐसा हाल कर सकता है
उसके लिए सम्भा जैसे दुश्मन की क्या बात है? सम्भा किसी भी हालत में कल का
सूर्य नहीं देखेगा।"
बोलते बोलते एक भयंकर कल्पना से बूढ़ा असदखान पसीना पसीना हो
गया। अपना माथा पोंछते हुए बोला, "खुदा करे कि उस सम्भा की गर्दन पर वार
करने की जिम्मेदारी मुझ पर वजीर के नाते न आये।"
दोपहर को धूप निकली किन्तु बहादुरगढ़ के आसपास बादलों की छाया दूर
नहीं हुई थी। हवा एकदम धीमी और घुटनभरी थी। मनुष्य और पशु आने वाली रात
की प्रतीक्षा कर रहे थे।
अन्ततः छावनी के ऊपर अँधेरा फैल गया। जगह जगह मशालें जला दी
गयीं। चिरागों के प्रकाश में महल जगमगा उठे। भीमा नदी की ओर से ठंडी ठंडी
चुभने वाली हवा बहने लगी। छावनी में जगह जगह कुत्ते करुण स्वर में विलाप
कर रहे थे। दमड़ी मस्जिद का वह फकीर उदास होकर पागलों की तरह हँस रहा
था। सरस्वती की छोटी धारा के उस पार खंडोवा का बंजर मैदान जाग रहा था। वहाँ
के भूत, बैताल और चुड़ैलें बरगद और पीपल की ऊँची डालों पर चढ़कर, लटकते
हुए औरंगजेब की छावनी की ओर सहमी नजरों से देख रहे थे। भूत इत्यादि भी यह
जानने के लिए उत्सुक थे कि बादशाह की गद्दी तक पहुँचा, इनसान के रूप में यह
बैताल अब क्या कदम उठाएगा?
अचानक असदखान के महल के पास किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
वह सावधान हो गया। इतने में उसके ही कुछ सैनिक दौड़ते हुए अन्दर आये।
उन्होंने बताया, "बादशाह ने सम्भा के बन्दीखाने की ओर रूहूल्लाखान को भेजा
है।"
अपने ऊपर की विपत्ति टल गयी, यह सोचकर असदखान ने बड़ी कृतज्ञता से
अल्लाह का नाम लिया। अब बहादुरगढ़ की पूरी छावनी का ध्यान रूहूल्लाखान की
आगे की कार्यवाही की ओर लगा था।
सम्भाजी :: 713
चार
"सम्भाजी और कलश राजबन्दी नहीं लुटेरे हैं।" बादशाह ने स्पष्ट शब्दों में अपनी
यह राय अनेक बार अपने कर्मचारियों और सहयोगियों के सामने दी थी। इसीलिए
इन बन्दियों को बहादुरगढ़ के शाही कैदखाने में उन्हें नहीं भेजा गया था। एक
किनारे पर खुले मैदान में बाँस और लकड़ी के मजबूत खम्भों से एक मजबूत
कैदखाना एकदम नये रूप में बनाया गया था। उसे चारों ओर से लम्बी घास की
छाजन से घेरा गया था। उस कैदखाने के चारों ओर पाँच हजार हैवानों की फौज नंगी
तलवारें लिये तैनात थी। अन्दर बैठने के लिए कोई फटी पुरानी दरी भी नहीं थी।
जिस प्रकार काबू में न आने वाले जंगली भैंसों या पागल हाथियों को बन्द कर दिया
जाता है उसी तरह सम्भाजी और कवि कलश को अन्दर फेंक दिया गया था। उनके
बिछाने के लिए थोड़ा बहुत धान का पुआल और नंगी मिट्टी ही थी।
उन दोनों को कल ऊँट पर इस तरह आड़ा टेढ़ा दौड़ाया गया था कि इस
अमानवीय यातना से उनके शरीर पत्थर हो गये थे। उनके शरीर का खून और उनकी
चर्बी गीली मिट्टी के गोले की तरह हो गयी थी। उनके हाथ पीठ की ओर जंजीरों
द्वारा मजबूती से बँधे थे। पाँवों में जानवरों की तरह बेड़ियाँ डाली गयी थीं। कल
ऊँट की नंगी पीठ पर बैठने से उनके पुट्ठों और उनकी जाँघों की चमड़ी रगड़कर
छिल गयी थी। किन्तु यह आघात और दुर्भाग्य का जहरीला घाव इतना अकल्पनीय
और क्रूर था कि उसके सामने चमड़ी का छिल जाना कुछ भी नहीं था।
उन दोनों की लाल आँखें प्रकाश में भयानक, दिल दहला देने वाली और
चमकीली दिख रही थीं। उन कैदियों की दयनीय अवस्था देखकर कलेजा फटता
था। रूहूल्लाखान का दिल भी दहल गया। वह अनजाने ही बोल पड़ा, "सम्भा
बेटा ये तेरी कैसी हालत है? कहाँ गये तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवी देवता? कहाँ भाग
गये आग के समुद्र में छलाँग लगाने वाले शिवाजी के मर्द मावले ?"
सम्भाजी राजा और कविराज दोनों ही चुप थे। वे चेतनाशून्य दिखाई पड़ रहे
थे। उनकी आँखें झाड़ियों में फँसे बाघ के बच्चों की तरह लाल लाल दिख रही
थीं। वे दोनों रूहूल्लाखान की ओर आक्रोशभरी नजरों से देख रहे थे।
रूहूल्लाखान ने आते ही बादशाह का अतिमहत्त्वपूर्ण सन्देश पहुँचा दिया।
"सम्भा, बादशाह को तुमसे दो और सिर्फ दो ही चीजें चाहिए। साफ साफ बता दे
कि कहाँ रखे हैं तेरे जर जवाहरात और कहाँ हैं तुम्हारी रत्नशाला?"
714 · सम्भाजी
सम्भाजी के होंठ हिले नहीं। इसके विपरीत सम्भाजी राजा और कविराज
खान की ओर व्यंगभरी नजरों से देखने लगे। खान को यकीन था कि पहला प्रश्न
निरुत्तर रहेगा। इसलिए उसने तरकस से और तेज धार वाला तीर निकाल निशाना
लगाने की तरह दूसरा प्रश्न किया, "तुम्हारे करोड़ों मुहरों के खजाने को जानकर
बादशाह तुम पर फिदा हो जाएगा।"
सम्भाजी राजा चुप थे किन्तु रूहूल्लाखान पीछे हटने को तैयार न था। उसने
हठ करते हुए पूछा, "बोल, कौन, कौन हैं वे लोग?"
"कैसे लोग?" कविराज ने मुँह खोला।
"वही मूर्ख लोग! जो पिछले अनेक सालों से खाते हैं बादशाह का नाम और
तुम मराठों के साथ गुप्त सम्बन्ध रखते हैं। बताओ कौन हैं वे बदमाश?"
उन दो प्रश्नों के लिए खान ने बौछार लगा दी थी। जैसे भी हो दूसरे प्रश्न का
उत्तर तो सम्भाजी को देना ही चाहिए। उत्तर न मिलने से वह बहुत बौखला रहा था।
बड़ी दया दिखाकर राजा और कविराज को समझा बुझा रहा था, "सम्भा अभी बहुत
जिन्दगी बाकी है। तुम्हारी अभी उम्र ही कितनी है? सिर्फ बत्तीस साल। हमारे
बादशाह औरंगजेब की मर्जी से चलोगे तो अभी भी अपनी जिन्दगी बचा सकते हो।
मेरी बात सुनो मूर्खों।" काल की चालाक अदृश्य कलाओं ने दोनों के होंठ सिल
दिए थे। वे दोनों किसी भी बात का सुराग नहीं लगने दे रहे थे। रूहूल्लाखान
परेशान हो गया। वह चिढ़कर जोर से चिल्लाया, "अरे शैतानों याद रखो—
बादशाह सलामत ने अपनी जिन्दगी में किसी भी शत्रु पर इतना रहम नहीं दिखाया
है। कस्मे वादे तोड़कर, अपने खून के रिश्ते वालों को भी जहन्नुम में भेजने के
लिए वे ज्यादा मशहूर हैं। अच्छी तरह से कबूल करो, बोलो तुम्हारा खजाना कहाँ
है? तुम्हारे साथ हमारे कौन कौन से गद्दार सरदार हैं?"
"ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकता है तेरा वह नीच बादशाह?" कविराज ने
जोर से पूछा।
"पागल मत बनो! इस कैदखाने में भूखे कुत्ते छोड़े जाते हैं वे तुम्हारी चर्बी
को काट काटकर खाएँगे।"
"मतलब कि बादशाह अन्त में अपनी मदद के लिए अपने भाइयों को बुलाने
वाला है।" कलश की इस बात पर सम्भाजी को उस अवस्था में भी हँसी छूट गयी।
किन्तु आवश्यकता मनुष्य को अधम बना देती है। इसी वजह से रूहूल्लाखान
ये गालियाँ, ये व्यंग सहन कर रहा था। कलश ने उसे अपने पास बुलाया। ऐसा
संकेत दिया कि कुछ भेद की बात करनी है। जब रूहूल्लाखान पास आ गया तो
कलश ने उसके मुँह पर थूक दिया। इस घोर अपमान से खान बहुत चिढ़ गया।
सम्भाजी 715
उसने अपनी कमर पर हाथ रखा। वहाँ से तेज धार वाली कटार निकालकर कविराज
की ओर झपटा। किन्तु उसी क्षण उसे बादशाह की याद आ गयी। उसे लगा कि
बादशाह सोच सकता है कि इतने महत्त्वपूर्ण राजबन्दी को मैंने अपनी किसी स्वार्थ
बुद्धि अथवा किसी दुष्टता से मार डाला। ऐसे शक्की और चालाक मालिक का क्या
भरोसा ? उसने अपने पर काबू पा लिया। कटार उसके हाथ से नीचे गिर गयी।
धमकियों का डर दिखाने का इन राजबन्दियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा
था। उसे जो चाहिए था वह भी सम्भव नहीं हो पा रहा था। इसलिए खान बहुत
उतावला हो गया था। वह मिन्नत करते हुए बोला, "सम्भा बेटा, तेरी उम्र के मेरे दो
बच्चे हैं। उनकी कसम खाकर कहता हूँ। सोने सी जिन्दगी का सर्वनाश क्यों कर
रहे हो? फिजूल की इतनी जिद दिखाते हो?
"खान साहबऽ तुम्हारे बादशाह पर मुझे बड़ी दया आती है।" सम्भाजी
महाराज के मुँह से शब्द बाहर निकले।
"क्यूँ?"
"कोई पराजित राजा बन्दी बनाया जाता है, तो राजनीति में उसके साथ
व्यवहार करने का कुछ ढंग होता है। किन्तु उस व्यवहार का कोई अंश भी तुम्हारे
बादशाह में दिखाई नहीं देता। किसी गन्दे कुत्ते को हीरे मोती का हार पहनाकर, उसे
मखमली वस्त्र पहनाकर सिंहासन पर बिठाया जाये तो भी वह रहेगा अपने गन्दे पैरों
के साथ ही।"
"तौबाऽऽ तौबाऽऽ—सम्भा कैसी बातें करते हो? आलमपनाह की बराबरी
एक कुत्ते के साथ?"
'हाँ, कुत्ते की भी एक श्रेणी रहती है। तेरे बेवकूफ बादशाह से वह गरीब
जानवर कितना नेक और वफादार होता है?"
रूहूल्लाखान के पसीने छूट गये। वह पैर पटकते हुए कैदखाने से बाहर
निकल गया। वह सोचने लगा, 'सम्भा ने आलमगीर को तोहफे में जो गिन गिनकर
उपाधियाँ दी हैं उसे बादशाह से कैसे बताएँ?'
रात बहुत हो चुकी थी। ठंडक भी बढ़ गयी थी। दोनों के शरीर के नीचे की
मिट्टी और भी कुछ अधिक ही ठंडी हो गयी थी। पहरा देने वाले पाँच हजार सैनिक
जाग रहे थे। हवा के तेज झोंके लकड़ी और घास से बने कैदखाने में घुसने की
कोशिश कर रहे थे। कैदखाने की छत को ठीक करने के बहाने एक हट्टा कट्टा पहरे
पर बैठा सूबेदार आगे आया। उसने जल्दी से घास के गट्ठर भीतर किये। कुछ बाँधने
के लिए घास के गट्ठर खोलने का अभिनय किया। उसके साथ काम करने वाले
उसके खास आदमी थे।
716 :: सम्भाजी
वह सूबेदार आगे बढ़ा। घास के गट्ठर जल्दी से खोलकर वहीं गीली जमीन
पर एक हल्का-सा बिछौना तैयार किया। दुखने वाले शून्य हुए शरीर वाले सम्भाजी
और कविराज को हाथ का सहारा देकर, धीरे से खींचकर बिछौने पर लिटा दिया।
अँधेरे में उसका चेहरा भी पहचान में नहीं आ रहा था। किन्तु उसके काँपते हाथ
बहुत दयालु और प्यारभरे थे। उस सूबेदार ने उन दोनों को वहाँ पर ठीक से सुला
दिया। यह स्थिति देखकर उसका मन अचानक भर आया। वह वहीं पर नंगी जमीन
पर बैठ गया। सम्भाजी का पैर पकड़कर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसके गर्म
आँसुओं से सम्भाजी राजा की चेतना जाग गयी। सम्भाजी ने व्याकुलता से पूछा,
"कौन भाई मियाँखान?"
पाँच
"जहाँपनाह! आज भी यदि किसी ने 'रामशेज' ऐसा कहा तो ऊँट और घोड़े थरथर
काँपने लगते हैं। बेजुबान जानवरों का यह हाल है तो फौजियों का क्या होगा?"
असदखान ने कहा।
"वजीरे आजम! आपने हार मान ली क्या?" बादशाह की कत्थई आँखें उग्र
हो गयीं।
मुझे बस इतना ही कहना है, मेरे आका। रामशेज जैसे मराठों के साढ़े तीन सौ
किले हैं, उनको जीतने के लिए बची हुई जिन्दगी को व्यर्थ में गँवाने के बदले सम्भा
के साथ मीठी बातें करके पहले उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए,
हजरतऽऽ।"
औरंगजेब ने प्रश्नाकुल नजरों से रूहूल्लाखान की ओर देखा। तब खान
बोला, "मेरे आका, सम्भा और कवि कलश जन्मजात बदमाश हैं। वे शाहंशाह को
गाली देते हैं।" बादशाह अपने सहयोगियों की बातें शान्तिपूर्वक सुन रहा था। वह
अपना मत प्रकट नहीं कर रहा था। वह सोच रहा था, 'सम्भा को तत्काल समाप्त न
करके उसके साथ मीठी मीठी बातें करके, आवश्यक होने पर थोड़ी दहशत देकर
उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए।' यही राय अनेक सरदारों की भी थी।
दक्खिन में आठ-नौ वर्षों की संघर्षशील जिन्दगी बहुत हो गयी। अब कोई युद्ध
नहीं चाहिए। अब तुरन्त उत्तर की ओर लौट जाएँ। इन्हीं विचारों में सभी बेताब हो
रहे थे।
आजकल बादशाह की मानसिक अवस्था बहुत अच्छी थी। वह अपने परिवार
सम्भाजी · 717