छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
इस नितान्त व्यक्तिगत बैठक में बातें चलने लगीं। शम्भुराजा ने ही विषय
छेड़ा—"शास्त्री जी! राज्याभिषेक के समारोह में समर्थ स्वामी यदि स्वयं पधारे
होते तो हमें बहुत आनन्द आता।"
"नहीं राजन! स्वामी जी के मन में ऐसा कुछ नहीं है। आजकल उनका
स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इसीलिए उन्होंने समारोह में दिवाकर गोसावी को भेजा
था।"
"सन्तपीठ और सत्तापीठ का रिश्ता ही कुछ विचित्र होता है, शास्त्री जी!"
"निःसन्देह, शम्भुराजा! बड़े महाराज से स्वामी जी का बड़ा स्नेह था ही
साथ ही प्रहलाद निराजी, निलो सोनदेव, रामचन्द्र नीलकंठ और विशेष रूप से
बालाजी भावजी चिटणीस आदि सभी का, स्वामी का बड़ा शिष्य वर्ग था।"
दिवाकर भट ने बोलते-बोलते बालाजी आवजी चिटणीस के नाम पर बल
दिया। इससे शम्भुराजा का दम फूलने लगा। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में कहा, "हमें
पता है। आजकल समर्थ स्वामी हम पर बहुत नाराज हैं।"
"ठीक है महाराज! अपने किसी गुणी ज्ञानी सहायक को हाथी के पैर के
नीचे कुचलवा देना और किसी परदेशी पाखंडी को सिर पर बिठा लेना किसी राजा
को शोभा देता है क्या?"
दिवाकर भट ने आरम्भ में ही अपने मन की भड़ास निकाल दी। महारानी
येसूबाई शम्भुराजा की ओर भयभीत दृष्टि से देखने लगीं। दिवाकर भट ने इधर-
उधर देखते हुए इसी स्वर में प्रश्न किया—"कहाँ है वह कलश? दिखाई नहीं दे
रहा है। सुना है वह भोंदू हर घड़ी, हर क्षण यहीं बैठा रहता है।"
सम्भाजी राजा विचित्र हँसी हँसते हुए बोले, "कवि कलश कल ही
सागरगढ़ और कोथलागढ़ के लिए गये हैं। मैंने उन्हें अष्टागार और कल्याण की
बगल में रसद और बारूद की देखभाल करने और चौकियों के पहरों के निरीक्षण के
लिए भेजा है। कभी ऐन वक्त पर आवश्यक होने पर उन्हें तलवारबाजी के लिए भी
भेज देते हैं।"
"क्या कहते हो? उस पाखंडी को लड़ना भी आता है?"
"आता ही नहीं, वे विजयी भी होते हैं।"
"ऐसा!"
"वही तो कह रहा हूँ शास्त्री जी! अभी-अभी आपने जिन प्रधानों के हाथी
के पैर के नीचे कुचले जाने पर खेद व्यक्त किया, उनमें बालाजी आवजी और उनके
अभागे पुत्र को छोड़कर शेष सभी स्वराज्य द्रोही थे। शरीर में फैला हुआ साँप का
विष और राजद्रोह का समय पर उपचार नहीं किया गया तो क्या आदमी और क्या
राज्य, विनष्ट होने में अधिक विलम्ब नहीं होता।"
340 :: सम्भाजी
शम्भूराजा के इस प्रतिपादन से दिवाकर भट कुछ लज्जित हुए। उन्हें लगा कि
शम्भूराजा के प्रशासन से सम्बन्धित जो शिकायतें सज्जनगढ़ तक आयीं थीं, वे
सबकी सब सही नहीं थीं ! विषय को अधिक न बढ़ाते हुए शास्त्री जी ने एक रेशमी
फीते से बँधी थैली शम्भूराजा के सामने रखी। उन्होंने कहा, “स्वामी जी ने अपने
हाथ से लिखकर यह सन्देश आपके पास भेजा है। इसे आराम से पढ़ें।”
उस दोपहर को शम्भूराजा बैठक से बाहर नहीं निकले। उन्होंने सारे
महत्त्वपूर्ण कार्य आगे के लिए टाल दिया। येसूबाई और शम्भूराजा स्वामी जी के पत्र
को एक साथ पढ़ रहे थे। कभी एक साथ पढ़ते, कभी पढ़कर एक-दूसरे को सुनाते,
कभी उत्सुकतावश एक-दूसरे के हाथ से खींचते। उस काव्यमय पत्र ने दोनों का मन
मोह लिया था। पत्र आठ-दम बार पढ़ा गया। इसके बाद शम्भूराजा की आँखें पत्र
की अन्तिम पंक्ति पर टिक गयीं—
स्मरण करो शिवराय को तृण सम जीवन जान
तरे लोक परलोक को चढ़े कीर्ति के यान
याद करो शिव रूप को उनके प्रबल विरोध
वह प्रताप जग व्याप्त जो तज सारे अवरोध
चलना, हँसना, बोलना और जगत व्यवहार
सीखो सब शिवराय से मन के परम उदार
सभी सुखों को त्याग कर साधा अविचल योग
राज्य सदा रक्षित रहे, कितने किये प्रयोग
किसी पवित्र ग्रन्थ की भाँति ही शम्भूराजा ने उस पत्र को हृदय से लगाया,
ईश्वर का स्मरण किया। उन्होंने अभिभूत होकर कहा—“युवराज्ञी सीधे सादे शब्दों
का अर्थ हम आप आसानी से समझ लेते हैं पर महापुरुषों और सन्तों के शब्दों से
अमृत की वर्षा होने लगती है। स्वामी रामदास ने इन शब्दों द्वारा पिताजी के विराट
व्यक्तित्व का दर्शन कराया है।”
“सत्य है स्वामी।” महारानी ने कहा।
“येसू श्रीमान योगी, ज्ञानी राजा जैसी अमर विरुदावली इस महायोगी ने
केवल शिवाजी महाराज के लिए ही गढ़ी है। ये विरुदावलियाँ इतनी सटीक हैं कि
यदि अन्य व्यक्ति इन विरुदावलियों का धारण करे तो उपहास का पात्र हो
जाएगा।”
उन काव्य पंक्तियों में रायगढ़ नरेश और महारानी इतने विभोर हो गये कि
आधी रात कब बीत गयी उन्हें पता ही नहीं चला। एक बार पुनः दोनों ने उस पत्र
का वाचन आरम्भ किया। तब काव्य की अन्य पंक्तियाँ उन्हें आकर्षित करने लगीं—
सम्भाजी :: 341
सावधान नित ही रहो दुविधा करो न एक
बैठ मुक्त चिन्तन करो राखो अपनी टेक
छोड़ उग्रतावृत्ति को सौम्य बनो मन साध
औरों की चिन्ता करो क्षमा करो अपराध
कार्यभार नित सौंपकर राखो अपने साथ
सुखी आश्रित जन करो सबल बनेंगे हाथ
शम्भूराजा पढ़ते-पढ़ते रुके। येसूबाई ने पत्र अपने हाथ में ले लिया। वे धीर-
गम्भीर स्वर में आगे की पंक्तियाँ पढ़कर सुनाने लगीं-
अटका प्रवाह तो पानी रुक जाएगा
जन मन की गाँठ से अवरोध बन जाएगा
जन मन की प्रीति से प्रवाह चलता रहे
तो सारा कार्य भी निरन्तर बनता रहे
जन मन की गाँठ से उपेक्षा आपकी होगी
आपस में लड़ने से जीत शत्रु की होगी
समय की गति देख क्रोध को निवारिये
क्रोध आये तो भी निज अन्तर में राखिये
उन पंक्तियों का अनेक बार वाचन और मनन किया गया। सम्भाजी राजा और
महारानी उसी प्रकार बहुत समय तक बैठे रहे। एक अलग पंक्ति ने मस्तिष्क में
हलचल मचा दी थी।
बहुत समय के बाद येसूबाई ने कहा, "औंढ़ा के पठार पर घटित घटना का
समाचार अनेक बार सुनने में आया था। जिन लोगों की हत्या की गयी थी उनके
स्वजन सज्जनगढ़ जाकर स्वामी जी से मिले थे।
"वे सारी शिकायतें मैंने सुनी हैं। इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि
शिवाजी का पुत्र अपने पिता जैसा नहीं निकला। वह बददिमाग है, कान का कच्चा
है, विलासी और पागल है। राज्य डूबेगा, विनष्ट होगा। और कुछ?"
शम्भूराजा की मुद्रा अत्यन्त कठोर हो गयी थी। उसी समय येसूबाई ने धीरे से
कहा, "विशेष रूप से बाला जी आवजी स्वामी जी के बहुत समीपी और प्रिय
शिष्य थे। किन्तु राज्याभिषेक के पहले पन्हाला और रायगढ़ पर जिन लोगों ने खुले
आम विद्रोह किया और जिन्हें हमारे लोगों ने परास्त किया, उन सभी के स्वजनों ने
स्वामी जी के पास जाकर खूब शिकायतें की हैं।"
शम्भूराजा कुछ समय तक मौन भाव से बैठे रहे। तब फिर पत्र को अपनी
आँखों के सामने ले आने हुए येसूबाई ने कोमल स्वर में कहा-
342 :: सम्भाजी
"जो भी हो पर इतना तो सत्य है कि इस पत्र को भेजने में स्वामी जी का
उद्देश्य मांगलिक और पवित्र ही होगा? इन पंक्तियों को सुनें—
जन जन को एकत्र करो और सबमें भर दो ऐक्य विचार
टूट पड़ो यवनों पर मिलकर राष्ट्र प्रेम का हो विस्तार
जो है उसकी रक्षा कर लो जोड़ो और करो विस्तार
उन तरल, पवित्र और मरस पंक्तियों ने शम्भूराजा के मन को फिर से
उल्लसित कर दिया। मुख पर से विषाद की छाया मिट चुकी थी। उन्होंने भावुक
होकर कहा—"आपकी बात सच है रानी। औरंगजेब के साथ हमारा महासंग्राम
चल रहा है। स्वामी जी वहाँ अपने ध्यान, चिन्तन और परमेश्वर की सेवा में लगे हैं।
यहाँ के सारे समाचार उन्हें किस प्रकार पहुँच सकते हैं? जिन्हें युद्ध भूमि ही नहीं,
किसी भी प्रकार का कोई कार्य ही नहीं है वे ही समय-समय पर उल्टी-सीधी बातें
करते रहते हैं। महागनी, मुझे लगता है कि हमें भी अपने मन की बात पत्र द्वारा
स्वामी के पास भेजना चाहिए।"
"वाह! बहुत खूब!"
तब तक भोर बीत चली थी। एक खिड़की से कावले का पहाड़ और दूसरी
खिड़की से दूरी पर स्थिर जगदीश्वर के मन्दिर का कलश दिखाई दे रहा था।
शम्भूराजा ने उसी समय स्नान, पूजा, अर्चना आदि समाप्त किया। वस्तुतः शयनकक्ष
में बगल में पड़ी दुलाई की तरह नींद भी रातभर अलग ही धरी रह गयी थी। खंडो
बल्लाल को पहले ही सन्देशा भेजा जा चुका था। पूजा के कपड़ों में शम्भूराजा अपने
मन्त्रणा कक्ष में बैठ गये। माथे पर लगा अष्टगन्ध का तिलक अभी ताजा था। गले
की तुलसी माला पर हाथ फेरते हुए बल्लाल को एक-एक शब्द बोलने लगे—
"प्रति पुण्य श्लोक सन्त रामदास स्वामी गोसावी को क्षत्रिय कुलावतंस
शम्भूराजा छत्रपति की ओर से सादर अभिवादन।
मराठों को संगठित करने और महाराष्ट्र का विकास और विस्तार करने की
आपकी प्रबल इच्छा है। अपने हिन्दवी स्वराज्य और कैलासवासी मेरे पिताजी के
प्रति स्वामी जी को अत्यधिक स्नेह था। इसके लिए हम स्वामी जी के प्रति सदैव ही
ऋणी रहेंगे। जिन उदात्त शब्दों से स्वामी जी ने पिताजी को गौरवान्वित किया है
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सटीक शब्द, गहन भाव और हृदय का माधुर्य
शब्दों में इस प्रकार प्रवाहित होता है जैसे केवड़े के पुष्प से सुगन्ध प्रवाहित होती
है। स्वामी जी ने जिन गरिमामय शब्दों में बड़े महाराज गौरवान्वित है उसके आगे
तो कालिदास और भवभूति भी फीके लगते हैं।
अच्छा हुआ जो आपका पत्र समय पर मिल गया। उस समय हम बड़े समुद्री
सम्भाजी ३५३
युद्ध की तैयारी में पूरी तरह संलग्न हैं। शिवाजी महाराज के समय के कुछ वरिष्ठ
और अनुभवी अष्ट प्रधानों तथा अधिकारियों की हमारे हाथों हत्या हुई है। यह सच
है। किन्तु उनके परिजनों द्वारा हत्या के कारणों के जो आरोप मुझ पर लगाये गये हैं,
वे सभी बेबुनियाद हैं। हिरोजी काका अन्नाजी दतो जैसे अनुभवी पुरुषों की उँगली
पकड़कर हम बड़े हुए हैं। एक समय ये सभी स्वराज्य आधार स्तम्भ रहे हैं। हम
बचपन में जब महल में या दरबार में घूमते थे तो उन्हें अपने सगे चाचा के रूप में ही
देखते थे।
एक ओर हमारे पुण्य प्रतापी पिताजी स्वर्गवासी हो गये थे। दूसरी ओर पागल
हाथियों के झुंड की भाँति औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य पर आक्रमण कर रहा था। उस
समय हमें सहारा देने की जगह अपने-अपने स्वार्थों और अपनी छोटी-मोटी
आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये कर्मचारी और अधिकारी राजद्रोह पर उतर आये।
नौ-दस वर्ष के बच्चे को राजगद्दी पर बिठाने की इनकी मूर्खता मैंने देखी। फिर भी
मैंने इन्हें राजद्रोह की सजा नहीं दी। उन्हें निष्कासित करने का सरल रास्ता नहीं
अपनाया। उल्टे हमने उन्हें हँसते-हँसते प्रधान पदों की मालाएँ पहना दीं। उन्हें
पदभार का सुवर्ण कंगन पहना दिया। उन्हें जिस घोड़े से उतारा था, उसी पर फिर
बिठा दिया। राज्य शास्त्र के अनुसार राज्यद्रोह जैसे अक्षम्य अपराध के लिए हमने
उन्हें ऊँचे पहाड़ से कूदने के लिए विवश नहीं किया। किन्तु उन्होंने एक बार नहीं
बार-बार हमारी थाली में जहर घोला। उनके अपराध के आगे भी राजा को झुक
जाना चाहिए क्या ?
स्वामी जी, आप कभी भी रायगढ़ पर पधारें। स्वयं सभी प्रकार के कागजात
देखें। यदि किसी प्रकार दोष हो तो हमें बतायें। जीजामाता की तरह की युग निर्मात्री
स्त्री हमें आजी के रूप में मिलीं। उनके सामने पिताजी के आशीर्वाद से बहुत कम
उम्र में ही हमने रायगढ़ का कार्यभार चार वर्ष तक स्वतन्त्र रूप से संभाला। ब्राह्मण
होने के नाते कौन लिहाज करता और मराठा होने के नाते कौन चिन्ता करता है ? ऐसे
विवेकशील पिता की सन्तान होने का मुझे सौभाग्य मिला। रामायण महाभारत का
अध्ययन किया। कालिदास, भवभूति जैसे नाटककारों के नाटकों का पठन किया।
देव भाषा आत्मसात की और कोमल ब्रजभाषा के रस सागर में भी डुबकी लगायी।
केवल बालाजी पन्त भूल से मारे गये। उस दुख से मुझे इस जन्म में मुक्ति
मिलने वाली नहीं है। उस अपराध को तो हम स्वीकार करते ही हैं। किन्तु उनके
परिवार को महल में आश्रय देकर उन्हें अपने परिवारजन की तरह ही पाल-पोस रहे
हैं। अन्य राजद्रोहियों की बात अलग थी।
स्वामी जी, अब तो हिन्दवी स्वराज्य के सीने पर हमारा जन्म-जन्मान्तर का
शत्रु औरंगजेब आ बैठा है। उसके साथ पाँच लाख पैदल और चार लाख हाथी-
घोड़ों की सेना है, ग्यारह पीढ़ियों की तैमूरों की दौलत भी। फिर भी हम अपने छोटे
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से नवनिर्मित स्वराज्य बचाने के लिए दिन-रात यथासम्भव प्रयत्न कर रहे हैं। आज
औरंगजेब की मुगल सेना के प्रचंड प्रवाह को रोकना अपनी छोटी सेना के साथ
स्वराज्य की रक्षा करना और अवसर मिलते ही औरंगजेब को समाप्त करना ही
हमारा परम धर्म है। यदि इस कालसर्प को समय पर रोका नहीं गया तो इस प्रदेश के
गाँवों और गली-मुहल्लों में उसका विष फैलने लगेगा और हमारे पिताजी शिवाजी
महाराज के सपनों का महाराष्ट्र टिक नहीं पाएगा।
देश धर्म और मिट्टी के ईमान के लिए हम रात-दिन एक कर रहे हैं।
अकर्मण्य प्रमादी पुरुषों की भाँति कुटिल और विलासी खेल खेलने का समय
किसके पास है? औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर हमारी शरण में आये हैं। उनके
साथ मारवाड़ के दुर्गादास राठौर भी हैं। औरंगजेब के विरुद्ध स्वदेशियों को
पंक्तिबद्ध करने के लिए हम रात दिन विचार-विमर्श कर रहे हैं। हरसम्भव प्रयास
कर रहे हैं। अम्बर के राजा राम सिंह के साथ भी हमारा पत्राचार हो रहा है। इस
दिशा में सफलता मिलते ही सबसे पहले आपको सूचित करूँगा।
स्वामी जी, वस्तुतः पिछले आठ वर्षों से अपने शरीर में बारूद का भस्म लपेटे
हम रणचंडी की पूजा कर रहे हैं। आप अपने मठ के भीतर परमेश्वर के चिन्तन
मनन में व्यस्त हैं। बीच में बिलबिलाने वाले कीड़ों का क्या विश्वास करना। मुझे
पहाड़ जैसी समस्याओं और दुर्दान्त शत्रुओं का जरा भी भय नहीं लगता। किन्तु आप
जैसे महान साधक और पहुँचे हुए सन्त के कानों तक पहुँचने वाले कनखजूरों से मैं
बहुत भयभीत होता हूँ।
स्वामी जी, हमारे इस धर्मयुद्ध के लिए अपना आशीर्वाद दें। जिन
अधिकारियों और कर्मचारियों को दंडित होने से स्वामी जी को इतना दुख पहुँचा है,
उनके बारे में हम इतना ही कहेंगे कि हमारी हर साँस के साथ आज भी हमारा हृदय
तड़पता है, रोता है। उन सहकर्मियों की काली करतूतों के कारण विवश होकर
बार बार उनके द्वारा राजद्रोह किये जाने के कारण उन्हें हाथी के पैरों तले
कुचलवाना पड़ा। "
चार
ताड़वनों में कौवे चिल्ला रहे थे। नागोठण की खाड़ी के पास शम्भूराजा और कवि
कलश का डेरा पड़ा था। शम्भूराजा की प्रातःकाल से ही बहुत देर तक पूजा चलती
सम्भाजी :: 345
थी। उनके राजदरबार में आने से पूर्व कवि कलश नियमित रूप से दरबार में आते
थे। अपने नियम के अनुसार आज भी वे दरबार में पहले आ गये थे। खाड़ी के
निचले हिस्से में शहजादा अकबर का बड़ा तम्बू खड़ा किया गया था। शहजादे को
बहुत विलम्ब से जागने की आदत थी। इसलिए उसके नौकर भी देर से ही उठते
थे। किन्तु दुर्गादास नित्य की भाँति तम्बू के पास आकर बैठ गये थे। वह शहजादे से
बार-बार कहते—
"अरे अकबर! कम से कम युद्ध भूमि में जल्दी उठा करो। इन मराठों
को देखो, किस तरह घोड़ों पर चलते-चलते रोटी खाते हैं। हर समय युद्ध के लिए
तैयार रहते हैं।"
"क्या करूँ दुर्गादास ? मेरे शरीर में बादशाही खून है। ये मराठे बंजारों की
तरह भटकने वाले लोग हैं। ये किसी भी तरह जी सकते हैं किन्तु बादशाह को तो
अपनी शान के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए।"
"शहजादे! ये सम्भाजी राजा अपनी सुख सुविधा, अपनी व्यवस्था का
कितना ध्यान रखते हैं? उनसे तो सीखो!"
दुर्गादास जब भी ऐसा कुछ कहते अकबर हँसकर कहता, "दुर्गादास! आप
हिन्दू हो इसलिए इस शम्भूराजा—जमींदार के लड़के के लिए आपके मन में इतना
आदर है। लेकिन मैं भविष्य में शम्भूराजा या किसी का भी कोई अहसान अपने ऊपर
नहीं रखूँगा। कल जब मैं हिन्दुस्तान का बादशाह बनूँगा, इस बेचारे शम्भू को एक के
बदले दो सूबे इनाम में दूँगा।"
अकबर इस प्रकार व्यर्थ और फालतू बातें करता तो दुर्गादास अपना सिर पीट
लेते थे।
कवि कलश फौजी दरबार में बहुत देर से शम्भूराजा की प्रतीक्षा कर रहे थे।
शम्भूराजा ने महाड़ के दादाजी प्रभु देशपांडे को प्रातःकाल ही बुलाया था। इसी
समय मस्तक पर अष्टगन्ध तिलक धारण किये, तेईस वर्ष के गोरे चिट्टे, पौरुषेय
मुद्रा वाले शम्भूराजा फौजी दरबार में पहुँचे। पहरेदारों और दरबारियों ने तत्परता से
उनका अभिवादन किया। दरबार में बैठते सम्भाजी राजा की नजर दादजी देशपांडे
पर जा टिकी। उन्हें बिना कुछ बोलने का अवसर दिये, शम्भूराजा ने कहा,
"देशपांडे काका अपने स्वराज्य के अष्ट प्रधानों में एक सम्मानित स्थान मैंने आपके
लिए सुरक्षित रखने का निश्चय किया है।"
शम्भूराजा के इस उद्गार से देशपांडे उल्लसित हो गये। दादजी देशपांडे को
बड़ी लालसा थी कि अष्ट प्रधानों में उन्हें भी कोई सम्मानित स्थान मिले। दादजी ने
कृतज्ञता से शम्भूराजा को नमन किया। शम्भूराजा बोले, "प्रधानों के इस आसन तक
पहुँचने के लिए एक आश्वासन देना होगा।"
346 :: सम्भाजी
"कौन-सा आश्वासन महाराज ?"
"कोंकण का यह टेढ़ा-मेढ़ा समुद्र तट, यहाँ के बन्दरगाह, यहाँ की
खाड़ियाँ, यहाँ की ऊँची-ऊँची लहरें और लहरों को चीरते हुए जाने वाले यहाँ के
रास्ते आपके परिचित हैं। आपसे अधिक उन्हें और कोई नहीं जानता। इसलिए आप
बिना विलम्ब किये तैयार हो जाएँ। जंजीरे पर आक्रमण करके उस सिद्दी को
समाप्त करें। स्वराज्य की इस महान सेवा से स्वयं को पवित्र करें।"
दादजी देशपांडे उलझन में पड़ गये। वे कुछ काँपते हुए स्वर में बोले-
"महाराज पानी में तो क्या ? आप यदि आग में भी कूदने को कहेंगे तो हम रंचमात्र
भी नहीं हिचकेंगे। परन्तु इस अवसर पर एक और बात का ध्यान रखना आवश्यक
है। अन्यथा धोखा हो जायेगा।"
"कौन सी बात ?"
"महाराज ! उस जंजीरे की तटबन्दी शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी राजा के
सामने भी नहीं झुकी। उसे मुगल दूर से सलाम करते हैं। पुर्तगाली और अँग्रेज जैसे
फिरंगी भी उससे आतंकित हैं। ऐसे खतरनाक अभियान पर निकलना, इस तरह की
खतरनाक योजना बनाना शेर का शिकार करने जैसा है।"
"हाँ, मुझे वह सब पता है।" सम्भाजी ने हँसते हुए कहा।
"सूबेदार ! जंगल के अनेक प्राणी शरीर से बहुत बलशाली होते हैं। किन्तु
उनमे से कितनो की जान उनकी छोटी सी पूँछ में बसती है।" देशपांडे की आँखें
चमकीं। उन्होने बीच में ही शम्भुराजा से पूछा—"कौन है जंजीरे की पूँछ ?"
"उंदेरी का टापू। कुलाबा के पास का। उसके लिए जितना धन लगे लीजिए।
फौज ले जाइए। कुछ भी कीजिए। लेकिन उंदेरी यह पूँछ रौंद दीजिए।"
अपनी जरी के रूमाल से सिर का पसीना पोंछते हुए महाड़कर देशपांडे हँसते
हुए बोले, "महाराज यह पूँछ भी बहुत विषैली है। उस थल गाँव के किनारे खूब
मजबूत किला है। उस किले में ही अंग्रेजों का बारूदखाना है। वहाँ से पानी में एक
मील पर उंदेरी टापू है। कोई भी प्रसग उपस्थित होने पर ये अँग्रेज उन हब्शियों की
सहायता के लिए खड़े हो जाते हैं। अभी भी खड़े रहेंगे।"
सम्भाजी राजा कुछ गम्भीर हो गये। आगे बढ़कर उन्होंने देशपांडे के हाथ में
पान, सुपारी, नारियल दिया। उसे अपने माथे से लगाते हुए देशपांडे ने शम्भुराजा को
सम्मानपूर्वक प्रणाम किया। तब उनका हाथ अपने हाथ में लेकर शम्भुराजा अवरुद्ध
कंठ से कहने लगे—"काका ! यह राजपुर की घाटी बाजी प्रभु देशपांडे द्वारा पवित्र
की गयी धरती है। इन सारी बातों को आप भली-भाँति जानते हैं। हम नया क्या
बता सकते हैं? किन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि यदि आपने उंदेरी पर विजय पताका
सम्भाजी · 347
फहरा दी तो कोंकण तट पर भी एक पवित्र नवीन घाटी .की स्थापना होगी। ''
अपने साथियों में उत्साह भरने के शम्भुराजा के ढंग से कवि कलश बहुत
प्रसन्न हुए। उंदेरी पर आक्रमण करने का अर्थ था आग से खेलना। इसलिए दादाजी
देशपांडे कुछ चिन्तित दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु शम्भुराजा केवल देशपांडे पर
जिम्मेदारी डालकर चुप नहीं बैठे। वे स्वयं भी इस अभियान की तैयारी में लग गये।
शस्त्रास्त्र, तरांडी, छोटी-बड़ी नौकाएँ आदि छोटी-छोटी बातों पर पूरा ध्यान दे रहे
थे। समुद्रीतट पर भावी युद्ध का अनुमान शम्भुराजा को पहले ही हो चुका था।
इसलिए उन्होंने शिवाजी महाराज द्वारा बनवाई गयी कुलाबा की तटबन्दी का बचा
खुचा महत्त्वपूर्ण कार्य छ: सात महीने में पूरा कर लिया था। वहीं पर बारूद का
समृद्ध भंडार बनाया गया था। इसके अतिरिक्त सागरगढ़ पर भी अनाज और बारूद
की गोदामों को खचाखच भर दिया गया था। नागोण्णा और रोध्या की खाड़ी में
बाइस गलवतें तैयार की गयी थीं। दरिया सारंग, दौलतखान और भायनाक भंडारी
साथ में थे ही। चार हजार सैनिक तैयारी में जुटे थे। सैनिकों को प्रोत्साहित करने के
लिए उन्हें दो महीने का वेतन पहले ही दे दिया गया था।
अभियान की तैयारी चल रही थी। उसी समय कवि कलश ने शम्भुराजा से
धीमे स्वर में कहा, ''राजन, किसी किसी व्यक्ति की चालाकी का अनुमान लगाना
भी कठिन है। ''
''किसके सम्बन्ध में कह रहे हैं आप?''
''अपने कोंडाजी बाबा फर्जन्द। उनकी उम्र पैंसठ वर्ष है। दिखते पचास के
हैं। शरीर से स्वस्थ और बलिष्ठ हैं। फिर भी इस उम्र में इस प्रकार की
अशिष्टता ?'' कवि कलश व्यथित स्वर में बोले।
''हुआ क्या है? कविराज ! आपको जो कुछ कहना है साफ साफ कह दें। ''
''राजन, समुद्र पार के देशों से हीरे जवाहरात इकट्ठा करने का शौक तो इन
सिद्दियों को है ही साथ ही दुनिया की सुन्दरतम ललनाओं का शौक भी इन
हब्शियों को कम नहीं है। सुना जाता है कि जंजीरे पर इन लोगों ने दुनिया भर की
गोपियों का गोकुल बना रखा है। ''
''होगा। ''
''ऐसी बात नहीं है—किन्तु अब वहाँ मराठों नाते रिश्ते बन रहे हैं। इसलिए
कहता हूँ।''
''मतलब ?''
''वहाँ पर नवाब सिद्दी कासिम की तीन अति सुन्दर रक्षिताएँ हैं। इन्हीं में
एक नीली और पीताभ आँखों वाली ईरानी युवती दिलरुबा है। उसी पर हमारे कोंडी
348 :: सम्भाजी
३. औरंगजेब की विशाल सेना का दक्षिण अभियान, ९ वर्षों का अपराजित प्रतिरोध
बाबा की नजर पड़ गयी। कोंडी बाबा पर कासिम का इतना भरोसा है कि वह उसके
गले का हार बन गया। सिद्दी कोंडाजी पर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्हें दिलरुबा का
हाथ पकड़ा दिया। यही नहीं दोनों के लिए अपना एक महल भी दे दिया। "
शम्भुराजा ने कवि कलश की तरफ घूरकर देखा और सीधा प्रश्न किया-
"क्यों कविराज, जंजीरे की सेवा में जाने का विचार तो नहीं है न ?"
शम्भुराजा के इस प्रश्न पर दोनों खुलकर हँसे। किन्तु हँसते-हँसते शम्भुराजा
एकाएक गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा, "कविराज इस सारे प्रकरण में मुझे तो कुछ
दाल में काला दिखाई पड़ रहा है। अन्यथा उस सिद्दी कासिम जैसा पत्थरदिल
आदमी हमारे कोंडाजी को इतना क्यों चाहता है ?"
जब दादजी देशपांडे की सेना खाडी से बाहर निकलने लगी तो शम्भुराजा
चिन्तित स्वर में कहने लगे- "काका देशपांडे शीघ्रता कीजिए। खबर है कि वह
औरंगजेब शीघ्र ही दक्षिण में पहुँचने वाला है। उसके आने से पहले हमें इस सिद्दी
को पानी में डुबाकर मारना है। एक बार इस उंदेरी का काम तमाम हो जाये तो उसके
बाद आपको जंजीरे पर भी आक्रमण करना है।"
"जैसी आज्ञा महाराज।"
"जंजीरे का यह अभियान सफल होने के साथ ही रायगढ़ पर अष्ट प्रधान
मंडल में एक सम्मानित स्थान आपकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।"
रोध्या से शम्भुराजा तुरन्त रायगढ़ लौट आये। राजनैतिक गतिविधियों में पुनः
सक्रियता आ गयी। शम्भुराजा के अनेक सरदार मुल्हेर, सोलापुर, अहमदनगर जैसे
मुगल शासित प्रदेशों में गये थे। उनकी पचीस-तीस हजार की फौज मुगलों पर
आक्रमण कर रही थी। लूट-पाट भी चल रही थी। हंबीरराव के नेतृत्व में मराठों की
फौज एक बार पुनः बुरहानपुर पर आक्रमण कर रही थी। उसी समय दादजी के
सबल नेतृत्व में उंदेरी पर आक्रमण किया गया था। शम्भुराजा को एक ही समय में
अनेक स्थानों पर ध्यान देना पड़ रहा था। अलग-अलग जगह भेजी जाने वाली
रसद, बारूद आदि का हिसाब रखना पड़ता था। अनेक स्थानों से गुप्तचर रायगढ़ पर
आते थे। समाचार प्राप्त किये जाते थे। फिर नयी सूचनाओं के लिए गुप्तचरों को
यथावसर भेजा जाता था।
इस समय राजकीय कार्य-व्यापार का भार येसूबाई ने अपने हाथ में ले लिया
था। अष्ट प्रधान और अन्य सहायक तो साथ में थे ही। शिवाजी महाराज के शासन
काल में जिस प्रकार जीजामाता सारी राजनैतिक गतिविधियों पर ध्यान रखती थीं
उसी प्रकार येसूबाई की निगाह भी प्रत्येक गतिविधि को बारीकी से देखती रहती
थी। जहाँ कहीं भी जरा-सी चूक होती, वे तत्काल पकड़ लेती थीं। इसलिए सभी
कर्मचारी और अधिकारी उनसे भयभीत रहते थे।
सम्भाजी 349
एक दिन सुबह-सुबह गुप्तचर रायगढ़ पर आये। खबर की गम्भीरता का
अनुमान कर महारानी येसूबाई ने स्वयं दरवाजा खोला। गुप्तचर बिना कुछ बोले
चुपचाप खड़े रहे। राजमहल का समाचार बारूदखाने तक पहुँच गया। तेज कदमों से
चलते हुए शम्भुराजा वहाँ पहुँच गये। सभी के उदास चेहरे देखकर उन्होंने अनुमान
लगा लिया था। उन्होंने खड़े-खड़े ही समाचार पढ़ा। उंदेरी की लड़ाई में मराठी
सेना का सर्वनाश हो गया था।
क्रोध से झुँझलाते हुए सम्भाजी बोले, "मैंने बार-बार समझाया था कि बड़ी
सावधानी और चतुराई से युद्ध लड़ना है।"
गुप्तचर कहने लगा— "दादजी की योजना एकदम ठीक थी। उन्होंने आस-
पास की सभी खाड़ियों की नाकाबन्दी कर ली थी। आरम्भ में ही तोप के गोले से
तटबन्दी में एक बड़ी सुराख बना ली थी। उसमें से दो सौ बहादुर मराठे सैनिक
दुश्मन की गोलियाँ झेलते हुए भीतर जाने में सफल हो गये थे।"
"फिर कठिनाई कहाँ पैदा हुई?"
"समुद्र के किनारे थल गाँव के पास 'खूबलढ़ा' नाम का एक किला है।
उसमें अँग्रेजों का बहुत बड़ा बारूदखाना है। वहीं से फिरंगी अँग्रेज ऐन समय पर
हब्शियों की सहायता के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने अपनी तोपों से भयानक आक्रमण
किया। सब समाप्त हो गया।"
"समाप्त हो गया? मतलब ?" शम्भुराजा की आँखों के गोलक घूमने लगे।
"अनेक मराठों ने लड़ते-लड़ते उन्देरी पर अपने प्राण दिये। दुर्देव से अस्सी
जीवित मराठा सैनिक शत्रु के हाथ लग गये। उस दानव कासिम ने बाँस की तरह
उन अस्सी मराठों के सिर बेरहमी से काट दिये। उनके शरीर ऊपर किले से पानी में
फेंक दिये गये। अस्सी सिरों को चार बड़ी-बड़ी गठरियों में बाँधकर कासिम उन्हें
लेकर जाने कहाँ चला गया।"
"और अपने दादजी देशपांडे कहाँ हैं?"
"उस प्रभुवीर ने बहुत पराक्रम दिखाया। उनके हाथ की खूनी तलवार
छपाछप चल रही थी। किन्तु इसी समय तोप का एक गोला उनकी बाईं टाँग को
छूता हुआ निकल गया। गन्धक के कुछ टुकड़े उनके पैर में धँस गये और दादजी तट
के नीचे आ गिरे। अपने पुण्य प्रताप से वे नीचे खड़े जहाज में गिरे। अपने सिपाही
उन्हें चेऊल ले गये हैं। वहीं उनका उपचार हो रहा है।"
शम्भुराजा बहुत उद्विग्न हो गये थे। वे इस प्रकार तिलमिलाये जैसे किसी ने
बाँस से उनके सिर पर वार कर दिया हो।
चार दिनों में ही गुप्तचरों ने मुम्बई से मराठी वकील का सन्देश दिया। उसे
खंडो बल्लाल ने पढ़ा और घबराई हुई स्थिति में वे शम्भुराजा के पास आ खड़े हुए।
350 :: सम्भाजी
उनके चेहरे की घबराहट देखकर शम्भूराजा ने पूछा—“क्या हुआ खंडोजी?”
“वह हैवान सिद्दी अस्सी मराठा सैनिकों के सिर लेकर मुम्बई गया था।”
“तो?”
“मझगाँव के बन्दरगाह में ले जाकर उस हरामखोर ने उनका बड़ा उपहास
किया। भालों की नोकों में उन खोपड़ियों को खोंसकर उसने जुलूस निकाला। शराब
के नशे में धुत सैनिकों ने ढोल-तासे बजाते हुए जुलूस निकाले।”
“क्या कह रहे हो खंडोजी?”
“जी हाँ! महाराज। यह तो कुशल हुई कि इसकी सूचना अँग्रेज गवर्नर को
मिल गयी। उसने सिद्दी के इस जुलूस पर रोक लगा दी। इससे आगे होने वाला
अपमान टल गया।”
शम्भूराजा अचानक खड़े हो गये। उनका सिर चकराने लगा। आँखों से अंगारे
फूटने लगे। क्रोध में उन्होंने पैर को जमीन पर दबाते हुए हाथ से दीवार में लगी
खूँटी को खींचा। उनका आवेश और सन्ताप इतना अधिक था कि खूँटी उखड़कर
हाथ में आ गयी। उस दिन सम्भाजी ने अन्नजल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वे
मन्दिर की ओर भी नहीं गये। किन्तु उनकी अंगारों-सी दहकती आँखें और उनकी
हर साँस तथा उनका हर कदम, सभी को यह मूक सकेत दे रहे थे कि ‘अब रुकना
नहीं है। अब नहीं रुकना है।’
शम्भूराजा के बिना कहे ही सारे घुड़सवार और सैनिक उनके आसपास
इकट्ठे हो गये। अधिकारी भी जमा हो गये। दरवाजे से बाहर निकलते हुए कुछ
स्मरण करके वे एकाएक मुड़े और राजगृह के मन्दिर की ओर चले गये। वहाँ पर
उन्होंने किसी देव प्रतिमा की ओर देखा तक नहीं। देवालय के सामने वाले हिस्से में
लाल कपड़े में लपेट कर रखी गयी पादुका को उठाकर अपने माथे से लगाया।
शिवाजी महाराज को स्मरण करते बैठ गये। उनके पीछे पीछे वहाँ पहुँची येसूबाई ने
कहा—
“ऐसा नहीं लगता कि जजीरा इतनी सरलता से हाथ में आ जाएगा।”
“आपका कहना ठीक है महारानी। इन पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और सिद्दी
फिरंगियों को यह सह्य नहीं है कि जंजीरा मराठों की झोली में आ जाये, क्योंकि
जंजीरे पर मराठी ध्वज के फहराने का अर्थ है महासागर पर मराठों की अपराजेय
सत्ता। इस तथ्य को वे भली प्रकार जान चुके हैं।”
शम्भूराजा ने शिवाजी महाराज के स्मृति चिह्नों को माथे से लगाया। उनके
मुँह से शब्द निकले—
‘पिताजी अब प्रतीक्षा समाप्त हुई। मैं स्वयं जंजीरे के महाभयानक मगरमच्छ
के मुँह में हाथ डालने जा रहा हूँ। अब देखना है कि कौन किसको निगलता है?’
सम्भाजी : 351
पाँच
बुरहानपुर के महल में शाहंशाह टिके हुए थे। चिरागों के प्रकाश में महल चमक रहा
था। सिर के ऊपर हंडेदार झूमरें जल रही थीं। बाई ओर परदे की आड़ में उदयपुरी
बेगम, शहजादी जीनतुन्निसा और दूसरी बहू-बेगमें बैठी हुई थीं। अपने निजी
पारिवारिक जनों के साथ आलमगीर का विचार-विमर्श चल रहा था। इसी समय
शाही खोजा घबराते हुए आलमगीर के सामने आया। झुककर अत्यन्त दीन वाणी में
बादशाह के अत्यन्त प्रिय तुर्की घोड़े की मृत्यु की सूचना दी। इसे सुनते ही शाहंशाह
क्रुद्ध हो गया। क्रोध में ही पूछने लगा—
"हसन मियाँ ऽ! अपने काम में आपकी कोई रुचि नहीं दिखाई पड़ती। घोड़े
की पिछली टाँग में जरा-सा घाव लगा था। उतने जरा से घाव से घोड़े की मौत हो
गयी।"
हजरत हसन काँपते हुए बोले, "जहाँपनाह से रास्ते में मैं बार-बार यही
विनती कर रहा था कि घोड़ा बीमार है। इसके साथ पीछे चार दिन रुककर मैं आता
हूँ। किन्तु स्वामी सवार ने उसे वैसे ही घसीटते हुए ले आने का हुक्म दिया था।"
"हूँ ऽऽ"
"माफी चाहता हूँ हुजूर, लेकिन जख्म के लाइलाज होने से पहले उसे ठीक
कर लेना चाहिए था।"
बादशाह चमका! अपने वजीर एवं अन्य कर्मचारियों की ओर देखते हुए
बोला, "देखो एक मामूली आदमी जाते-जाते सहज रूप से किस प्रकार अक्लमन्दी
की नसीहत देता जा रहा है—'जख्म का इलाज होने से पहले उसे ठीक कर लेना
चाहिए।'"
लगभग तेईस वर्ष बाद बादशाह बुरहानपुर आया था। फिर भी तेईस वर्ष पूर्व
अपने यौवन काल की स्मृतियाँ बादशाह के दिल में ताजी बनी थीं। इस परिसर में
आम के कोमल पल्लवों को देखकर बादशाह अधीर हो उठता था। पत्तों से भरी
डालियों के पीछे किसी की खनकती हँसी उसके कानों में पहुँचती थी। बादशाह
उस समय सोलह-सत्रह वर्ष का था। तभी उसे आम के बगीचे में वह नवयौवना
मिली थी। उसका नाम जैनाबादी था। किन्तु सभी उसे हीरा कहकर ही पुकारते थे।
आम के बगीचे में आम का वह वृक्ष नये कोमल पल्लवों से लदा हुआ था।
बाग में औरंगजेब के आने की कोई खबर उसे नहीं थी। अपनी मदहोशी में वह
ऊपर उछली और अपनी कोमल बाँहों को ऊपर उठाया। बादशाह को लगा जैसे सूर्य
352 :: सम्भाजी
की किरणों को छूकर कोई तलवार चमक उठी हो। उसकी पतली छरहरी शरीर
यष्टि, कजरारी कत्थई आँखें, नाजुक गड्ढेदार चिबुक, दरके अनार से अधखुले ओंठ
और उसकी खनकती हँसी का बादशाह पर यह असर हुआ मानो किसी ने उसके
सीने में कटार उतार दी हो। औरंगजेब वहीं पर होश गँवाकर बैठ गया। हीरा ने
औरंगजेब की जिन्दगी में जिस तरह अचानक प्रवेश किया वैसे ही एक छोटी
बीमारी के निमिन में चली भी गयी। लेकिन इससे बादशाह के हृदय में जो गहरा
घाव लगा वह कभी भर न सका।
काफिर सम्भाजी के सैनिकों द्वारा ध्वस्त किये गये अपने प्रिय बुरहानपुर का
औरंगजेब ने देखा। ध्वस्त हुए महल, लुटी हुई सराफों की दुकाने रास्ते पर टूटकर
गिरे हुए दरवाजे, खडहर और मिट्टी के ढेर देखकर बादशाह आग बबूला हो
गया। व्यापारियों और नगरवासियों के उदास चेहरे देखे नहीं जाते थे। मिट्टी के
एक बड़े ढेर के पास से गुजरते हुए बादशाह बगल म ध्वस्त हुए कब्रिस्तान को घूम
घूमकर देख रहा था। उसने अपने एक पुराने और जानकार परिचित को हीरा की कब्र
खोजने के लिए कहा।
मुल्ला मौलवियों ने धमकी दी थी—"यदि हमें आगे बादशाही हिफाजन
नहीं मिलती है तो हम शुक्रवार नमाज भी बन्द कर देंगे।" उसी समय उसकी प्रिय
बेगम दिलरस बानू का लड़का होनहार शहजादा अकबर सम्भाजी से मिल गया था।
उसने अपने पिता के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। इससे आलमगीर बहुत
दुखी था। अपनी वरिष्ठता का हवाला देकर बादशाह ने उसे मनाने के लिए जो
सन्देशे में भेजे, उन्हें उसने अस्वीकार कर दिया। उल्टे उसने अपने पिता को पत्र
लिखकर भेजा—"आपके कार्यकाल में सल्तनत रसातल को चली गयी। मुल्ला
मौलवियों की इज्जत समाप्त हो गयी। बुढ़ापे में तुम्हारे कर्मचारी तुम्हारे अनुशासन
में नहीं हैं। सभी अधिकारी रिश्वतखोर हो गये हैं। ऐसे बूढ़े बादशाह से प्रजा
उम्मीद भी क्या करे?"
अपने शहजादे अकबर के प्रसंग में औरंगजेब ने सभी सहकर्मियों की घोर
भर्त्सना की थी।
"उस हरामजादे दुर्गादास राजपूत के साथ शहजादा निकल गया है। जहाँ भी
मिले उसे रोको, पकड़ में नहीं आ रहा है तो उसे कत्ल कर दो। ऐसा फरमान मैंने
निकाला था। किन्तु दक्षिण में हमारे सभी कर्मचारी और अधिकारी नामर्द
साबित हुए।"
"लेकिन जहाँपनाह, वह दुर्गादास राठौड़ दुनिया भर के बदमाशों का सिरमौर
है।" असदखान ने कहा।
"यह बात सच है असदखान।" औरंगजेब ने दीर्घ निःस्वास लेकर कहा,
सम्भाजी 353
"जसवन्त सिंह के बेटे को गद्दी का हक दिलाने के लिए वह कमीना दुर्गादास मेरे
पास आया था। दिल्ली में उसने हमारे साथ बहुत बहस की। जसवन्त सिंह की
दोनों रानियाँ हमारे बन्दीखाने में थीं। बन्दीखाना लाल किले के पीछे और लाल
किला दिल्ली में। कड़ा पहरा और ऊँची तटबन्दी होते हुए भी इस दुर्गादास ने क्या
किया? दोनों रानियों को पुरुषों का लिबास पहनाकर, घोड़े पर बिठाकर, हमारे
फौलादी पिंजरे से दूर भगा ले गया, असदखान!"
"जहाँपनाह?"
"जख्म गहरा होता जा रहा है। एक खतरनाक राजपूत एक धोखेबाज मराठे
से जा मिला है। वह मराठा कोई ऐरा-गैरा नहीं, शेर शिवाजी का बेटा है।"
"किब्लाए-आलम दुर्गादास का सम्भाजी से जाकर मिलना, आग से आग
का मिलना है। यह भयानक आग दिन ब-दिन भड़कती ही जाएगी। बुझेगी
नहीं।"
बीच में उठकर जुल्फिकार खान बोल पड़ा-
"सच है जवाँ मर्द।" चिराग के प्रकाश में बादशाह की कत्थई पुतलियाँ
चमक उठीं। उसकी सफेद दाढ़ी चाँदनी सी चमक उठी। उसने अपनी जाप करने
वाली माला को उठाकर आँखों से लगाया। कुरान की आयतें अस्पष्ट शब्दों में
बुदबुदाई। उसके चेहरे पर एक अनोखा तेज दमक रहा था। वह गरजा- "आग
भड़कने से पहले ही हम उन मशालों को बुझा देंगे।" ऊपर से बादशाह खूब आवेश
दिखा रहे थे। किन्तु भीतर से अस्वस्थ और कुढ़ते हुए दिखाई पड़ रहे थे।
बादशाह के बुरहानपुर पहुँचने के दस दिन बाद ही मराठों ने लुत्फुल्लाखान
कोक की छावनी पर डाका डाला था। मुगल सेना के बहुत से सैनिक हताहत हुए।
दस कोस अन्दर घुसकर मराठे ऐसा साहस करेंगे, ऐसा तो औरंगजेब ने कभी सोचा
तक नहीं था। औरंगजेब को वह सब अकल्पनीय लगा। उसी रात किले के पास
बारूद के बड़े गोदामों में भीषण विस्फोट हुआ था। यह कोई असम्भव घटना नहीं
थी किन्तु सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसी स्थिति थी।
बादशाह की उम्र तिरसठ वर्ष होने पर भी उसका शरीर बलवान था। उसकी
गति चपल और उत्साहपूर्ण थी। अपनी असीम महत्त्वाकांक्षाओं के कारण उसने
अपने सुख चैन को तिलांजलि दे दी थी। तिरसठ वर्ष के बादशाह का उत्साह पचीस
वर्ष के तरुण जैसा था। वह अपने सारे कार्य बड़े उत्साह से किया करता था।
दिल्ली में रहकर दुनिया का एक समृद्ध और बलशाली शासक औरंगजेब
हमेशा सजग रहता था। नित्य सन्ध्याकाल अपने खास गुप्तचरों से बिना समाचार
लिए वह सोता नहीं था। पिछले पन्द्रह बीस वर्षों में उसने अपने गुप्तचरों,
खबगियों और कुछ मराठों ने भी अनेक जानकारियाँ एकत्र की थीं। इस आधार पर
उसने हिन्दवी स्वराज्य का एक नक्शा बनाया था। स्वराज्य की सभी छोटी-बड़ी
३९५ सम्भाजी
नदियाँ, किले, पुराने मन्दिर, घाटियाँ आदि उस नक्शे मे दिखाये गये थे। सेनानियों
अथवा कर्मचारियों के नाम लेते ही बादशाह उस जगह पर झट से उँगली रख देता
था।
बादशाह अपने सहयोगियों से कहने लगा—"मैंने निश्चय कर लिया था कि
एक न एक दिन शिवाजी की हुकूमत को नष्ट कर दूँगा किन्तु पिछले बीस-पचीस
वर्षों में हमे फुर्सत ही नहीं मिली। सुयोग से वह शिवाजी भी कम उम्र निकला।
उसकी मृत्यु के बाद एक बार लगा था कि अब दक्खिन खाली घोड़े दौड़ाना है।
सारा प्रदेश अपने आप कब्जे में आ जाएगा। लेकिन अफसोस। इस अभियान का रंग
तो कुछ और ही दिखाई पड़ रहा है। खैर ठीक है ।"
फिर से बादशाह की नजर नक्शे पर घूमने लगी। उसने असदखान से कहा,
"वजीरे आजम, जजीरे के उस सिद्दी को लिखो—उससे कहो—पूरी ताकत के
साथ आप कोंकण के किनारे से निकलो उस सम्भाजी का पूरा प्रदेश जलाकर खाक
कर दो।"
"जी, जहाँपनाह।"
"उस पुर्तगाली गवर्नर को लिखो—देखो भाईजान सम्भाजी का प्रदेश दिल्ली
के आसपास नहीं है। वह तुम्हारे गोवावासियो का पडोसी है। हमने जरा-सा
अवकाश दे दिया तो सम्भाजी तुम्हे निगल जाएगा। इसलिए आप दक्षिण कोकण की
ओर से मराठो पर हमला करो।"
"जैसा हुक्म हुजूर।"
बोलते बोलते बादशाह ने हसन अली खान पर नजर डाली। "हसन
जवामर्द! तुम्हारे जोड का मजहब का रखवाला दूसरा कोई नहीं है। इस्लामी कौम में
तुम अपनी तरह के अकेले बहादुर हो। मथुरा में फौजदार के पद पर कार्य करते हुए
तुमने विद्रोही गोकुल जाट को जिन्दा पकड़ा था। कोतवाली में ले आकर उसके
टुकड़े टुकड़े किये थे।"
"जी हुजूर।"
"उदयपुर के आसपास एक सौ छिहत्तर मन्दिरों को तुमने ही जमींदोज किया
था। तुम्हारे जैसा धर्म का पालनहार है कोई इस दुनिया में?"
"हुक्म करो हजरत खाली हुक्म करो।" अपनी छाती ठोकते हुए आधा
उठकर हसन अली गरजा।
"अपनी बीस पचीस हजार की फौज लेकर नासिक के रास्ते कोकण में
जाओ। माहुली के किले पर अधिकार करके भिवंडी और कल्याण को खाक करते
हुए रायगढ़ की ओर बढो। एक ओर से पानी के रास्ते जजीरे के हब्शी, दक्षिण से
गोवा के पुर्तगाली और तुम पूरे मराठा प्रदेश की नेस्तनाबूद कर दो। तीनो ओर से
उम्हे रौंदते हुए रायगढ़ की ओर आओ। उन मक्कारों के रायगढ़ पर मैं अपना चाँद
सम्भाजी 355
सितारा फहराते हुए देखना चाहता हूँ और वहीं पर खुदा की नमाज पढूँगा। ऐसा होने
पर आलमगीर को चैन की मौत आये। ऐसी मेरी दिल्लो इच्छा है। अय खुदा इससे
बढ़कर मेरी कोई दूसरी हसरत नहीं है।"
बादशाह के जोशीले उद्गारों से सभी सवारों, अधिकारियों और कर्मचारियों
में उत्साह भर गया, उनकी आँखें चमकने लगीं। शाहंशाह इधर-उधर देखने लगा।
वह जहाज की टूटी लकड़ी की तरह कुरकुराते हुए कहने लगा-‘‘देखेंगे, एक
तरफ तिरसठ साल का हिन्दुस्तान की सल्तनत का बादशाह, दूसरी तरफ उस
जमींदार शिवाजी का नादान-नासमझ बच्चा। एक ओर बाइस विशाल प्रान्तों की
दौलत, तैमूर के पाक वंशजो की दो सौ वर्षों की विरासत और दूसरी तरफ मरगट्ठों
का जरा-सा लँगोट जैसा स्वराज्य।‘‘
‘‘हम उनका खात्मा करेंगे हुजूर।‘‘ जुल्फिकारखान गरजकर बोला।
‘‘पागल मत बनो। खात्मे की फिजूल बात मत छेड़ो, नीचे बैठो।‘‘
औरंगजेब कठोर शब्दों में बोला, ‘‘तुम सारे लोग मूर्ख हो। अभी चार दिन की ही
तो बात है। हिन्दुस्तान के बादशाह की पाँच लाख की सेना यहाँ डेरा डाले थी। फिर
भी तो हंबीरराव नामक एक मूर्ख मराठा, यहाँ से कुछ कोस की दूरी पर अपने
लुल्फल्लाखान की छानवी पर डाका डाला, वहाँ की रसद लूटी इसका मतलब क्या
है? बोलोऽऽ‘‘
सभी ने गर्दने झुका लीं। गम्भीर साँस लेते हुए बादशाह पुन बोला ‘‘इसका
मतलब इतना ही है कि होशियार रहो। हमारा यह दक्खिन का अभियान कठिन
नहीं है लेकिन आसान भी नहीं है। एक जरा सा काँटा बहादुर मर्द के पसीने छुड़ा
देता हैं। छोटी सी चींटी ताकतवर हाथी की सूंड में घुसती है तो ताकतवर हाथी को
कुत्ते की तरह कीचड में लोंटा देती है। बेवकूफ मत बनो। जागोऽ जागोऽऽ।‘‘
छह
जंजीरे के सामने विशाल खाड़ी का फैलाव। उसके किनारे राजपुरी नाम का एक
छोटा-सा गाँव। उस गाँव के पीछे खड़ा पत्ताड़ा पहाड़। पहाड़ की छाया सामने के
जलाशय में पड़ रही थी। वह छाया समुद्र में पाँव पसारकर बैठे हुए महाकाय राक्षस
जैसी लग रही थी। निचले हिस्से में राजपुरी गाँव घने पेडों की छाया में छुपा हुआ
था। बीच में दिखाई देने वाली मम्जिदों की मीनारें और मन्दिरों के कलश मानो
356 सम्भाजी
परस्पर स्पर्धा कर रहे थे। गाँव के पास समुद्र की गहरी खाड़ी कल कल ध्वनि कर
रही थी।
सागर में ज्वार आया था और ऊपर आसमान मे बादल भर आये थे। आज का
दृश्य कुछ और ही दिख रहा था। पानी में खड़े जंजीरा दुर्ग और किनारे पर स्थित
राजपुरी गाँव की दूरी केवल आठ सौ गज थी। राजपुरी के पीछे की पहाड़ी से जंजीरे
की सर्पाकार तटबन्दी स्पष्ट दिखाई देती थी। समुद्र से उठने वाली लहरों की
प्रतिध्वनि मैदान तक सुनाई देती थी। दुर्ग के चारों ओर तट पर अर्धगोलाकार बुर्ज
बने थे। प्रत्येक बुर्ज पर सिद्दी सैनिकों का सजग पहरा लगा रहता था। भूरे बालों
वाले हब्शी बड़ी तत्परता से पहरा देते थे। सारा कार्य व्यापार रोज की भाँति चल रहा
था। दोपहर ढल चुकी थी। जंजीरे के पिछले हिस्से में अचानक कुछ हलचल हुई।
बुर्जों कीं तीन-चार तोपों में पलीते दिये गये। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुड़म धामऽऽ'
जैसी कानों के पर्दे फाड़ने वाली आवाज सुनाई दी। सिद्दियों ने केवल अपना
अस्तित्व घोषित करने के लिए तोपें दागी थीं। इसके तुरन्त बाद 'अल्लाहो
अकबरऽऽ दीनऽऽ दीनऽऽ' जैसी गर्जनाएँ सुनाई दीं।
राजपुरी के निवासी भयभीत हो गये। किनारे पर जो छोटी-मोटी मराठों की
सेनाएँ थीं उनके भी होश उड़ गये। सामने से साठ सत्तर नौकाओं में सिद्दी सैनिक
तट की ओर आते दिखाई पड़े। सभी चिल्ला उठे-'आएऽऽ, आएऽऽ, सिद्दी
सैनिक आए।' भगदड़ मच गयी। राजपुरी की प्रजा बाहर निकल पड़ी और अपने
बाल बच्चों को बचाने का प्रयत्न करने लगी। प्रजा अपनी जान बचाने के लिए पीछे
के पहाड़ पर चढ़ने लगी।
उस शाम को दो हजार हब्शियों ने हंगामा मचाया। इसलिए राजपुरी में ही
नहीं, तट के आसपास की बस्तियों, रेवदंडा, कोलीवाडा, मुरुड, नादगाँव तक सभी
छोटी बड़ी बस्ती में कुहराम मचा हुआ था। हब्शियों ने कितने ही गाँव वालों को
नंगा किया, माँ-बहनों की इज्जत लूटी, तबेलों से घोड़े खोल लिए। शम्भुराजा के
सैनिक चौकी छोड़कर भाग गये। यह देखकर प्रजा को बहुत दुख हुआ।
आधी मील लम्बाई और डेढ़ मील की परिधि वाला जंजीरा आज अपनी
विजय से उन्मत्त हो रहा था। रात में जंजीरे के बुर्जों पर मशालें जलाई गयी थीं।
सामने वाले सिंह द्वार के अगले हिस्से में सिद्दी खैरियत खान और सिद्दी कासिम
खान, दोनों भाई खड़े थे। मराठों के भाग जाने और सिद्दी सेना की विजय का
समाचार उन तक पहुँच चुका था। खैरियत खान ने पूछा- "कासिम भाई, आज की
घड़ी में तो आलमगीर का हुक्म हमारे लिए अल्लाह का हुक्म साबित हुआ।"
"बिल्कुल, भाईजान, कल सुबह हम खुद समुद्र के उस पार जाएँगे। शाम
तक हमारी विजयी सेना रोहा-याण गाँव तक पहुँच जानी चाहिए।"
सम्भाजी : : 357
"जी हाँ, तब तक कल्याण और पनवेल को ध्वस्त करते हुए हसन अलीखान
भी उस ओर से पहुँच जाएँगे। मुझे लगता है कि परसों तक हमारी तलवारें रायगढ़
के सीने तक पहुँच जाएँगी।"
कीमती शराब के प्याले खाली करते हुए सिद्दी बन्धुओं ने आनन्द मनाया।
दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सात मंजिला शीश महल में कासिम की नींद
टूटी। सैनिक अभियान पर प्रातः काल ही जाना था। उसने पर्दा हटाकर बाहर देखा।
यह सुबह कुछ विचित्र लग रही थी। काले बादल नीले पानी में उतर आये थे।
खाड़ी दिखाई देने वाला पहाड़ भी कुछ विचित्र लग रहा था। जलाशय से उठकर
उसकी दृष्टि पहाड़ पर जा टिकी। वह उसी क्षण चकित होकर बिस्तर पर जा गिरा।
सामने का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। पहाड़ के दायें-बायें सिरे पर भगवे झंडे
फहरा रहे थे। एक रात में ही मराठों ने उस किनारे पर क़ब्ज़ा जमा लिया था और
शक्तिशाली तोपों को यथास्थान व्यवस्थित कर रहे थे। पिछले दिन भागी हुई प्रजा
अपने-अपने घरों में आ चुकी थी। मराठे दृढ़ थे और पैर जमाकर खड़े थे।
मराठों ने सिद्दियों को अपने राज्य में पैर फैलाने का अवसर नहीं दिया।
उन्होंने सिद्दियों से पहले ही आक्रमण कर दिया। नीचे की झाड़ियों में शम्भूराजा
का घोड़ा खड़ा था और मुरुड और मांदाड़ खाड़ी की ओर से मराठा सैनिक जंजीरे
पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रहे थे। मराठों की योजना बहुत शक्तिशाली
थी। तट पर तैनात हब्शी सैनिक भाग खड़े हुए। वे जंजीरे की बिल में चूहों की तरह
दुबककर बैठ गये।
राजपुरी पहाड़ की बगल में एक समतल भू भाग पर मराठों का शाही डेरा
खड़ा किया गया था। अपने तंबू के सामने शम्भूराजा शान से खड़े थे। उनकी तीक्ष्ण
दृष्टि समुद्र पर मंडरा रही थी। उनके एक ओर कवि कलश, जोत्याजी, केसकर और
अनुभवी दरिया सारंग खड़े थे और दूसरी ओर शहजादा अकबर और दुर्गादास।
बगल की एक खाट पर अरब सेनानी जंगेखान बैठे थे। रंगबिरंगी लुंगियाँ और चमड़े
के कुर्ते पहने, घने जंगल-सी दाढ़ी बढ़ाए अरबी सैनिक मराठों की अपेक्षा विचित्र
दिख रहे थे।
पिछले कुछ दिनों से शम्भूराजा को अरबों से उच्च कोटि का बारूद मिलने
लगा था। इस वजह से सिद्दी बहुत व्यथित था।
जंजीरे की प्राचीरों की जोड़ाई बहुत मजबूत थी। अनेक वर्षों से लहरों के
थपेड़े खाते हुए भी उसमें कहीं कोई दरार नहीं थी। प्राचीर को सशक्त बनाने वाले
चूने और गिट्टी के मसाले को रंच मात्र भी क्षति नहीं हुई थी। पानी में डूबी किले
की सीढ़ियों पर ज्वार-भाटे की लहरें टकराती थीं। वहाँ पर बुर्जों पर चलने वाली
तेज हवा और लहरों के साथ हमेशा अठखेलियाँ होती रहती थीं।
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शहजादा अकबर की ओर देखकर कवि कलश बोले, "जंजीरे के सिद्दी
खैरियत खान और कासिम पक्के हैवान हैं। पैसे की लालच में ये किसी भी व्यक्ति
को नोच डालने में संकोच नहीं करेंगे।"
"कुछ दिन पहले श्रीबाग और पेण के कुछ अमीर मुसलमान व्यापारियों को
भी पकड़कर ले गये। उन्हें उंदेरी के किले में बाँधकर खूब पीटा। हमारे लोग ही
नहीं अंग्रेजों के वकीलों ने भी बीच बचाव किया। किन्तु अठारह हजार नकद लेने
के बाद ही उन्हें छोड़ा।" शम्भूराजा ने कहा।
इसी तरह का एक और कारनामा हब्शियों ने पिछले महीने किया था। उनकी
अत्याचारी सेना ने पनवेल से लेकर चौल तक के सारे मराठी प्रदेश को पूरी तरह
ध्वस्त कर दिया था। उसका बदला लेने के लिए शम्भूराजा ने स्वयं जंजीरे पर
आक्रमण किया था। उनके साथ बीस हजार की फौज और छोटी बड़ी कुल तीन सौ
नौकाएँ थीं।
शिवाजी महाराज के स्वर्गवास का समाचार पाकर सिद्दी खैरियत और
सिद्दी कासिम ने पूरे दस दिन तक जंजीरे पर उत्सव मनाया था। अपने साथ अपनी
फौज को भी खूब शराब पिलाई थी। यह सोचकर सिद्दी पागल हो उठे थे कि
शिवाजी के स्वर्गवास के बाद मराठा शक्ति का अन्त हो गया है और अब उन्हें कोई
भी रोक नहीं सकता। किन्तु थोड़े दिनों में शम्भूराजा ने उंदेरी पर आक्रमण करके
सिद्दियों का घमंड तोड़ दिया।
राजपुरी के पीछे के पहाड़ पर मराठों ने अपनी पाँच हजार की फौज तैनात की
थी। ऊपर पहाड़ से नीचे पानी में देखने से पानी में तैरती नावें कुछ विचित्र दिखाई
पड़ती थीं। ऐसा लगता था जैसे राजपुरी के दोनों ओर से बच्चों ने कागज की नावें
छोड़ रखी हैं। किन्तु वह मराठों की असली सेना थी। शिवाजी महाराज की मृत्यु के
केवल एक वर्ष में ही शम्भूराजा उनसे पाँच कदम आगे निकल गये थे। सुसज्ज सेना
संगठित करके पश्चिमी तट पर शासन करने वाले और कुछ शतकों से जमे हुए
सिद्दियों को उन्होंने ललकारा था। तीन सौ नौकाओं का बेड़ा लेकर शम्भूराजा
स्वयं जंजीरे के समुद्र में उतरे थे।
सिद्दी खैरियत और कासिम अनेक बार किले के बुर्ज पर आकर खड़े होते
और भयभीत नजरों से दूरबीन की सहायता से पानी की ओर देखते। राजपुरी से
लेकर मुरुड गाँव के तट पर और वहाँ से पद्मदुर्ग की ओर लगभग एक मील तक
देखने पर लगभग सौ नौकाएँ तैरती नजर आती थीं। उनका नेता प्रसिद्ध नाविक
दरिया सारंग था। इस दिशा से अनेक बार तोप के गोले आकर जंजीरे से टकराते थे।
राजपुरी से आगरदांडा और दीघी तक के परिसर में लगभग सवा सौ नावें खड़ी थीं।
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