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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 793 में से

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पृष्ठ 692

शोक सन्ताप से भरी यह यात्रा समाप्त नहीं हो रही थी। कालरूपी घड़े का
पानी उठकर ऊपर आ रहा था। पश्चाताप, सन्ताप, उद्वेग और अतीत-स्मृतियों से
महाराज का शरीर सन्तप्त हो रहा था।
"पिताजी कितनी गहरी है यह बाणकोट की खाड़ी...
इसीलिए कहता हूँ शम्भू पीठ को हाथ से मत छोड़ो
पिताजी आप ही तो कहते हैं, मछली के बच्चे को तैरना सिखाना नहीं
पड़ता
शम्भुराजा! कभी कभी भाग्य का पासा उल्टा पड़ जाता है
शान्त सागर के भीतर से लहरों के पहाड़ उठते हैं
शम्भू वह देखो लहरें-ही-लहरें
शम्भू कहाँ चले? शम्भुराजा?
'मराठों के राजा को शत्रु लेकर दूर चला जा रहा है। शम्भुराजा को जिन्दा
पकड़ लिया है।' ऐसी चीख-पुकार गाँवों वनों जंगलों में सुनाई पड़ने लगी। रास्ते
के सारे गाँव और कस्बे घबरा गये। प्रजा के मन में शिवाजी महाराज और सम्भाजी
का स्थान देवता के समान था। वह अशुभ समाचार सुनकर गाँव के लोग आक्रोशित
हो गये। स्त्रियाँ और बच्चे भी जोर-जोर से रोने-कलपने लगे। जिन्होंने पहले
स्वराज्य के सैनिक के रूप में अपना घोड़ा नचाया था, उनके शरीर में आग भड़क
उठी। म्यान से तलवारें निकालकर वे अपनी-अपनी घुड़सालों की ओर भागे। किन्तु
लम्बे अकाल ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। घुड़साल में सूने खूँटे और
सूनी नाँद की दशा देखी न जाती थी। उनके पास घोड़ा नहीं है, इस अनुभव से
उनका कलेजा फटा जा रहा था।
माथे पर धूप चिलचिला रही थी। लू की गर्मी सहन नहीं हो पा रही थी।
घोड़े को लगाम लगाने की तरह दोनों के मुँह बाँधे गये थे। शरीर पर पसीने की धारा
बह रही थी। गला सूखा जा रहा था। घोड़े पर बँधे शम्भुराजा का मन ग्लानिग्रस्त हो
रहा था। भरी गगरी की तरह काल हिल रहा था।
ए शम्भूदादा, शम्भूदादा...
चुप रह पागल। तुम्हारे साथ मैं बरगद की जटाएँ खेल रहा हूँ
तो क्या हुआ?
हमारी शादी हो चुकी है
बड़े होकर हम घर-संसार बसाएँगे।
अच्छा बोल क्या चाहिए तुम्हें?
शृंगारपुर के केशव पंडित का प्रयोगरूप रामायण मैंने देखा
690 :: सम्भाजी