सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 666

इलाके को चारों ओर से घेर लिया था। कोठी के बाहर कर्णेश्वर मन्दिर के सामने
वाले शृंगारपुर के रास्ते से, उधर नावड़ी की ओर से, पीछे नदी के किनारे से घोड़े ही
घोड़े आ रहे थे। शत्रु संकेत की सीटियाँ बजा रहे थे। पठान, दक्खिनी मुसलमान
और गणोजी शिर्के के साथ के सौ-दो सौ मूर्ख ऐसे डेढ़ हजार घुड़सवारों ने कोठी
को चारों ओर से घेर लिया था। चारों ओर से भालों, बर्छियों और तलवारों का
जंगल खड़ा हो गया था। दुष्ट कालियानाग का मर्दन करने गये कृष्ण को कालिया ने
ही दबोच लिया था। दैवगति के सामने सारे मानवीय प्रयत्न निष्फल हो चुके थे।
बलिदान की भावना और रणोन्माद की तरंगों से शम्भुराजा का शरीर भभक
उठा था। हाथ में नंगी तलवार लिये उन्होंने अपना घोड़ा अपनी जगह पर ही
वर्तुलाकार घुमाया। इतनी बड़ी फौज होने पर भी इस बलवान शेर को कैद करने का
साहस किसी को नहीं हुआ। दूर से ही रस्सी के फन्दे में फँसाने का प्रयास मुकर्रब
कर रहा था। इसी बीच इखलासखान ने पीछे से अपनी तलवार का वार घोड़े के पुट्ठे
पर किया। खून की धारा बहने लगी। घोड़ा जोर से हिनहिनाया। विकल होकर पैर
पटकने लगा। इतने में साठ-सत्तर पठान एक साथ महाराज पर टूट पड़े। उनमें से
एक ने भाले की लाठी का एक जोरदार वार महाराज की जाँघों पर किया। शम्भुराजा
असह्य पीड़ा से बेजार हो गये। उनके हाथ से तलवार गिर गयी। वे खाली हाथ खड़े
हो गये।
शत्रुओं ने मौके का फायदा उठाया।
सह्याद्रि का शम्भू महाराज कैद हो गये।
यह करुण.दृश्य देखकर कृष्णाबाई ने पत्थर पर अपना सिर पटक दिया।
रंगोबा का सिर चकरा गया और वे गिर पड़े। शम्भुराजा को बन्दी बना देखकर भीड़
में खड़ा गणोजी शिर्के आनन्द विह्वल होकर रोने लगा। बीच बीच में आँसू पोंछते
हुए वह हँसता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दृश्य सत्य है या झूठ?
ऐसे में उसकी स्थिति पागलों जैसी हो रही थी।
पिछली तीन रातों से निरन्तर जागती हुई सावधान शत्रु सेना अब 'अल्लाहो
अकबर' कहकर किलकारियाँ मारने लगी थी। कुछ सैनिकों ने आसपास इस दृश्य
को देखने के लिए एकत्र प्रजा को लाठियों से पीटना शुरू किया। बगल के घरों और
सरदेसाई की कोठी को आग लगा दी।
शत्रु सेना भी इस बात के लिए सम्भ्रमित हो गयी थी कि इस अचानक प्राप्त
सम्पदा का क्या करें? शम्भुराजा और कविराज पर कम्बल उड़ाया गया। पकड़े गये
चोरों की तरह उन्हें गाँव से दो कोस के फासले पर ले जाया गया। बायें हाथ पर
वरुणा नदी का पाट था। वहीं नदी के किनारे मुकर्रबखान रुका। वहाँ निर्णय लिया
गया कि मुकर्रब अपने साथ केवल छह-सात सौ घुड़सवारों को लेगा। शेष थके हुए
664 :: सम्भाजी

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास) · पृष्ठ 666, कुल 793 में से · SarvaKosh