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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 793 में से

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पृष्ठ 627

किसी गाँव से गुजरती तो कुत्ते भौंकने लग जाते और पन्हाला की तलहटी तत्पर
शम्भूराजा के सैनिकों को आक्रमण की गन्ध मिल जाती। इसलिए गणोजी बहुत
सावधानी बरत रहा था। उसने नावली की दूसरी ओर दो कोस दूर से देवाले गाँव के
जंगल से मुकर्रबखान की फौज को बड़ी सावधानी से आगे बढ़ा दिया।
मुकर्रब ने कुशल और साहसी तीरन्दाजों का दल आगे भेज दिया। ताकि यदि
गाँव की बस्तियों में यदि कुत्ते भौंकने लग जायँ तो उन्हें अपना निशाना बना लें।
अर्थात् भौंकते कुत्तों के जबड़ों को अपने बाणों से बन्द कर दें।
अब मरने का निश्चय करके निकला हुआ मुकर्रब होश में आ गया था। उसने
अपने कुशाग्र मस्तिष्क का उपयोग किया। आगे बढ़ती हुई फौज तत्काल रोक दी।
मुकर्रब ने अपने चचेरे भाई से कहा, "सूर्योदय से पहले छावनी में वापस जाओ।
तुम मेरे शामियाने में मेरे ही बिस्तर पर सो जाओ। चार दिन तक वैद्य और हकीम
को बुलाते रहो। ऐसा माहौल निर्माण करो कि हमारी फौज कराड़ चली गयी है और
मुकर्रबखान बीमार पड़ गया है। मैं कहीं किसी शिकार पर निकल चुका हूँ, इसकी
खबर हवा-पानी, मनुष्य किसी को भी नहीं होनी चाहिए।"
घोड़े और मनुष्य फिर से आगे की ओर दौड़ने लगे। सवेरा होते-होते सुपात्रे,
बांबवड़े आदि गाँव पार हो चुके थे। घोड़ों की गति इतनी तेज थी कि सूर्योदय होने
के साथ ही सारी फौज बहिरेबाड़ी की घाटी पार करके वहाँ के पहाड़ी टीले पर
पहुँच गयी थी। आसपास घने वृक्षों से भरा जंगल था। किन्तु ऊँची चोटी से सात
आठ कोस की दूरी पर बसा मलकापुर गाँव दिखाई दे रहा था। गणोजी वहाँ से
महादेवखड़ी नामक पहाड़ी की ओर सिरपिटाया-सा देख रहा था। उसकी चिन्तित
मुख मुद्रा देखकर मुकर्रबखान उससे सटकर खड़ा हो गया। गणोजी के कन्धे पर
प्यार से हाथ रखकर मुकर्रब ने पूछा, "क्यों गणोजी राजा, क्या बात है?"
"खान साहब एक बहुत बड़ी समस्या है। मलकापुर के पास के इस सीधे
रास्ते से जाने पर कठिन और ढालू चट्टानों वाला आंबा घाट आता है। खुदा की
मेहरबानी से यदि उसे हम पार कर लें तो हम सीधे संगमेश्वर के पास कोंकण में
उतर सकते हैं।"
"तो चलिए न—"
गणोजी के कदम वहीं ठिठक गये। वह हाँफते हुए बोला, "इस सीधे रास्ते
के अतिरिक्त एक दूसरा भी जंगली रास्ता है। बायें हाथ से कुछ दूर लगने वाला
अणुस्कुरा घाट है, वहाँ से भी हम लोग कोंकण में उतर सकते हैं। किन्तु इस रास्ते
से जाने में एक रात और एक दिन का समय और लगेगा।"
"तब तो सीधी मलकापुर वाली राह ही ठीक है।"
"मैं वही कह रहा हूँ, खान साहब! यह रास्ता सीधा तो है किन्तु सुगम नहीं
है।" चिन्तित होकर लम्बी साँस लेते हुए गणोजी ने कहा, "इसी मलकापुर के
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