सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 568

मन्दिर में जाकर बैठ गये। उन्होंने सेवकों से कहा, "महारानी को सूचित
कीजिए...उनसे कहिए मुझे यहीं ईश्वर के सान्निध्य में रहने दें।" दो रात, दो दिन
महाराज उन्हीं वस्त्रों में मन्दिर में बैठे रहे।
चारों ओर हो हल्ला मचा हुआ था। हंबीरराव राजाराम के ससुर और ताराऊ
के पिता थे। शोक सन्तप्त ताराबाई के पास येसूरानी बैठी थीं। ताराबाई के दुख की
कोई सीमा नहीं थी। दूसरे दिन, राजकर्मचारी निजी बैठक में आये। जगह जगह पर
युद्ध आरम्भ थे। येसूरानी ताराऊ का सिर अपनी गोद में रखकर थपथपा रही थीं।
उन्हें सान्त्वना दे रही थीं। साथ ही पन्नों पर भी अपनी नजरें दौड़ा रही थीं।
महारानी के इस रूप को देखकर ताराऊ ने पूछा, "दीदीजी यह सब आप कैसे
सहन कर लेती हैं? कैसे सब कुछ संभाल लेती हैं? आपको इतनी शक्ति कहाँ से
मिलती है?"
"अरे ताराऊ! हम शिवाजी महाराज की पुत्र-वधुएँ हैं। जो भी बाधा आएगी
उसके आगे हमें जाना ही होगा। हमारी दौलत अपनी सम्पदा पर अभिमान करने
वाली मुगलों की बादशाहत नहीं है। हम तो परिश्रमी किसानों के राजा हैं।"
"जी।"
"कोई भी, और किसी भी प्रकार की विपत्ति आ जाय, तुमको और मुझको
पैर मोड़कर बैठने की सुविधा कहाँ है? परिश्रमी किसानों की बहू बेटियों को कभी
देखा है? हल खींचने वाला कोई बैल मर गया तो वे पल्लू बाँधकर जुआ अपनी
गर्दन पर रख लेती हैं और बैल के साथ हल खींचती हैं। किन्तु बुआई अवश्य करती
हैं। ताराऊ! प्रजा की भाँति ही राजा को भी रहना पड़ता है।"
हंबीरमामा के आकस्मिक निधन से शम्भु महाराज के हृदय को कितना गहरा
आघात लगा था, इसे सभी जानते थे। शोक सन्तप्त शम्भु महाराज जगदीश्वर के
मन्दिर से निकलने को तैयार ही न थे। पिछले दो दिनों और दो रातों के बीच उन्होंने
दो-तीन बार आधा आधा गिलास दूध पिया था। इसके अतिरिक्त केवल पानी ग्रहण
किया था।
तीसरे दिन प्रातःकाल येसाजी कंक, म्हालोजी घौड़पड़े और प्रह्लाद निराजी
जैसे बुजुर्ग मन्दिर में जा पहुँचे। महारानी भी उनके साथ थीं। इन वरिष्ठ व्यक्तियों
को महाराज को समझाकर मन्दिर से बाहर निकालने में अधिक समय नहीं लगा।
किन्तु धीर गम्भीर प्रवृत्ति वाले महाराज को अब अपना दुख दबा पाना असम्भव हो
गया। उन्होंने कातर स्वर में कहा, "पहाड़ जैसे हमारे पिताजी हमें छोड़कर चले
गये। तब भी हम मन से इतना नहीं डरे। क्योंकि पिताजी के वियोग का स्मरण
हंबीरमामा ने हमें कभी होने ही नहीं दिया। हमारे आधार के लिए हंबीरमामा का
मजबूत कन्धा मौजूद था। आज वह कन्धा हमें छोड़कर चला गया। अब हम जाएँ
१७० सम्भाजी