छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 564, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"ऐसा हम कैसे होने देंगे? औरंगजेब ने भले ही आदिलशाही और
कुतुबशाही का खात्मा कर दिया हो, किन्तु लाख कोशिश करने पर भी शम्भू
महाराज का एक भी किला पराजित नहीं हुआ।"
"इसीलिए हम उसका पीछा करें।"
"तब तक शत्रु वाई को पार कर परसणी घाट की घाटी चढ़ने लगेगा। भोसले
यदि खिंडी पर उसने अधिकार कर लिया तो उसकी शक्ति दस गुना बढ़ जाएगी।"
"तो फिर सेनापति जी किया क्या जाय?"
हंबीरराव ने घोड़े की लगाम खींची। एक क्षण के लिए अँधेरे में वसन्तगढ़ के
बुर्ज की ओर देखा। दूसरे ही क्षण उन्होंने कहा, "हम रास्ता ही बदल दें। कोयना
के किनारे-किनारे, वासोटा किले के किनारे से जंगल का रास्ता पकड़ें। कल सुबह
होने से पहले महाबलेश्वर पहुँच जाएँगे। वहाँ से पीछे मुड़ जाएँगे। शत्रु यदि हवा
की गति से जाएगा तो भी उसे रास्ते में ही रोकेंगे।"
"किन्तु हंबीरराव, यह रास्ता बहुत ही दुर्गम है। आदमियों और घोड़ों दोनों
की दुर्गति हो जाएगी।"
"मृत्यु के समान आयी इस आपदा को रोकने का दूसरा कोई उपाय नहीं।
चलिए, बढ़ाइये घोड़ा। मुड़िये पीछे। हंबीरराव गरजे, "बोलो हर हर महादेवऽऽ।"
कोयना नदी के किनारे का रास्ता शुरू हुआ। जंगल में कमर तक उगी घास में
घोड़े दौड़ने लगे। विगत अनेक दिनों से हंबीरराव ठीक से सोये न थे। सुख चैन की
नींद क्या होती है, इसका उन्हें पता ही न था। हंबीरमामा ने रिकेब से पाँव बाहर
निकाल लिया। वे दौड़ते घोड़े पर झुक गये। घोड़े की जीन के साथ हाथ रखकर वे
दौड़ते घोड़े पर ही सो गये। उनके घोड़े को भी अपने मालिक की दशा का ज्ञान था।
पीठ पर अपने मालिक का ध्यान रखते हुए अपनी गति को बिना कम किये, वह
बेजबान जानवर दौड़ रहा था।
नींद में ही यह कठिन प्रवास हो रहा था। हंबीरराव की आँखों के सामने
पहले के प्रतापगढ़ का दृश्य उभर आया। सजी हुई पालकी में बैठकर शिवाजी
महाराज अफजलखान मे मिलने जा रहे थे। खान की दगाबाजी का महाराज द्वारा
तत्काल लिया गया बदला। उसी तलहटी में घेरा डालकर सर्जाखान खड़ा था।
प्रतापगढ़ के बुर्ज की ओर हँसते हुए देख रहा था। शिवाजी और सम्भाजी का नाम
लेकर उपहासपूर्वक हँस रहा था। हंबीरराव अचानक ग्लानिग्रस्त होकर जाग गये।
उन्होंने आवेश में घोड़ा दौड़ाया। उन्होंने नारोजी भोसले को सावधान करते हुए
कहा, "चलो जल्दी अभी तक कोई मुगल सह्याद्रि का घाट पार करके आया नहीं
है। यदि 'पारघाट' पर दुश्मन ने क़ब्ज़ा कर लिया तो गजब हो जाएगा।"
562 :: सम्भाजी