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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 793 में से

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पृष्ठ 466

"क्या कह रहे हैं महाराज?" सभी ने आश्चर्य से पूछा।
"कविराज, कहाँ है वह कागज ?"
कवि कलश ने एक कागज प्रस्तुत किया। गुप्तचरों नें पुर्तगालियों और
बादशाह के गुप्त समझौते की प्रतिलिपि तैयार कर ली थी। उसके अनुसार मराठों के
कोंकण का जो भाग पुर्तगाली और मुगल सेना द्वारा जीता जाएगा, वह सब
पुर्तगालियों को दे दिया जाएगा। उसके बदले में पुर्तगाली पणजी के समीप बादशाह
को नौसेना का अड्डा बनाने की अनुमति देंगे। वाइसराय की सारी पोल खुल गयी
थी।
शंभूमहाराज ने दृढ़तापूर्वक कहा, "यह साला औरंगजेब से जाकर मिले
उससे पहले ही उसे लंजुपुंज कर देना चाहिए।"
"फिर देर किस बात की? चलें गोवा पर हमला करें।" राजा के सभी
सहयोगियों ने एक साथ उद्घोष किया। ऐसा लग रहा था कि उस बैठक में ही युद्ध
के नगाड़े बज रहे हों।
अत्यन्त तनावपूर्ण मनःस्थिति में महाराज ने कहा, "फिरंगियों द्वारा की गयी
पणजी की तटबन्दी, आगे चलने वाली उनकी तोपें, फौजों का कुशल संचालन,
उच्चकोटि का बारूद और समुद्र में मुक्त रूप से घूमने वाली उनकी नौकाओं आदि
का विचार करने से उन पर सीधा आक्रमण हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। पर
देखेंगे, कोई-न-कोई रास्ता अवश्य निकलेगा।"
उसी रात महाराज ने मुबई के अंग्रेजों को सन्देश भेजा। दक्षिण की ओर जिंजी
में उन्हें व्यापार की अनुमति चाहिए थी। इस माँग को लेकर अँग्रेजों ने रायगढ़ की
अनेक यात्रायें की थीं। महाराज ने कहा, "कविराज ! जिंजी के पास वाले क्षेत्र में
व्यापार की अनुमति उन्हें तुरन्त दे दी जाय। एक ही समय में सभी से लड़ाई मोल
लेना हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।"
रात में कवि कलश, खंडो बल्लाल और येसाजी कंक राजापुर की खाड़ी के
किनारे टहल रहे थे। खाड़ी के भीतर टूटने वाली लहरों की प्रतिध्वनि सीधे कानों से
टकरा रही थी। शंभूराजा ने अपने मन की शंका को व्यक्त करते हुए कहा, "येसाजी
काका गोवा में फिरंगियों को स्थापित हुए सौ वर्ष बीत चुके हैं। इस तथ्य को नजर
अन्दाज नहीं किया जा सकता कि उनके पास तोपें और लड़ाकू जहाजें बड़ी मात्रा में
हैं। समुद्र के पानी पर हमारे घोड़ों के पाँव कैसे चल पाएँगे?" बात करते-करते
शंभूमहाराज के पैर तट की बालू में धँस गये। वे रुके और प्रसन्न होकर पूछा,
"येसाजी, कविराज खंडोजी, कोई योजना बनाकर उस फिरंगी को ही अपने घोड़ों
की टापों के पास खींच लिया जाये तो?"
464 :: सम्भाजी