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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 793 में से

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पृष्ठ 292

मेरे भोजन में विष मिलाने का जघन्य अपराध किया। वहाँ पर हमेशा राजनिष्ठा की
झूठी कसमें खाते हैं और यहाँ शहजादे के सामने विद्रोह का झंडा खडा करते हैं।
इन बुजुर्गों की क्रूरता से हम थक गये हैं। हमारी बुद्धि कुंठित हो गयी है। अब राजा
को क्या करना चाहिए। इसका निर्णय अब प्रजा को करना है।"
एक हट्टा कट्टा मूँछो वाला साठ साल का बुजुर्ग खडा होकर बोला-
"महाराज बहुत हो गया यह सब, अब आप राजा की तरह कठोर निर्णय
लीजिए।"
"उन गद्दारों का गला घोंट दीजिए।" पाँच छः जनों ने एक साथ कहा,
"महाराज, आप भूल गये क्या कि बड़े महाराज राजद्रोही गद्दारों को किस तरह
की सजा देते थे ?" एक दूसरे व्यक्ति ने कहा। "जावली के चन्द्रराव मोरे की तो
दुर्दशा की ही साथ ही उसके दो जवान बेटों को जावली से पुणे तक खींचकर ले
गये और वहाँ भरे बाजार में उनके गले काटकर गद्दारी का गला घोंटा था।" आगे
क्या करना है ? यह सर्वसम्मति से निश्चित किया गया। इस पर शम्भुराजा ने
कहा-
"इतिहास रचने वाले फर्जन्द काका को भी मैंने एक बार क्षमा कर दिया था।
मैंने सोचा कि हिरोजी बाबा पिताजी के खजाने के कौस्तुभ मणि हैं। उन्हें मैंने फिर
से समुचित सम्मान दिया। बादशाह औरंगजेब के शहजादे का स्वागत करने के लिए
लाखों मराठियों को छोड़कर मैंने उन्हें अपना वकील चुना। उन सभी बातों को
भूलकर उन्होंने ही हमारे पैर में कुल्हाड़ी मारी। अण्णाजी दत्तो के सम्बन्ध में मैं क्या
बोलूँ ? हमारे रास्ते पर विष बोने के लिए ही जैसे प्रकृति ने उनकी नियुक्ति की है।
इन सबों में मुझे केवल बालाजी चिटणीस के लिए बुरा लगता है। कौन जाने ?
उनका ईमानदार रक्त इस षड्यन्त्र में सम्मिलित न हो। मेरा मन तो बार-बार मुझसे
यही कहता है।"
"यह भी कोई बात हुई, महाराज ? इस पत्र पर बालाजी का हस्ताक्षर स्पष्ट
है।" जोत्याजी ने क्रुद्ध होकर कहा।
" और यदि वे इसमें सम्मिलित न होते तो रायगढ़ पर अपना चिटणीस का
कार्यभार छोड़कर यहाँ क्यों आते ?
" अक्षर उनके हैं। वे स्वयं अन्य गद्दारों के साथ यहाँ उपस्थित हैं। अब और
किस प्रमाण की प्रतीक्षा करनी है ?" सभी लोग बोलने लगे।
तत्काल निर्णय लेना आवश्यक था। शम्भुराजा ने कवि कलश से कहा,
"कविराज, आप मुझसे बार बार कहते हैं कि मुझे राजधर्म का पालन करना
चाहिए। चलिए हमारे हुक्म की तत्काल तामील कीजिए।"
"मतलब ?"
290 सम्भाजी