सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

पूछने लगी, "माताजी, रायगढ़ के विवाह में जाने के लिए वहाँ घोड़े सज रहे हैं।
हम लोग कब निकलेंगे?"
शम्भूराजा ने छोटी भवानी को अपने सीने से लगा लिया। अपनी रुलाई को
छिपाते और भीतर-ही-भीतर पीड़ा के घूँट पीते हुए वे बोले, "बेटी, छोटे राजा की
माता को हमारा वहाँ जाना पसन्द नहीं है।"
उन दिन पन्हाला से अनेक घोड़े सजधज कर रायगढ़ की ओर निकल गये।
यदि दूसरे लोगों को भी निमन्त्रण न आया होता तो युवराज और युवराज्ञी विवाह
समारोह के लिए रायगढ़ अवश्य चले जाते। किन्तु जानबूझकर दिखाया गया यह
सौतेला व्यवहार बड़ा विषाक्त था। उस दिन शम्भूराजा बहुत उदास दिखाई पड़ रहे
थे। नया रेशमी कुर्ता और मोतियों की माला पहने भवानी विवाह की खुशी में इधर
उधर नाचती रही और अन्ततः वैसे ही सो गयी।
येसूबाई ने संभा को सँभालने का बहुत प्रयास किया। किन्तु यदि चिन्ता का
भूत एक बार मन में प्रविष्ट हो जाता है तो निकलने का नाम ही नहीं लेता। वह
खाली बर्तन की तरह बजता ही रहता है। शम्भूराजा ने विषाद भरे स्वर में पूछा,
"येसू अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोग कैसे बदल जाते हैं? कैसे टूट जाते हैं
सारे रिश्ते?"
"और क्या स्मरण हो रहा है, युवराज?"
"हो सकता है कि ये बातें आज किसी को अच्छी भी न लगें। किन्तु इस
शम्भू के बचपन का आँगन था जीजा माता की गोद, और बचपन के चैतन्य का झूला
थीं हमारी सौतेली माता सोयराबाई। वह ममत्व वह प्रेम कहाँ चला गया सब
कुछ?"
युवराज की पीड़ा भरी स्मृतियों को सुनकर येसूबाई का भी मन व्यथित हो
गया। उन्होंने दुखी मन से कहा, "सच है, कितने बदल जाते हैं दिन?"
रात खाने को दौड़ती थी। केवल दिन में शम्भूमहाराज अपने मित्रों के साथ
पन्हाला के बाहर निकलते थे। पन्हाला के पश्चिम में तीन मील लम्बा म्हमाई का
पठार था। उस पर आठ दस छोटी बड़ी पहाड़ियों के होने के कारण भीतरी भाग
में अनेक खाइयाँ बन गयी थीं। काली चट्टानों के इन पहाड़ों की तलहटी में अनेक
छुपने लायक जगहें बन गयी थीं। इनमें हजारों की संख्या में सैनिक रहते थे। इन
सैनिकों को पन्हाला के बाहर का क्षेत्र दिखाई पड़ता था किन्तु गुफाओं की भाँति
बनी जगह बाहर के लोगों को दिखाई नहीं देती थी। शम्भूराजा इन जगहों को
'बारद्वारी' कहते थे। वहाँ पहुँचकर शम्भूराजा अपने मित्रों से अभिमानपूर्वक कहते
थे, "अपने सह्याद्रि के पहाड़ों-पत्थरों में ऐसी कितनी ही बारद्वारी खाइयाँ हैं। यह
क्षेत्र बहुत ही कठिन और अजेय है। ये हमारे पहाड़ पत्थर अपना पेट चीर कर बड़ी
सम्भाजी . 169