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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 793 में से

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पृष्ठ 121

दीदी की इस बात को सुनकर युवराज कुछ न कह सके। दिलेरखान ने
युवराज के लिए सुन्दर ऊँची हवेली, अच्छे नौकर चाकर और धन सम्पदा की
व्यवस्था कर रखी थी। शम्भुराजा की हवेली के पीछे एक नीची दीवारों वाला घर
था। पुराने दिखने वाले, पत्थरों से बने मजबूत घर में किसी राजनीतिक कैदी को बन्द
करके रखा गया था। अपनी हवेली से कभी रात में तो कभी दिन में शम्भुराजा की
नजर उस रहस्यमय घर की ओर पड़ती थी। उस घर के दरवाजे के खुलने की
आवाज न तो युवराज ने सुनी और न ही दुर्गाबाई ने। उस राजनीतिक कैदी की
अवस्था किसी बड़े पिंजड़े में बन्द पशु जैसी थी। उस कैदी के लिए दिन में दो बार
खिड़की से खाना फेंका जाता था।
कभी दिन के धुँधले प्रकाश में तो कभी रात में मोमबत्ती के हल्के प्रकाश में
उस राजनैतिक कैदी का चेहरा दिख जाता था। लगभग साठ वर्ष का, साधारण कद
काठी का, बोलती आँखों वाला वह एक मुसलमान बूढ़ा था। साधारण कैदी की
तरह किसी अँधेरी कोठरी में फेंक देने के बदले उसे राजनीतिक कैदी बनाकर उसे
इस खास घर में रखा गया था। थोड़े दिनों में शम्भुराजा को सूचना मिली कि उस
बन्दी का नाम मियाँखान है और वह अथणी का सूबेदार था।
दो महीने बीत गये फिर भी दिलेरखान की आगे की चाल समझ में नहीं आ
रही थी। शत्रु के शिविर में शम्भुराजा का दम घुटता था। बहादुरगढ़ की ज़ालिम
हवेली में उन्हें किसी प्रकार नींद नहीं आती थी। माता भवानी के नाम का गले में
बँधा ताबीज वे बार-बार अपनी आँखों पर रखते थे। अपनी जन्मभूमि की, प्रदेश
की, अपने प्रिय पिता की बहुत याद आती थी। उनकी आँखों के सामने येसूबाई की
प्रेरक पुतलियाँ बार बार दिखती थीं। युवराज का सन्ताप और मन्त्रस्त भाव की
बेचैनी देखकर दुर्गाबाई और गणूबाई की जान और भी संकट में पड़ी थी। वे युवराज
से भी अधिक जागरण करती थीं। अपने पति को मानसिक और भावनात्मक शान्ति
देने के लिए दुर्गाबाई हर सम्भव प्रयास करती थीं।
एक रात एक भयानक स्वप्न ने युवराज के हृदय को विदीर्ण कर दिया। वे
अचानक जगे और भयभीत होकर बिस्तर पर बैठ गये। आसपास के नीम के पेड़
हवा से सनसना रहे थे। दुर्गाबाई भी डरकर उठी और युवराज का मुँह देखने लगीं।
शम्भुराजा की आँखों के सामने से भीषण सपना हट नहीं रहा था। दिलेरखान द्वारा
भेंट किया गया सजा सजाया हाथी पागल हो गया था। उसके खम्भे जैसे पैर
शम्भुराजा के शरीर के चिथड़े चिथड़े कर रहे थे। युवराज का पूरा शरीर खून से
लथपथ हो गया था।
सम्भाजी 119