चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३
वचोमूत्रानिलकृतान्विबन्धानग्निमार्दवम् ॥ १५२ ॥
कासं गुल्ममुदावर्त्तं फलारिष्टो व्यपोहति ।
अग्निसन्दीपनो ह्येष कृष्णात्रेयेण भाषितः ॥ १५३ ॥
इति फलारिष्टः ।
( ३८ ) फलारिष्ट—गुठलीरहित हरड़ १ प्रस्थ, गुठलीरहित आवले
१ प्रस्थ, विशाला ( इन्द्रवारुणा ), कपित्थ ( कैथ ), पाठा और चित्रक-
मूल प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब वस्तुओ को कूट कर दो द्रोण पानी मे
क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़
१०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिन तक रख देना चाहिये ।
इसके पीछे ग्रहणी, अर्शारोग, हृदय, पाण्डुरोग, प्लीहा, कामला, विषम ज्वर,
मल-मूत्र वायुजन्य विबन्धो मे, अग्निमान्द्य मे, कास, गुल्म और उदावर्त्त मे
पीना चाहिये । यह फलारिष्ट अग्नि-सन्दीपक है । इसका कृष्णात्रेय ने
उपदेश किया है ॥ १४६-१५३ ॥
दुरालभायाः प्रस्थः स्याच्चित्रकस्य वृषस्य च ।
पथ्यामलकयोश्चैव पाठाया नागरस्य च ॥ १५४ ॥
दन्त्याश्च द्विपलान् भागाञ्जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादावशेषे पूते च सुशीते शर्कराशतम् ॥ १५५ ॥
दत्त्वा कुम्भे दृढे स्थाप्यं मासार्धं घृतभाजने ।
प्रलिप्ते पिप्पलीचव्यप्रियङ्गुक्षौद्रसर्पिषा ॥ १५६ ॥
तस्य मात्रा पिवेत्काले शार्करास्य यथाबलम् ।
अर्शांसि ग्रहणीदोषमुदावर्त्तमरोचकम् ॥ १५७॥
शकृन्मूत्रानिलोद्गारविबन्धानग्निमार्दवम् ।
हृद्रोग पाण्डुरोग च सर्वमेतेन साधयेत् ॥ १५८ ॥
इति शर्करासवः ।
( ३६ ) शर्करारिष्ट—दुरलभा १ प्रस्थ, चीता, बासा, हरड़, आवला,
पाठा, सोठ, दन्तीमूल प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ
करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल
मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिनो तक रख देना चाहिये । घड़े को
पिप्पली, चव्य, प्रियगु, मधु और घी के कल्क से प्रथम लेप कर देना चाहिये ।
पीछे तैय्यार होने पर बल और मात्रानुसार इसको पीना चाहिये, इसको प्रति-
दिन प्रातः पीना चाहिये । यह अर्श, ग्रहणी, उदावर्त्त, अरुचि, मल-मूत्र और