चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ५६१
बिल्वनागरयुक्तं वा यवान्या चित्रकेण च ॥ ७१ ॥
चित्रकं हपुषा हिङ्गु दद्याद्वा तक्रसंयुतम् ।
पञ्चकोलयुतं वाऽपि तक्रमस्मै प्रदापयेत् ॥ ७२ ॥
( ६ ) दशयोग—( १ ) गोमूत्र मे रखी हुई हरड को गुड़ के साथ देना
चाहिये । ( २ ) तक्र के साथ हरड का अथवा तक्र के साथ त्रिफला का प्रयोग
करना चाहिये । (३) सोंठ ओर चीते के चूर्ण को सीधु के साथ पीना चाहिये ।
(४) जीरा, चीता ओर चव्य के साथ सीधु देना चाहिये । (५) पाठा और हऊ-
बेर को संचल नमक के साथ देना चाहिये । (६) दवित्थ (कैथ) को बेलगिरी
के साथ अथवा कैथ को चव्य और चित्रक के चूर्ण के साथ देना चाहिये ।
(७) भिलावे के चूर्ण को सक्तु मन्थ में मिलाकर तक्र के साथ देना चाहिये ।
(८) बेलगिरी, चीता, सोंठ और अजवायन के साथ तक्र तर्पण देना चाहिये ।
(६) चीता, हऊबेर, हींग इनको तक्र के साथ देना चाहिये । (१०) पंचकोल
(पिप्ली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक ओर सोंठ) को तक्र के साथ देना
चाहिये ॥ ६८-७२ ॥
हपुषा कुञ्चिका धान्यमजाजी कारवी शटीम् ।
पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ७३ ॥
यवानी चाजमोदा च चूर्णितं तक्रसंयुतम् ।
मन्दाम्लकटुकं विद्वान् स्थापयेद् घृतभाजने ॥ ७४ ॥
व्यक्ताम्लकटुकं जातं तक्रारिष्ट मुखप्रियम् ।
प्रपिबेन्मात्रया कालेष्वन्नस्य तृषितस्त्रिषु ॥ ७५ ॥
दीपन रोचनं वर्ण्य कफवातानुलोमनम् ।
गुदश्वयथुकण्ड्वर्तिनाशनं बलवर्धनम् ॥ ७६ ॥
इति तक्रारिष्टः ।
( १० ) तक्रारिष्ट—हऊबेर, कुञ्चिका ( काला जीरा ), धनिया, अजाजी
( जीरा ), कारवी ( क्षुद्र जीरा ), कचूर, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चीता, गज-
पिप्पली, अजवायन, अजमोद इन बारह वस्तुओं को परस्पर समान भाग लेकर
चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण का मन्द, अम्ल और कटु-रस तक्र मे मिला
कर घी से भावित घड़े मे रख देना चाहिये । इसमे जब अम्लता और कटुरस
स्पष्ट दीखने लगे, तब मुख को प्रिय, ऐसा यह तक्रारिष्ट पीना चाहिये । यह
अरिष्ट मुखप्रिय, अग्निप्रदीपक, अन्न मे रुचिकारक, वर्ण्य, कफ और वायु
का अनुलोमक, गुदा मे शोथ, कण्डू, पीडा का नाशक, बलवर्धक है । इस