चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४७
इसी प्रकार से अन्य सहज रोगो के भी ये ही दो कारण है। इनमे गर्भ-शरीर के
साथ उत्पन्न सहज-अर्श अधिमास के ही विकार हैं। इनको अधिमास विकार
ही समझना चाहिये । [ किसी स्थान पर अधिक मास का उठ आना 'अधिमास'
विकार कहाता है, यह भी एक प्रकार का रोग है ] ॥५॥
सर्वेषां चार्शसां क्षेत्रं—गुदस्यार्धपञ्चमाङ्गुलेऽवकाशे त्रिभागान्त-
रास्तिस्रो गुदवलयः, क्षेत्रमिति देशः।
स्थान—दानो प्रकार के अशों का स्थान गुदा के मुख से लेकर साढे पाच
अगुल गुदाभाग है। इस गुदा भाग के तीन विभाग है। इसमे तीन वलिया
(चक्र) है। (१) प्रवाहिणी, (२) विसर्जनी और (३) सवरणी १। ये तीनो
वलिया दोनो प्रकार के अर्श रोगो का उत्पत्ति स्थान है। [ ये वली या चक्र
डेढ २ अगुल चौड़ी ओर एक अगुल उभार की चार अगुल भर हाती हैं ।]
केचित्तु भूयांसमेव देशमुपदिशन्त्यर्शसां शिश्ममपत्यपथं गलमुख-
नासिकाकर्णाक्षिवर्त्मानि त्वक् च।
कई आचार्य इससे भी अधिक स्थानों को अर्श का स्थान मानते है।
जैसे—अपत्य-पथ (योनिमार्ग) लिग (इन्द्रिय), गला, तालु, मुख, नाक,
कान, आख इनके मार्ग और त्वचा इन स्थानो मे भी अर्शरोग होता है।
तदस्रत्यधिमांसदेशतया, गुदवलिजाना त्वर्शासीति संज्ञा तन्त्रेऽस्मिन् ।
सर्वेषा चार्शसामधिष्ठानं मेदो मांसं त्वक् च ॥ ६ ॥
ये सब स्थान अधिमास के रोग है, इस शास्त्र मे गुदा की वलियो मे
उत्पन्न अशो की ही 'अर्श' सज्ञा है। सब प्रकार के अर्श-रोगो का आश्रय-स्थान
मेद मास और त्वचा है ॥ ६॥
तत्र सहजान्यर्शांसि कानिचिदणूनि कानिचिन्महान्ति कानिचिद्दी-
र्घाणि कानिचिद् ह्रस्वानि कानिचिद् वृत्तानि कानिचिद्विषमविस्तृतानि
कानिचिदन्तःकुटिलानि कानिचिद् बहिःकुटिलानि कानिचिज्जटिलानि
कानिचिदन्तर्मुखानि यथास्वं दोषानुबन्धवर्णानि ॥ ७ ॥
सहज अर्श—कोई तो अति सूक्ष्म, कोई बड़े, कोई लम्बे, कोई छोटे, कोई
गोल, कोई विषम रूप मे, फैले, कोई अन्दर से टेढे, कोई बाहर से टेढे, कोई
जटिल (गुथे हुए), कोई अन्दर की ओर मुख किये हुए तथा दोषानुसार
वर्ण वाले होते है ॥ ७ ॥
१ सुश्रुत मे कहा है—तत्र स्थूलान्त्रप्रतिविद्धमर्धपंचामुल गुदमाहुः। तस्मि-
न्वलयस्तिस्रः, अध्यर्धांगुलसम्मितः । प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणी चेति ।
चतुरंगुलमिताः सर्वास्तिर्यगेकागुलोच्छ्रिताः। सु० नि० २।