चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] शारीरस्थानम् ३७
जाता है ] । आकृति, बुद्धि और मन में जो भिन्नता होती है, वहा पर बलवान्
रज, तम तथा पूर्वकर्म कारण होते हैं ॥ ३६ ॥
अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः ।
न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः ॥ ३७ ॥
रजस्तमोभ्यां तु मनोऽनुबद्ध ज्ञानं बिना तत्र हि सर्वदोषाः ।
गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्त मनः सदोष बलवच्च कर्म ॥ ३८ ॥
अतीन्द्रिय, अति सूक्ष्म रूपवाले वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चार
सूक्ष्म भूतो से आत्मा कभी भी वियुक्त नहीं होता । न कर्मों से, न मन मे, न
बुद्धि एव अहंकार इन दोषों से भी कभी वह मुक्त होता है, प्रत्युत वह इन मे
सदा सम्बद्ध रहता है । मन अर्थात् सत्त्व बलवान् रज तथा तम से सम्बद्ध होता
है । तब तत्त्वज्ञान के बिना मन में सब दोष रहते हैं । दोषयुक्त मन और
पूर्वजन्मों के बलवान् कर्म ही अन्य देह में जाने तथा धर्माधर्म क्रिया में प्रवृत्ति
के कारण हैं ॥ ३७-३८ ॥
रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च कि निमित्तम् ।
शरीरसत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः ॥ ३६ ॥
प्रश्न-(१) रोग किस कारण से उत्पन्न होते हैं ? (२) इन रोगों की शान्ति
का उपाय क्या है ? (३) हर्ष का क्या कारण है ? (४) शोक का क्या कारण
है ? (५) शरीर और मन से उत्पन्न विकार क्यों कर पूर्ण रूप से नष्ट नहीं
होते ? (६) वे फिर क्यों हो जाते हैं ॥ ३६ ॥
प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः ।
सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः ॥४०॥
धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति ।
शरीरसत्त्वप्रभवास्तु दोषास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूय ॥ ४१ ॥
रूपस्य सत्त्वस्य च संततिर्या नोक्तस्तदादिर्न हि सोऽस्ति कश्चित् ।
तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥ ४२ ॥
सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् ।
जितेन्द्रियं नानुतरन्ति रोगास्तत्कालयुक्त यदि नास्ति दैवम् ॥४३॥
उत्तर—रोगों का प्रथम कारण प्रज्ञापराध, दूसरा कारण अतियोग, अयोग
और मिथ्यायोग से इन्द्रियो के विषयों का उपभाग, तीसरा कारण परिणाम
( काल ) है । सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों की शान्ति तीन
प्रकार से होती है । समयोग से, ज्ञान, अर्थ ( इन्द्रियों के विषय ) और काल इन
तीन का उपयोग करने से । और धार्मिक क्रियायें हर्ष का कारण कही गयी हैं ।