चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३२ चरकसंहिता [ अ० १३
(१) पञ्चकोल घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ तथा
यवक्षार प्रत्येक एक-एक पल, मिलित छः पल, दशमूल का क्वाथ ५० पल
(वृद्ध वाग्भट के वचन से ६४ पल), दधि का मण्ड (मस्तु) भाग
१ आढक (६४ पल), इनके साथ एक प्रस्थ घी सिद्ध करे। यह घृत उदर
रोग, शोथ, वातारोध, गुल्म और अर्श को नष्ट करता है१ ॥ १११-११३ ॥
नागरत्रिफलाप्रस्थं घृतं तैलं तथाऽऽढकम् ।
मस्तुनः साधयित्वैतत्पिबेत्सवोदरापहम् ॥ ११४ ॥
कफमारुतसंभूते गुल्मे चैतत्प्रशस्यते ।
इति नागरघृतम् ।
(२) नागराद्य घृत—सोंठ और त्रिफला प्रत्येक एक-एक प्रस्थ, घी और
तैल मिलित यमक एक आढक, मस्तु एक आढक इनको मिला कर घृत सिद्ध
करे। यह घृत सब उदर रोगों को नष्ट करता है। कफ और वायु से उत्पन्न
गुल्म-रोग में भी यह घृत उत्तम है ॥ ११४ ॥
चतुर्गुणे जले मूत्रे द्विगुणे चित्रकात्पले ॥ ११५ ॥
कल्के सिद्धं घृतप्रस्थं सक्षारं जठरी पिबेत् ।
इति चित्रकघृतम् ।
(३) चित्रक घृत—घी एक प्रस्थ, जल चार प्रस्थ, गोमूत्र दो प्रस्थ,
चित्रक का कल्क १ पल, यवक्षार १ पल मिला कर घृत सिद्ध करे। इस घृत
का उदर-रोगी पान करे ॥ ११५ ॥
यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलरसेन च ॥ ११६ ॥
सुरासौवीरकाभ्यां च सिद्धं वापि पिबेद् घृतम् ।
इति यवाद्यं घृतम् ।
(४) यवाद्य-घृत—घृत एक सेर, जौं, बेर और कुलत्थी का क्वाथ ४ सेर,
बिल्वादि पञ्चमूल का क्वाथ ४ सेर, सुरा ४ सेर, सावारक (काजी) ४ सेर
लेकर घृत सिद्ध करे यह घृत उदर रोग नाशक है।
उपरोक्त घृतों से जब उदर रोगी स्निग्ध हो जाये, शरीर में बल आ जाये
और वायु शान्त हो जाये तो दोष समूह के स्नेह से शिथिल होने पर कल्पस्थान
में वर्णित विरेचन देने चाहिये ॥ ११६ ॥
१. वाग्भट मे पाठ इस प्रकार से है—'यावशूकपञ्चकोलषट्पलेन वा मस्तु
दशमूलक्वाथाढकद्वयेन च सिद्ध सर्पिःप्रस्थ प्रयोजयेत्।' चक्रपाणि के मत से घी
दो प्रस्थ लेना चाहिये। वह 'द्वि' शब्द की योजना दोनों ओर करते हैं।