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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 616 में से

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पृष्ठ 48

अ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३


वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः ।
इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥
जिस समय स्त्री पुरुष के बीज (शुक्र और आर्त्तव) समान भाग हों,
अथवा जब बीज किसी दोष के प्रकोप के कारण दुष्ट होता है, तब स्त्री-पुरुषों
के लक्षणों वाला 'द्विरेत' (नपुंसक) उत्पन्न होता है । वायु शुक्राशय को नष्ट
करके गर्भाशय में स्थित गर्भ को 'पवनेन्द्रिय' वाला बना देता है । वायु
शुक्राशय-द्वार को खोलकर संस्कारवाही षण्ड करता है । जिस समय स्त्री प्रथम
सन्तुष्ट हो जाती है, तब पीछे पुरुष का उत्सृष्ट शुक्र हर्ष के कारण मन के
अस्थिर होने से, स्त्री की वायु को चंचल कर देता है । साथ में पुरुष के
शुक्रवाहक स्रोत भी पुष्ट हो जाते हैं, तब वातेन्द्रिय पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्री
के साथ सम्भोग करने पर शुक्र की भांति वायु ही आता है और जब यह वायु
इस पुरुष के शुक्रवाही स्रोतो को नष्ट न करके केवल मुखों को बन्द कर देता
है तब संस्कारवाही नपुंसक उत्पन्न होता है । संस्कार से (वाजीकरण, बस्ति,
खान पान से) वह प्रवृत्त होता है । मन्द एव अल्प बीज वाले निर्बल एवं
अल्प कामेच्छा वाले स्त्री-पुरुष नरषण्ड एव नारीषण्ड की उत्पत्ति मे कारण
होते हैं । माता और पिता के मैथुन के प्रतिघात होने से (अनुचित रीति से
सम्भोग करने पर) तथा बीज की निर्बलता से वक्रध्वज (टेढ़ी इन्द्रिय वाला)
नपुंसक उत्पन्न होता है । ईर्ष्या से युक्त मन्द कामेच्छा वाले स्त्री पुरुष 'ईर्ष्या से
रति करने वाले नपुंसक' का कारण है । जिस समय अल्पबल वाला पुरुष
अल्प कामेच्छा या द्वेषवाली स्त्री के साथ काम-उद्वेग के कारण सम्भोग करता
है, तब नरषण्ड उत्पन्न होता है । वह ईर्ष्या-रति नामक नपुंसक दूसरों को रति
करते देख कर रति मे प्रवृत्त होता है, इसलिये इसे 'ईर्ष्याण्ड' कहते हैं । जिस
पुरुष के गर्भ में वायु और अग्नि दोष के कारण वृषण नाश हो जाते हैं, उसे
'वातिक षण्ड' कहते है । गर्भ को ये आठ द्विरेत आदि विकृतिया आठ
षण्डयोनिया कर्म की विचित्रता से होती है ॥ १८-२१ ॥
गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्री-पुं-नपुंसामुदरस्थितानाम् ।
किं लक्षणं कारणमिष्यते किं सरूपतां यन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥
प्रश्न—गर्भाशय मे तत्काल गर्भ स्थिर होने क क्या लक्षण है ? उदर में
स्थित स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं ? और किस कारण से संतान
में माता पिता का समान रूप आता है ? ॥ २२ ॥
निष्ठिवीका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदयव्यथा च ।
तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥२३॥