चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३६
मांसादमांसरसैः सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ॥ १६७ ॥
सक्षौद्रं पयसा सिद्धं सर्पिर्दशगुणेन वा ।
घृत-सेवन—मासभोजी मनुष्य पशु-पक्षियो के मास रस [ घी से चौगुना ]
से सिद्ध घृत का उपयोग करे और जो मासभोजी न हो वह घी से दश गुणे
गाय के दूध मे घी का सिद्ध करके शहद के साथ खाये ॥१६७॥
सिद्धं मधुरकैर्द्रव्यैर्दशमूलकषायकैः ॥ १६८ ॥
क्षीरमांसरसोपेतै 'घृत शोषहरं परम् ।
( १ ) दशमूलादि घृत—गाय का घृत २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, मांसरस
८ प्रस्थ, दशमूल क्वाथ ८ प्रस्थ, जीवनीय गण आदि मधुर द्रव्य मिलित १
शराव, इनसे यथाविधि घी पकावे, यह अति शोषनाशक हे ॥१६८॥
पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-नागरैः ॥ १६६ ॥
सयावशूकैः सक्षीरैः स्रोतसा शोधनं घृतम् ।
( २ ) पञ्चकालादि घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ,
यवक्षार मिलित १ शराव इनका कल्क, घी २ प्रस्थ, दूध ८ प्रस्थ लेकर घृतपाक
करना चाहिये । यह घृत स्रोतो का शोधक है ॥ १६६ ॥
रास्ना-बला-गोक्षुरक-स्थिरा-वर्षाभु-साधितम् ॥ १७० ॥
जीवन्तीपिप्पलीगर्भं सक्षीरं शोषनुद् घृतम् ।
( ३ ) रास्नादि घृत—रास्ना, बला, गोखरु, सालपर्णी, पुनर्नवा, इनके
क्वाथ मे, जीवन्ती और पिप्पली इनका कल्क, दूध मिलाकर घृत सिद्ध कर लेवे ।
यह घी शोष को नष्ट करता है ॥१७०॥
यवाग्वा वा पिबेन्मात्रा लिह्याद्वा मधुना सह ॥ १७१ ॥
सिद्धाना सर्पिषामेषामद्यादन्नेन वा सह ।
शुष्यतामेष निर्दिष्टो विधिराभ्यवहारिकः ॥ १७२ ॥
सेवन विधि—इन घृतो को यवागुओ के साथ मिलाकर पीना चाहिये,
अथवा शहद के साथ चाटे अथवा इन घृतो को अन्न के साथ खावे । शोष-
रोगियो के लिये यह अन्न-पान विधि कह दी है ॥ १७१-१७२ ॥
बहिःस्पर्शनमाश्रित्य वक्ष्यतेऽतः परं विधिः ।
स्नेहक्षीराम्बुकोष्ठे त स्वभ्यक्तमवगाहयेत् ॥ १७३ ॥
स्रोतोविवन्धमोक्षार्थं बलपुष्ट्यर्थमेव च ।
१. 'रसोपेतं' इति च ।