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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 616 में से

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पृष्ठ 410

४२६ चरकसंहिता [ अ० ८
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( खीर अथवा मावे के रूप मे ) द्वारा सकर-स्वेद की विधि से, पार्श्व, कण्ठ,
छाती और शिर पर स्वेद दे । ( २ ) वातहर पत्तो से अथवा खरैटी, गिलोय,
मुलहठी, इनसे साधित सुहाते गरम क्वाथ से शिर का परिषेचन करे । (३) बकरे
वा मछली के सिर के क्वाथो से नाडीस्वेद द्वारा अथवा वातनाशक द्रव्यो से
साधित क्वाथो से नाडी स्वेद विधि द्वारा कण्ठ सिर और पार्श्वों मे स्वेदन करे ।
[ वातहर औषधिया—बिल्व, अग्निमन्य, काश्मर्य, श्रेयसी, पाटला, बला, शाल-
पर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, एरण्ड और मूलक । ] ( ४ ) औदक या
आनूप पशु-पक्षियो के मास से अथवा पचमूल क्वाथ से या काजी मे घी, तैल,
वसा आदि स्नेह मिलाकर नाड़ीस्वेद दे । ( ५ ) जिनके सिर, पार्श्व और कन्धी
मे शूल होता हो उनके लिये १—जीवन्ती, सोया, बला, मुलहठी २—वचा,
वेशवार, विदारी, मूली, ३—औदक मास, ४—आनूप मास इनसे पृथक् २
सस्कृत उपनाह लगावे । [ अस्थि से रहित पिसा मास सिजाकर काली मरिच
मिलाकर तैयार किया 'वेशवार' कहाता है । ] ( ६ ) शिर, पार्श्व और कन्धी
के शूल मे–सोया, मुलहठी, कूठ, तगर, चन्दन इनको घी मे मिला कर
लेप करे ॥ ७१-७७ ॥
बला रास्ना तिलाः सर्पिर्मधुकं नीलमुत्पलम् ।
पलङ्कषा देवदारु चन्दनं केशरं घृतम् ॥ ७८ ॥
वीरा बला विदारी च कृष्णगन्धा पुनर्नवा ।
शतावरी पयस्या च कत्तृणं मधुकं घृतम् ॥ ७९ ॥
चत्वार एते श्लोकार्थैः प्रदेहाः परिकीर्तिताः ।
( ७ ) प्रदेह—१—जिन यक्ष्मा के रोगियो मे द्वन्द्व दोष के कारण शिर,
स्कन्ध और पार्श्व मे वेदना होती हो, उनके लिये आधे २ श्लोक मे समाप्त होने
वाले निम्न लिखित प्रदेहो का लेप करना चाहिये । यथा—१—खरैटी, रास्ना,
तिल, घी, मुलहठी, नीलाकमल, २–गुग्गुल, देवदारु, चन्दन, केशर ( अथवा
नागकेसर ) और घी, ३–क्षीरकाकोली, बला, विदारी, लाल सहजन, पुनर्नवा,
४–शतावरी, क्षीरकाकोली ( अथवा विदारीकन्द ), कत्तृण, मुलहठी और घी
इनका लेप करे ॥ ७८–७९ ॥
शस्ताः संसृष्टदोषाणा शिरःपार्श्वांसशूलिनाम् ॥ ८० ॥
नावनं धूमपानानि स्नेहाश्चोत्तरभक्तिकाः ।
तैलान्यभ्यङ्गयोगानि बस्तिकर्म तथा परम् ॥ ८१ ॥
जलौकालाबुशृङ्गैर्वा प्रदुष्टं व्यधनेन वा ।
शिरःपार्श्वांसशूलेषु रुधिरं तस्य निर्हरेत् ॥ ८२ ॥