चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] २१ चिकित्सितस्थानम् ३२१
स्निग्धोष्णैरनुपानैश्च शमयेद्विपमज्वरम् ।
विरेचनेन पयसा सर्पिषा संस्कृतेन च ॥ २९४ ॥
विषमं तिक्तशीतैश्च ज्वरं पित्तोत्तरं जयेत् ।
वमनं पाचनं रूक्षमन्नपानं विलङ्घनम् ॥ २९५ ॥
कषायोष्णं व विषमे ज्वरे शस्तं कफोत्तरे ।
सन्निपात ज्वर के अन्त मे कान की जड़ मे ( कान मे भी ) दुःख-दायक
शोथ उत्पन्न हो जाता है। इस रोग से काई भला ही बचता है, प्रायः करके यह
रोग होता १है। इसके लिये जोक आदि द्वारा रक्त का मोक्षण और घृतपान
शीघ्रता से ( रोग के प्रारम्भ मे ही ) करे और कफपित्त नाशक नावन ( नस्य )
और कवल देवे ।
( १ ) जिस पुरुष का ज्वर शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष क्रिया से शान्त
नही होता है, उस मे दोष-एव ज्वर रक्त-धातु मे आश्रित होता है। अतः वह
ज्वर रक्त मोक्षण से शान्त हो जाता है ।
( २ ) वीसर्प के कारण, चोट लगने से अथवा विस्फोटको के कारण यदि
ज्वर उत्पन्न हो जाय, परन्तु कफ-पित्त प्रधान न हो तो प्रथम घृत-पान करावे ।
( ३ ) शरीर के धातुओ की निर्बलता से भी जीर्णज्वर बार बार लौट आता है।
इसके लिये बलकारक बृंहण ( पुष्टि-दायक ) आहार देवे । ( ४ ) तृतीयक और
चतुर्थक ज्वर मे साधारण चिकित्सा करे। प्राय. विषम ज्वर मे आगन्तुज कारण
का सम्बन्ध रहता है। [ यहा तृतीयक और चतुर्थक भी विषमज्वर ही ग्रहण
किये जाते है। इसलिये भूत आदि दोष उत्पत्ति मे कारण हों तो भी साधारण
चिकित्सा ही करे अर्थात् दैवव्यपाश्रय हो तो बलि-मगल आदि रूप चिकित्सा
और युक्ति-व्यपाश्रय हो तो दोषानुरूप कषाय-पान आदि चिकित्सा करनी उचित
है। ( चक्र० ) ] [ ( ५ ) वातप्रधान विषम ज्वर मे—स्निग्ध उष्ण अनुपानो से
घृतयुक्त अनुवासन-बस्तियो से चिकित्सा करे। ( ६ ) पित्तप्रधान ज्वर मे-विरे-
चन, तिक्त, शीत द्रव्यो से सस्कृत दूध और घी से चिकित्सा करे। ( ७ ) कफ-
प्रधान विषम ज्वर मे—वमन, पाचन, रूखा खानपान, लङ्घन, कषाय और
उष्ण द्रव्य देवे ।। २८७-२९५ ।।
१ ज्वर के आदि मे कान के मूल मे हुआ शोथ साध्य होता है, ज्वर के
मध्य मे शोथ हुआ कष्टसाध्य होता है और ज्वर के अन्त मे हुआ असाध्य
होता है। कान के मूल मे पित्त एकत्र होकर शोथ उत्पन्न करता है। वह शोथ
दुःसाध्य होता है, प्रायः रोगी को मार देता है।