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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 616 में से

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पृष्ठ 330

३१६ चरकसंहिता [ अ० ३
रुणार्क-चिरिबिल्वातिबिल्वक-शटीपुष्कर-मूलगण्डीरोरुबूक-पत्तूराक्षीवा-
श्मान्तक-शिग्रु-मातुलुङ्ग-मूलक-मूलपर्णी-पीलुपर्णी-तिलपर्णी-मोरटा-
मेषशृङ्गी-हिंस्त्रा-दन्त-शठैरावतक-भल्लातका-स्फोट-कण्डीरात्मजा-काका-
ण्डैकैषीका-करञ्ज-धान्यकाजमोद-पृथ्वीका-सुमुख-सुरस-कुठेरक-काण्डीर-
कालसाल्क-पर्णास-क्षवक-फणिज्झक-भूस्तृण-शृङ्गवेर-पिप्पली-सर्पपाश्वग-
न्धा-रास्नारुहावरोहा-वचा-बलातिबला-गुडूच्य-शतपुष्पा-शीतवती-नाकु-
ली-गन्धनाकुली-श्वेता-ज्योतिष्मती-चित्रकाव्यण्डाम्ल-चाङ्गेरी-बदर-कुल-
त्थ-माषाणामेव विधानामन्येषां चोष्णवीर्याणां यथालाभमौषधानां कषायं
कारयेत्। तेन कषायेण तेषामेव च कल्केन सुरा-सौवीरक-तुषोदक-
मैरेय-मेदक-डाम्यमण्डारनाल-कट्वर-प्रतिविनीतेन तैलपात्रं विपाचयेत्,
तेन सुखोष्णेन तैलेनोष्णाभिप्रायिणं ज्वरितमभ्यञ्ज्यात्, तथा शीतज्वरः
प्रशाम्यति । तैरेव चौषधैः श्लक्ष्णपिष्टैः सुखोष्णैः प्रदेहं कारयेत्, एतेषा-
मेव च सुखोष्णमुत्क्वाथमवगाहनपरिषेकार्थं प्रयुञ्जीत ज्वरप्रशमार्थ-
मिति ॥ २६७ ॥
इति शीतज्वरेऽगुर्वाद्यन्तैलम् ।
जिस ज्वर के रोगी उष्ण प्रलेप आदि की इच्छा करते हैं, उनके लिये
अभ्यङ्ग आदि का उपदेश करे । यथा—अगुरु, कुष्ठ, तगर, तेजपत्र, नलद
( बालछड ), गैलेय (छैलछरीला ), व्यामक ( तृणविशेष ) हरेणु, ( रेणुका ),
स्थौणेय (सुगन्धित द्रव्य गठिवन ), क्षेमिक ( चोरक ), एला ( इलायची ),
वरा ( त्रिफला ), वरांगदल ( दालचीनी की छाल अथवा प्रियंगुपत्र ), पुर
( गुग्गुलु ), तमालपत्र, भूतीक (तृणविशेष), राहिय (तृणविशेष ), सरल
( चीड ), शल्लकी (सर्जभेद ), देवदारु, अनिमन्य ( अरणी ), बेलगिरी,
स्योनाक (सोना पाठा), काश्मरी (गम्भारी), पाटला (पाढल), श्वेत पुनर्नवा,
लाल पुनर्नवा, छोटी कटेरी, बडी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माप-
पर्णी, गोखरू, एरण्ड, सहजना, वरना आक, करञ्ज ( नाटा ), तिल्वक (लोध),
कचूर, पोहकरमूल, भाण्डीर ( भाट ), उरुवक ( लाल एरण्ड ), पत्तूरा ( राज
गरी ), अक्षीव ( महानिम्ब ), अश्मान्तक, शिग्रु ( कडुआ सहजन ), बिजौरा,
मूलपर्णी, पीलुपर्णी, ( बिम्बी, मूर्वा भेद ), तिलपर्णी ( तलवणो या हुलहुल ),
मेढाशृङ्गी, हिंस्त्रा ( मासी, कथार ), दन्तशठ ( गलगल ), ऐरावतक (नारंगी),
भिलावा, आस्फोटक ( हरफा रेवड़ी ), कण्डीर ( जंगली करेली ), आत्मज
( पुत्रजरा ), काकाण्ड ( कौंच ), एकैषिका ( त्रिवृता या पाठा ), करजुआ,