चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] २ शारीरस्थानम् १७
वैद्य जिस युक्ति से अतीत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालो के रोगों
की चिकित्सा करता है वह युक्ति सुनो। वही शिर का दर्द फिर आ गया, वही
ज्वर फिर हो गया, वह खासी फिर जोर पकड़ गई, वह वमन फिर होने लगा,
इन लोक प्रसिद्ध वचनों मे अतीत वेदना का पुनः आना सिद्ध है। अतीत
अर्थात् लुप्त हुए, रोगों का समय फिर आ गया। इस रोग के समय को लक्ष्य
मे रख कर जो औषध दी जाती है, वह अतीत वेदनाओं की शान्ति के लिये है
ऐसा कहा जाता है। जैस—जिस पानी की बाढ़ से धान का पहले नाश हुआ
है, वह फिर आ जाती है। वह बाढ़ न आये, अतः उसको रोकने के लिये बाध
बाधा जाता है, उसी प्रकार शरीर में वेदना नाशक प्रतिकर्म अर्थात् चिकित्सा
की जाती है। शरीर मे उत्पन्न होने वाले रोगों के पूर्वरूप को देख कर इनको
शान्त करने के लिये जो कर्म किया जाता है, वह भविष्य के रोगों को नाश
करता है। इससे एक के पीछे आने वाला अन्य रोग छूट जाता है, सुख के
कारण का उपाय करने से सुख भी हो जाता है ॥ १८६-६२ ॥
न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समता न च ।
हेतुभिः सदृशा नित्य जायन्ते देहधातवः ॥ ६३ ॥
युक्तिमेता पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदना भिषक् ।
हन्तीत्युक्त्वा चिकित्सा तु नैष्ठिकी या विनोपधाम् ॥ ६४ ॥
जो धातु समानावस्था में हैं, वे विषम नही बनते और जो विषम हैं, वे
स्वय समान नही होते। शरीर के धातु सदा हेतु के समान हो जाते हैं। हेतु के
विषम होने से विषम और हेतु के सम होने से सम हो जाते हैं। इस युक्ति से
वैद्य अतीत, वर्त्तमान और भविष्य तीनों कालों की वेदनाओं का नाश करता
है। उपधारहित अर्थात् दोषरहित चिकित्सा ही दुःख का सम्पूर्ण रूप से नाश
करने वाली है १ ॥ ६३-६४ ॥
उपधा हि परो हेतुर्दुःखदुःखाश्रयप्रदः ।
त्याग सर्वोपधाना च सर्वदुःखव्यपोहकः ॥ ६५ ॥
कोषकारो यथा ह्यंशून्पादत्ते वधप्रदान् ।
उपादत्ते तथाऽर्थेभ्यस्तृष्णामज्ञः सदातुरः ॥ ६६ ॥
यस्त्वग्निकल्पानर्थान् ज्ञो ज्ञात्वा तेभ्यो निवर्त्तते ।
अनारम्भादसयोगात्तं दुःखं नोपतिष्ठते ॥ ६७ ॥
१ उपधा — 'भावदोष उपधा । अदोषोऽनुपधा ।' वै० द० । १ । ४ ।
अश्रद्धामदमानासूयाप्रभृतिर्मानसदोष उपधा ॥