चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० चरकसंहिता [ अ० ३
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क्रियाभिराभिः प्रशमं न प्रयाति यदा ज्वरः ।
अक्षीणबलमांसाग्नेः शमयेत्तं विरेचनैः ॥ १६९ ॥
यदि उपरोक्त क्रियाओ से ज्वर शान्त न हो ओर रोगी का बल और अग्नि
क्षीण न हुए हो तो विरेचन द्वारा ज्वर को शान्त करना चाहिये ॥ १६९ ॥
ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम् ।
कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥ १७० ॥
ज्वर के कारण क्षीण हुए व्यक्ति को वमन या विरेचन देना हितकारी नही
है । यदि अभीष्ट हो तो दूध के द्वारा अथवा निरूह बस्तियो द्वारा मल को
निकालना चाहिये ॥ १७० ॥
निरूहो बलमग्निं च विज्वरत्वं मुदं रुचिम् ।
परिपक्वेषु दोषेषु प्रयुक्तः शीघ्रमावहेत् ॥ १७१ ॥
ज्वर मे दोषो के परिपक्व होने पर दिया हुआ निरूह बल ( शक्ति ) और
अग्नि को बढाता है, ज्वर को हटाता है, प्रसन्नता उत्पन्न करता है, भोजन मे
रुचि उत्पन्न करता है ॥ १७१ ॥
पित्तं वा कफपित्तं वा पित्ताशयगतं हरेत् ।
स्रसनं, त्रीन्मलान् बस्तिर्हरेत्पक्वाशयस्थितान् ॥ १७२ ॥
स्रसन ( विरेचन ) पित्ताशय ओर ग्रहणी मे स्थित पित्त और कफपित्त
का ही निकालता है । परन्तु वस्ति पक्वाशय ( बृहदन्त्र ) मे स्थित वात, पित्त,
कफ तीनो मलो को बाहर निकालती है ॥ १७२ ॥
ज्वरे पुराणो संक्षीणे कफपित्ते दृढाग्नये ।
रूक्षबद्धपुरीषाय प्रदद्यादनुवासनम् ॥ १७३ ॥
पुराने ज्वर मे कफ पित्त के क्षीण होने पर, मल के कठोर तथा रूक्ष होने
पर यदि रोगी की अग्नि प्रबल हो तो अनुवासन ( स्निग्ध वस्ति ) देना
चाहिये ॥ १७३ ॥
गौरवे शिरसः शूले विबद्धेष्विन्द्रियेषु च ।
जीर्णज्वरे रुचिकरं कुर्यान्मूर्धविरेचनम् ॥ १७४ ॥
अभ्यङ्गांश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान् सावगाहनान् ।
विभज्य शीतोष्णतया कुर्याज्जीर्णे ज्वरे भिषक् ॥ १७५ ॥
तैराशु हि शमं याति बहिर्मार्गगतो ज्वरः ।
लभन्ते सुखमङ्गानि बल वर्णश्च वर्धते ॥ १७६ ॥
धूपनाञ्जनयोगैश्च यान्ति जीर्णज्वराः शमम् ।