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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 616 में से

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पृष्ठ 261

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७
धर्म है, ऐसा समझ कर चिकित्सा में जो प्रवृत्त होता है उसकी सब कामनायें
पूर्ण होती हैं, उसको अत्यन्त सुख मिलता है ॥ ६०-६२ ॥
तत्र श्लोकः- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिः शुभः ।
अमृतालपान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम् ॥ ६३ ॥
सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः ।
आयुर्वेदसमुत्थाने तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ६४ ॥
आयुर्वेद की उत्पत्ति, दिव्य ओषधियों का हितकर विधान, अमृत से थोड़े
कम गुण रखने वाले सिद्ध रसायन, जिन को देवराज इन्द्र ने सिद्ध, ब्रह्मचा-
रियों को उपदेश किया था, वह सब भगवान् पुनर्वसु ने इस 'आयुर्वेद-समुत्थान'
अध्याय में कह दिया ॥ ६३-६४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आयुर्वेद-
समुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः ॥ ४ ॥
समाप्तश्चायं प्रथमो रसायनाध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
( प्रथमः पादः )
[ स्वस्थ पुरुष के ऊर्ज को बढ़ाने के लिये रसायन और वाजीकरण हैं ।
रसायन के पीछे वाजीकरण औषध प्रयोग करने चाहियें । तभी इनका प्रभाव
उत्तम होता है । इसलिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । ]
अथातः संप्रयोगशरमूलीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब आगे 'संप्रयोग-शरमूलीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं,
भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्यमात्मवान् ।
तदायत्तौ हि धर्मार्थों प्रीतिश्च यश एव च ॥ ३ ॥
पुत्रस्याऽऽयतनं ह्येतद् गुणाश्चैते सुताश्रयाः ।
जितेन्द्रिय पुरुष प्रतिदिन वाजीकरण की इच्छा करे । इसके ऊपर ही धर्म,
अर्थ, प्रीति और यश आश्रित हैं । यह वाजीकरण पुत्रोत्पत्ति का कारण है और
धर्म, अर्थ, प्रीति, यश आदि समस्त गुण पुत्र के ऊपर आश्रित हैं ॥ ३ ॥