चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८० चरकसंहिता [ अ० ११
का वीर्य, मूत्र और मल पानी में डूब जाता है, जो स्वबन्धुओं से द्वेष करता हो,
वह व्यक्ति एक मास के भीतर मृत्यु के पानी में डूब जाता है । (१०) जिसके
हाथ, पाव और मुख बिना दाह के शुष्क होने लगें वह एक मास से अधिक
नहीं जीता ॥ १०-१२ ॥
ललाटे मूर्ध्नि बस्तौ च नीला यस्य प्रकाशते ।
राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति ॥ १३ ॥
प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्र मसूरिकाः ।
उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात्स विनश्यति ॥ १४ ॥
ग्रीवावमर्दो बलवाञ्जिह्वाश्वयथुरेव च ।
ब्रध्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्व तमादिशेत् ॥ १५ ॥
संभ्रमोऽति प्रलापोऽति भेदोऽस्थ्नामतिदारुणः ।
कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत्प्रवर्तते ॥ १६ ॥
(११) सद्योमरण के अरिष्ट—जिस रोगी के माथे, शिर और बस्ति मे
मे नवीन चन्द्रमा के समान टेड़ी नीली रेखाये दीखती हैं उसकी मृत्यु निकट
समझनी चाहिये । (१२) जिस रोगी के शरीर पर मूंगे के समान फुन्सिया
(मसूरिका चेचक) निकल कर शीघ्र ही फिर नष्ट हो जायें वह शीघ्र ही मरता
है । (१३) जिस रोगी की ग्रीवा में अकड़ान (दर्द) बहुत अधिक हो, जीभ
पर सूजन हो जाये, गुदा, गला, और मुख पक जाये वह शीघ्र मर जाता है ।
(१४) भ्रम, प्रलाप और भयंकर रूप में अस्थियों का टूटना हो, काल के
पाश में फसे मनुष्य में ये तीन लक्षण होने लगते हैं ॥ १३-१६ ॥
प्रमुह्य लुञ्चयेत्केशान् परिगृह्णात्यतीव च ।
नरः स्वस्थवदाहारमबलः कालचोदितः ॥ १७ ॥
समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम् ।
स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊर्ध्वगानिमिषेक्षणः ॥ १८ ॥
शयनादासनाद्गात्रात्काष्ठात्कुड्यात्तथापि वा ।
असन्मृगयते किंचित्स मुह्यन्कालचोदितः ॥ १९ ॥
अहास्यहासी समुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ ।
शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति ॥ २० ॥
आह्वयन्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा ।
महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २१ ॥
(१४) जो रोगी बेसुध होकर बालों को खींचता तथा स्वस्थ पुरुष के
समान भोजन करता है वह काल से प्रेरित होता है । (१५) जो मनुष्य आख