चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ चरकसंहिता [ अ० ११
तृष्णा-श्वास-शिरोरोग-मोह-दौर्बल्य-कूजनैः ।
स्पृष्टः प्राणाञ्जहात्याशु शकृद्भेदेन चाऽऽतुरः ॥ १९ ॥
(१३) जिस रोगी के आमाशय मे काटने के समान (परिकर्त्तिका) वेदना
उत्पन्न हो, प्यास हो, गुदा का अवरोध हो, वह रोगी शीघ्र मर जाता है । (१४)
वायु पक्वाशय का आश्रय लेकर सञ्ज्ञा (चेतना) को नष्ट करदे, तथा गले में घुर्घर
शब्द उत्पन्न हो जाये तो रोगी शीघ्र मर जाता है । (१५) दान्तों मे कीचड
के लेप के समान और मुख (चेहरा) चूने के समान सफेद हो जाये और
शरीर के अगों पर पसीना (सिप्रा नदी के समान) आने लगे वा वे ढीले
पड़ जावें तो ये शीघ्र मरने वाले के लक्षण हैं । (१६) जिस रोगी को प्यास,
श्वास, शिरोरोग, मोह, दुर्बलता, अगो मे कूजन तथा अतीसार हो, वह रोगी
शीघ्र मर जाता है ॥ १६ १६ ॥
तत्र श्लोक —एतानि खलु लिङ्गानि यः सम्यगवबुध्यते ।
स जीवितं च मर्त्यानां मरणं चावबुध्यते ॥ २० ॥
जो वैद्य इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है वह मनुष्यो के जीवन और
मरण को भली प्रकार जानता है ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने सद्योमरणो-
यमिन्द्रियं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
अथातोऽणुज्योतीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'अणुज्योतीय' (मन्दाग्नि) अथवा 'शरीर का मन्द-तेज'
नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ।१-२।
अणुज्योतिरणेकाग्रो दुश्छायो दुर्मनाः सदा ।
रतिं न लभते याति परलोकं समान्तरम् ॥ ३ ॥
बलिं बलिभुजो यस्य प्रणीतं नोपभुञ्जते ।
लोकान्तरगतः पिण्डं भुक्ते संवत्सरेण सः ॥ ४ ॥
सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुन्धतीम् ।
संवत्सरान्ते जन्तुः स संपश्यति महत्तमः ॥ ५ ॥