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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 616 में से

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पृष्ठ 162

अ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७
तस्य चेत्परिमृश्यमानानि पृथक्त्वेन गुल्फ-जानु-वङ्क्षण गुद-वृषण-
मेढ्र-नाभ्यंस-स्तन-मणिक-पर्शूका-हनु-नासिका-कर्णाक्षि-भ्रू-शङ्खादीनि
स्रस्तानि व्यस्तानि च्युतानि वा स्थानेभ्यः स्युः, परासुरय पुरुषो न
चिरात्कालं मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ७॥
भिन्न २ अवयवों के स्पर्श करने पर यदि गुल्फ (टखने), जानु, वङ्क्षण,
गुदा, वृषण, शिश्न, नाभि, अंस, स्तन, हाथ (कलाई), पसुलिया, हनुसन्धि
(जबाड़ा), नासिका, कान, आख, भौंह, शंख आदि सन्धिया व्यस्त अवस्था
मे या इधर उधर अपने स्थानों से खिसकी हों तो समझ लेना चाहिये कि
पुरुष शीघ्र ही मर जायेगा ॥ ७॥
तथाऽस्योच्छ्वास-मन्या-दन्त-पक्ष्म-चक्षुः-केश-लोमोदर-नखाङ्गुलि-
गणं च लक्षयेत् । तस्य चेदुच्छ्वासोऽतिदीर्घोऽतिह्रस्वो वा स्यात् परा-
सुरिति विद्यात् । तस्य चेन्मन्ये परिमृश्यमाने न स्पन्देयातां परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेद्दन्ताः परिकीर्णाः श्वेता जातशर्कराः स्युः, परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेत्पक्ष्मणि जटाबद्धानि स्युः, परासुरिति विद्यात् ।
इसी प्रकार रोगी पुरुष के उच्छ्वास, मन्या (गले के पार्श्व में जाने वाली
दो धमनया), दात, पक्ष्म (पलक), आख, केश, लोम, पेट, नख और अंगुली
की भी परीक्षा करनी चाहिये । जिस रोगी को श्वास, प्रश्वास, बहुत लम्बा या
छोटा हो जावे, उसे मरा हुआ जाने । जिस रोगी के मन्या धमनियों में धड़कन
प्रतीत न हो, उसे प्राणशून्य जाने । जिसके दात मैल से भरे, श्वेत अथवा शर्क-
राय़ुक्त हो जाये, उसे प्राणरहित जाने । रोगी पुरुष की पलकों के बाल आपस
मे चिपटे (गुझले हुए) हुए हों, उसे भी प्राणरहित जाने ॥
तस्य चेच्चक्षुषी प्रकृतिहीने विकृतियुक्तेऽत्युत्पिण्डितेऽतिप्रविष्टेऽति-
जिह्मेऽतिविषमेऽतिप्रस्रुतेऽतिविमुक्तबन्धने सततोन्मिषिते, सततनिमे-
षिते, निमेषोन्मेषातिप्रवृत्ते, विभ्रान्तदृष्टिके, विपरीतदृष्टिके, व्यस्तदृ-
ष्टिके, नकुलान्धे, कपोतान्धेऽलातवर्णे, कृष्ण-नील-पीत-श्याव-ताम्र-हरि-
त-हारिद्र-शुक्ल-वैकारिकाणा वर्णानामन्यतमेनातिसंप्लुते वा स्यातां,
परासुरिति विद्यात् ।
रोगी की आखे प्रकृतिहीन और विकृति से युक्त अर्थात् बाहर को बहुत
निकली, चक्षु गोलकों में अन्दर धसी, बहुत कुटिल, बहुत विषम अथवा एक
आख खुली और एक बन्द, आख की मासपेशियां बहुत ढीली हो, बहुत शिथिल,
निरन्तर खुली या बन्द रहे, अथवा जल्दी जल्दी खुलें और बन्द हो, अप्रयुक्त